Friday, March 20, 2026
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कई और कॉम्प्लेक्स जांच के दायरे में

  • पल्लवपुरम में पिछले पांच-छह वर्षों में खड़े गए अवैध कॉम्प्लेक्स, डीएम करा रहे जांच, होगा ध्वस्तीकरण

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: पल्लवपुरम में पल्हैडा चौराहे पर एजुकेशन लैंड में बना कॉम्प्लेक्स सुर्खियों में बना हुआ हैं। इस कॉम्प्लेक्स का ध्वस्तीकरण कब होगा? यह कहना मुश्किल हैं, लेकिन पल्लवपुरम में एक नहीं, बल्कि कई अवैध कॉपलेक्स पांच वर्षों के भीतर बन गए। इसके लिए जवाबदेह अफसर भी तबादला होकर चले गए, लेकिन वर्तमान में डीएम दीपक मीणा ने इनकी जांच की बात कहीं हैं।

आवासीय क्षेत्र में व्यवसायिक कॉपलेक्स कैसे बन गए? इसके लिए जिम्मेदार एमडीए अफसरों व इंजीनियरों पर भी गाज गिरेगी या फिर नहीं? यह भी बड़ा सवाल हैं। हाल ही में पल्हैड़ा चौराहे पर बने अवैध कॉप्लेक्स के निर्माण का मामला उठा तो आला अफसर हरकत में आ गए। ये कॉम्प्लेक्स भाजपा नेता विक्रांत चौधरी का हैं। इस वजह से भी ये सुर्खियों में आ गया हैं।

सत्ता की हनक के चलते किस तरह से अवैध कॉम्प्लेक्स बनकर खड़ा हो गया और दुकानों को बेच भी दिया। यह पूरा काम पांच वर्षों के भीतर में हो गया। आखिर एमडीए के इंजीनियरों ने इतना बड़ा निर्माण अवैध कैसे होने दिया? एमडीए इंजीनियरों ने कागजी खानापूर्ति करते हुए सरकारी दस्तावेजों में इसके ध्वस्तीकरण के आदेश भी कर दिये, लेकिन दूसरी तरफ इसकी फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

दरअसल, विक्रांत चौधरी ने ये प्लाट एमडीए से खरीदना बता रहे हैं। जो एजुकेशन लैंड की भूमि हैं, लेकिन इस पर व्यवसायिक कॉम्प्लेक्स बना दिया गया। जब इसके ध्वस्तीकरण के आदेश हुए तो भाजपा नेता ने लखनऊ तक एप्रोच की और ध्वस्तीकरण रुकवाने के लिए कमिश्नर के यहां अपील कर दी। कमिश्नर के यहां पर इसकी अपील खारिज कर दी गई तथा ध्वस्तीकरण करने के आदेश दिये।

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फिर भाजपा नेता लखनऊ पहुंचे, जहां विशेष सचिव आवास के यहां से भू-लैंड चेंज कराने का आदेश करा लाये, जिसे बोर्ड बैठक में रखकर ही इसका भू-उपयोग बदला जा सकता हैं। तब से यह मामला पेडिंग पड़ा हैं। इसमें फाइल को बंद कर दबा दिया गया। अब मामला सुर्खियों में आया तो फिर से डीएम दीपक मीणा ने फाइल को तलब कर लिया। वहीं इसकी जांच पड़ताल कराकर सुनवाई भी कर रहे हैं।

इसमें अब फिर से आगे की तिथि बढ़ गई हैं। बड़ा सवाल यह है कि ये ही नहीं, बल्कि पल्लवपुरम फेज-वन डिवाइडर रोड पर आवासीय प्लाट पर चार मंजिल का व्यवसायिक कॉम्प्लेक्स बनकर तैयार हो गया हैं। ये भी इसी के साथ बनाया गया हैं। ये कॉम्प्लेक्स भी पूरी तरह से अवैध हैं।

क्योंकि मानचित्र आवासीय में स्वीकृत हैं, लेकिन व्यवसायिक कॉम्प्लेक्स का निर्माण किया गया हैं। चौहान मार्केट से ठीक पहले एक और अवैध कॉम्प्लेक्स बन गया हैं। इसमें भी पार्किंग तक नहीं छोड़ी गई। जितने भी अवैध कॉपलेक्स बने हैं, उनमें पार्किंग भी नहीं हैं।

इन अवैध कॉम्प्लेक्स की जांच कराने के आदेश डीएम दीपक मीणा ने दिये हैं। जोनल अधिकारी वीके सोनकर का कहना है कि अवैध कॉम्प्लेक्स की जांच करा रहे हैं, जिसकी रिपोर्ट तैयार कर डीएम को दी जाएगी। इसके बाद निश्चित रूप से इन अवैध कॉम्प्लेक्स पर कार्रवाई की जाएगी।

उपभोक्ता आयोग ने एमडीए पर लगाया जुर्माना

सेवाओं में कमी के चलते उपभोक्ता प्रतितोष आयोग मेरठ के चेयरमैन भोपाल सिंह सदस्य पंकज शर्मा एवं करुणा जैन ने मेरठ विकास प्राधिकरण पर वादी द्वारा अदा की गई धनराशि सात हजार पर प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ अंतिम अदायगी तक अदा करने और पांच हजार रुपये वाद के खर्चे के रूप में देने के आदेश पारित किए हैं।

कानपुर के रहने वाले सुरेश कुमार सिंह ने मेरठ विकास प्राधिकरण की शताब्दी नगर योजना में 16 सितंबर 1989 को 3 हजार रुपए जमा कर पंजीकरण कराया था।विकास प्राधिकरण द्वारा शीघ्र निर्माण व विकास कार्य पूर्ण कर कब्जा देने का आश्वासन वादी को दिया गया था। जिस पर एमडीए के कहने पर वादी ने भवन की आरक्षित रख धनराशि 4010 भी 18 नवंबर 1989 को जमा कर दिए थे।

जिसके बाद 1993 में परिवादी को शताब्दी नगर आवास योजना में 50 मीटर का एक भवन आवंटित कर दिया गया था। और परिवादी से किस्ते जमा करने के लिए कहा गया किंतु किसानों से विवाद होने के कारण मौके पर भवन के निर्माण व विकास कार्य पूरे नहीं किए गए थे।

जिस कारण वादी ने मार्च 2005 में अपने द्वारा जमा की गई कुल धनराशि सात हजार रुपये विपक्षी एमडीए से ब्याज सहित मांगे तो एमडीए ने उस पर 20 प्रतिशत की कटौती करके धन राशि लौटाने की बात कही। जिससे पीड़ित होकर वादी ने उपभोक्ता आयोग में वाद योजित किया।

आयोग ने सुनवाई के बाद माना की मेरठ विकास प्राधिकरण किसानों से विवाद के कारण अपने वादे के अनुसार उक्त आबंटित प्लॉट पर निर्माण कार्य पूर्ण नहीं कर सका था जिसमें वादी की कोई गलती नहीं है। ऐसी स्थिति में 20 प्रतिशत कटौती करके रुपये लौटना विकास प्राधिकरण की सेवाओं में कमी की श्रेणी में आता है।

जिस पर आयोग ने वादी द्वारा जमा की गई धनराशि 7000 पर वाद की तिथि से अदायगी की तिथि तक सात प्रतिशत का ब्याज और साथ में पांच हजार रुपये वाद के खर्चे के रूप में अदा करने के आदेश पारित किए हैं।

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