Saturday, February 21, 2026
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भिक्षु और भगवान

 

Amritvani 11


एक बौद्ध भिक्षु भोजन बनाने के लिए जंगल से लकड़ियां चुन रहा था कि उसने कुछ अनोखा देखा। उसने एक बिना पैरों की लोमड़ी देखी,जो ऊपर से स्वस्थ दिख रही थी। उसने सोचा कि आखिर इस हालत में ये लोमड़ी जिंदा कैसे है?वह अपने विचारो में खोया था कि अचानक हलचल होने लगी। जंगल का राजा शेर उस तरफ आ रहा था। भिक्षु भी तेजी से एक पेड़ पर चढ़ गया और वहा से देखने लगा। शेर ने एक हिरन का शिकार किया था और उसे अपने जबड़े में दबा कर लोमड़ी की तरफ बढ़ रहा था। उसने लोमड़ी पर हमला नही किया, बल्कि उसे खाने के लिए मांस के टुकड़े भी दे दिए। भिक्षु को यह देखकर और भी आश्चर्य हुआ कि शेर लोमड़ी को मारने की बजाय उसे भोजन दे रहा है। भिक्षुक बुदबुदाया। उसे अपनी आंखों पर भरोसा नही हो रहा था। इसलिए वह अगले दिन फिर वही गया और छिप कर शेर का इंतजार करने लगा। आज भी वैसा ही हुआ। भिक्षुक बोला कि यह भगवान के होने का प्रमाण है। वह जिसे पैदा करता है, उसकी रोटी का भी इंतजाम कर देता है। आज से इस लोमड़ी की तरह मै भी ऊपर वाले की दया पर जिऊंगा। वही मेरे भोजन की व्यवस्था करेगा। यही सोचकर वह एक वीरान जगह जा के बैठ गया। पहले दिन बिता, कोई नही आया। दूसरे दिन कुछ लोग आए ,पर किसी ने भिक्षुक की ओर नही देखा। धीरे धीरे उसकी ताकत खत्म हो रही थी। वह चल-फिर भी नही पा रहा था। तभी एक महात्मा वहा से गुजरे और भिक्षु के पास पहुंचे। भिक्षु ने अपनी पूरी कहानी महात्मा को सुनाई और बोला, आप ही बताए कि भगवान मेरे प्रति इतना निर्दयी कैसे हो गया? किसी को इस हालात में पहुंचना पाप नहीं है?


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