
अमित बैजनाथ गर्ग |
बाजरे को लेकर लोगों की जो धारणाएं थीं, वह काफी पहले से ही बदलनी शुरू हो गई हैं। आने वाले समय में यह धारणा और बदलेगी। तकनीक और बाजरे से बनने वाले खाद्य उत्पादों में सुधार के साथ बाजरा उत्पादन पूरी दुनिया में खाद्य सुरक्षा को मजबूत बना सकता है। हालांकि इस दिशा में बहुत काम करने की जरूरत है।
नाइजीरिया में एलेक्स एकवुमे फेडरल यूनिवर्सिटी के कृषि अर्थशास्त्री रॉबर्ट ओनीनेके का कहना है कि दुनिया अनाज के संकट का सामना कर रही है। यह संकट हर जगह बढ़ रहा है। अब समय आ गया है कि चावल और गेहूं जैसे लोकप्रिय अनाज के विकल्पों की तलाश की जाए। उनका मानना है कि बाजरा इस अनाज का एक विकल्प हो सकता है। बाजरा काफी ज्यादा पौष्टिक होता है, किसी भी तरह की जलवायु में पैदा किया जा सकता है। इसके उत्पादन में समय कम लगता है और यह कार्बन का भी कम उत्सर्जन करता है। इसे लोगों की नजर में लाने की जरूरत है।
एक अनुमान के अनुसार, दुनिया की लगभग आधी आबादी चावल पर और एक तिहाई आबादी गेहूं पर निर्भर है। हालांकि वर्ष 2023 को संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय बाजरा वर्ष के रूप में घोषित किया गया है। ऐसे में इस अनाज को लेकर लोगों की धारणा बदल सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह अनाज न सिर्फ स्वास्थ्य के हिसाब से सही है, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी इसका उत्पादन किया जा सकता है।
जिस तरह से दुनिया जलवायु परिवर्तन का सामना कर रही है, उस स्थिति में यह अनाज खाद्य असुरक्षा की चिंता को कम कर सकता है। बाजरे का उत्पादन गर्म और सूखाग्रस्त इलाकों में भी किया जा सकता है। इसे गेहूं, धान या मक्का की तुलना में काफी कम पानी की जरूरत होती है। इसके उत्पादन में समय भी काफी कम लगता है। बाजरे की कुछ फसल महज 60 से 90 दिनों के भीतर तैयार हो जाती है। धान की खेती के विपरीत बाजरे की खेती के दौरान बहुत कम या न के बराबर ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है।
ऐतिहासिक रूप से भी देखें तो बाजरे का उत्पादन लगभग 3000 ईसा पूर्व से किया जा रहा है। माना जाता है कि यह उन शुरूआती फसलों में से एक है, जब लोगों ने खेती शुरू की थी। लंबे समय से लाखों किसान मुख्य फसल के तौर पर इसका उत्पादन कर रहे हैं। खासकर भारत, चीन और अफ्रीका के कई हिस्सों में। बाजरे में पर्याप्त मात्रा में आयरन, फाइबर और कुछ विटामिन होते हैं, इसलिए इसे पोषक अनाज भी कहा जाता है। दुनिया के करीब 130 से ज्यादा देशों में इसका उत्पादन होता है। हालांकि इसके बावजूद अफ्रीका और एशिया के महज 9 करोड़ लोग ही मुख्य भोजन के रूप में इसका इस्तेमाल करते हैं। इसे अक्सर गरीबों का भोजन माना जाता है।
बाजरे के उत्पादन में सिंथेटिक उर्वरकों और कीटनाशकों की भी कम जरूरत होती है। साथ ही यह मिट्टी की उर्वरता को भी बढ़ा सकता है। मौजूदा स्थिति यह है कि एशिया और अफ्रीका में बाजरे का जितना उत्पादन किया जा रहा है, वह स्थानीय मांगों को भी पूरा नहीं कर सकता है। अगर बाजरे के निर्यात को बढ़ावा देना है तो सरकारों को हस्तक्षेप करना होगा। सब्सिडी और सरकारी स्तर पर खरीद सुनिश्चित कर बाजरे की खेती को आसानी से बढ़ाया जा सकता है। बाजरे की खेती बढ़ने का मतलब है कि इसके प्रसंस्करण के साधनों में भी वृद्धि करनी होगी। भारत सबसे ज्यादा बाजरे का उत्पादन करने वाले देशों में से एक है। 1960 के दशक में यहां हरित क्रांति हुई। उस समय अकाल से निपटने के लिए फसलों के उत्पादन पर दी गई सब्सिडी और बड़े पैमाने पर हुए कृषि औद्योगीकरण से चावल और गेहूं को फायदा हुआ। बाजरे के प्रसंस्करण के लिए जो बुनियादी ढांचा चाहिए, वह आज भी मौजूद नहीं है।
इस बारे में भारत के कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि संतुलन बनाए रखने के लिए मोती और फिंगर जैसी बाजरे की प्रजातियों पर ध्यान देना चाहिए। इन्हें कम प्रसंस्करण की जरूरत होती है। गेहूं के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले बुनियादी ढांचे में एक छोटा बदलाव कर इन मोटे अनाजों का प्रसंस्करण किया जा सकता है। उनका कहना है कि हमें भूसी वाले छोटे अनाज के प्रसंस्करण के लिए बुनियादी ढांचे का भी विकास करना चाहिए। बाजरे के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकारी सब्सिडी और सहायता की जरूरत होगी।
हालांकि कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि केवल एक तरह के अनाज की खपत को दूसरे के साथ इस तरह बदलना सही फैसला नहीं है। इससे फसल की निर्भरता का एक नया मोनोकल्चर पैदा होगा। हम अदूरदर्शी यूरोपीयन संस्कृति पर केंद्रित नीति लागू नहीं कर सकते, जो विकासशील देशों को उनके हिस्से के अनाज से वंचित करती है। हालांकि उनका मानना है कि बाजरा किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करना जरूरी है। ऐसा न होने पर किसानों की जगह सिर्फ बिचौलियों को ही फायदा होगा।
दुनिया में बाजरे की मांग बढ़ने से शुष्क जमीन के साथ-साथ उपजाऊ जमीन पर भी इसकी खेती बढ़ेगी। बेहतर गुणवत्ता वाली फसल अच्छी मात्रा में पैदा होगी। इससे इस अनाज को लेकर लोगों के मन में जो छवि बनी है, वह भी दूर हो सकती है। बाजरे को लेकर लोगों की जो धारणाएं थीं, वह काफी पहले से ही बदलनी शुरू हो गई हैं। आने वाले समय में यह धारणा और बदलेगी। तकनीक और बाजरे से बनने वाले खाद्य उत्पादों में सुधार के साथ बाजरा उत्पादन पूरी दुनिया में खाद्य सुरक्षा को मजबूत बना सकता है। हालांकि इस दिशा में बहुत काम करने की जरूरत है। भारत में किसानों से बाजरा करीब 10 रुपए किलो खरीदा जा रहा है और उसकी अच्छे से पैकिंग कर सुपरमार्केट में 50 रुपए किलो तक बिक्री हो रही है। इस परिस्थिति को बदलने की जरूरत है और किसानों को उनकी फसल का बेहतर दाम देते हुए प्रोत्साहित करने की जरूरत है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो हालातों को बदलने में कोई मदद नहीं मिलेगी।


