Saturday, March 7, 2026
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नगर निगम में चलता है बिना परीक्षा और योग्यता के क्लर्क बनाने का खेल

  • बड़ा सवाल: जूनियर को कैसे बना दिया सीनियर
  • नगर निगम में सेटिंग है तो जूनियर को भी सीनियर की सीट पर बैठाया जा सकता है

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: नगर निगम शासनादेश का पालन नहीं करता। निगम के अधिकारी जो चाहते हैं, वहीं करते हैं। भले ही नियमों के विपरीत क्यों नहीं जाना पड़े। ऐसा ही एक मामला संज्ञान में आया है। मामला है निर्माण विभाग में मुख्य लिपिक पद पर तैनाती का। निगम में सीनियर क्लर्क भी मौजूद थे, मगर जूनियर को मुख्य क्लर्क के पद पर तैनात कर दिया गया। ये सब नियम विरुद्ध है।

इसको लेकर शासन से भी पत्र निगम अफसरों के पास पहुंचा, मगर अधिकारी मौन साधे हुए हैं। नगर निगम में मनमानी इस कदर है कि नियम यहां कोई मायने नहीं रखते। पूर्ण चंद्र जोशी चुंगी अनुचर के पद पर तैनात थे, उनकी आकस्मिक मृत्यु के बाद मृतक आश्रित के रूप में उनके पुत्र प्रदीप जोशी को चतुर्थ श्रेणी के पद तैनाती दे दी गई थी।

कुछ समय बीता तो प्रमोद जोशी को कनिष्ठ लिपिक के पद पर नियुक्ति कर दी। चतुर्थ श्रेणी से सीधे क्लर्क पद पर छलांग लगवा दी गई। यह पदोन्नति किसके आदेश पर हुई? पदोन्नति होने से पहले कमेटी यह सब तय करती है। इसमें कोई कमेटी नहीं बैठी। कोई रिपोर्ट नहीं आयी।

सीधे चतुर्थ श्रेणी कर्मी के पद से कनिष्ठ लिपिक पद पर तैनात कर दिया गया। इसको लेकर भी सवाल उठे, मगर तब मामला दबा दिया गया था। अब प्रमोद जोशी को मुख्य लिपिक के पद पर निर्माण विभाग में तैनात कर दिया गया है। प्रमोद जोशी से जो सीनियर थे, उनको यह तैनाती नहीं दी गई। इस तरह से नगर निगम में बड़ा खेल चल रहा है।

बड़ा सवाल ये है कि बिना कमेटी गठित करें, पहले पदोन्नति दी गई और अब निर्माण विभाग में मुख्य लिपिक के पद पर बैठा दिया गया। ये सब नगरायुक्त डा अरविन्द चौरसिया के आदेश पर ही हुआ, मगर हुआ नियम विरुद्ध।

इस प्रकरण की शासन स्तर पर शिकायत की गई, जिसमें नियम विरुद्ध दी गई पदोन्नति को लेकर सवाल उठाते हुए संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

नगर निगम में यह पहला मामला नहीं है, बल्कि 23 संविदा कर्मियों को स्थाई करने का मामला भी पहले चल रहा है। उसमें भी बड़ा खेल हुआ है। उसकी जांच पड़ताल ठंडे बस्ते में डाल दी गई है।

कई वर्षों से यह मामला भी फाइलों में ही दबा हुआ है। इसमें कोई कार्रवाई शासन स्तर से नहीं हुई है। यही वजह है कि कार्रवाई नहीं हो पाने पर निगम के अफसरों व कर्मचारियों के हौसले बुंलद है, जिसके चलते इस तरह के मामले सामने आते रहते हैं।

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