- संजीव बालियान की हो चुकी है दो बार जीत हरेन्द्र की दो बार हार
- इस बार मतदाताओं पर ऊपर दारोमदार, किसकी लगायेगी नैया पार
मिर्जा गुलजार बेग |
मुजफ्फरनगर: 2024 के लोकसभा चुनाव में मुजफ्फरनगर सीट पर अजब समीकरण बन रहे हैं। इस बार जो दो प्रत्याशी आमने-सामने हैं, उनमें से एक अपनी जीत की हैट्रिक लगाना चाहते है, जबकि दूसरा अपनी हार की हैट्रिक का लगने से बचाना चाहता है। अब यह जनता के ऊपर है कि वह किसे जितायेगी और किसे हरायेगी, यह बार ओर है कि दोनों ही ओर से इस चुनाव को जीतने के लिए पूरी ताकत लगायेंगे।
वेस्ट यूपी की मुजफ्फरनगर सीट की गिनती प्रदेश की महत्वपूर्ण सीटों में होती है। इस सीट पर रिकॉर्ड बनते और टूटते रहे हैं। यहां के मतदाताओं के मिजाज कब बदल जाये, उस बारे में कहा नहीं जा सकता है। मुजफ्फरनगर जनपद में वैसे तो छह विधानसभा सीटे हैं, परन्तु मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट के हिस्से में चार विधानसभा सीटें आती हैं, जबकि एक विधानसभा मेरठ जनपद की है। इस लोकसभा सीट पर डा. संजीव बालियान लगातार दो बार सांसर रहे चुके हैं और अब तीसरी बार सांसद बनने के लिए वह मैदान में है। 2013 के दंगों के बाद जब लोकसभा चुनाव हुए थे, तो संजीव बालियान 4 लाख के रिकॉर्ड मतों से जीते थे। इसके बाद 2016 में जब विधानसभा चुनाव हुए, तो उस समय जनपद की सभी छह की छह विधानसभा सीटों पर भाजपा ने ही परचम लहराया था, जबकि इस लोकसभा में लगने वाली मेरठ की सरधना सीट पर भी भाजपा का ही कब्जा हुआ था। 2019 के लोकसभा चुनाव हुए, तो इस बार भी संजीव बालियान ने रालोद के अजित सिंह को लगभग साढे छह हजार वोटों से हराकर विजयश्री हासिल की थी, परन्तु इसके बाद जब 2022 के लोकसभा चुनाव हुए, तो भाजपा ने जनपद की छह विधानसभा सीटों में से पांच सीटें गंवा दी थी और लोकसभा में लगने वाली सरधना विधानसभा सीट को भी खो दिया था। इसके बाद उपचुनाव में छठी विधानसभा सीट से भी भाजपा को हाथ धोना पड़ा था। इन परिस्थितियों में संजीव बालियान तीसरी बार सांसद बनकर अपनी हैट्रिक लगा पायेंगे या फिर उनका विजयी रथ रूक जायेगा, यह सब इस लोकसभा सीट के मतदाताओं के मिजाज पर निर्भर करेगा।
दूसरी ओर यदि हरेन्द्र मलिक की बात करें, तो वह भी एक कद्दावर नेता हैं। हरेन्द्र मलिक लगतार चार बार विधायक निर्वाचित हुए थे, एक बार खतौली से तथा तीन बार वह बघरा विधानसभा से विधायक बने थे, परन्तु इसके बाद जैसे उनके किस्मत रूठ गयी थी और वह कोई चुनाव नहीं जीत पाये थे, परन्तु उन्होंने अपने पुत्र पंकज मलिक को राजनीतिक मैदान में उतारा, तो वह भी अपने पिता की तर्ज पर चलते हुए लगातार विधायक बन रहा है। पंकज मलिक एक बार बघरा से, एक बार शामली से तथा वर्तमान में वह जनपद की चरथावल सीट से विधायक है। लोकसभा चुनाव की बात करें, तो हरेन्द्र मलिक ने 1998 में समाजवादी पार्टी से इस सीट पर चुनाव लड़ा था, परन्तु वह उस समय हार गये थे। इसके बाद वह इण्डियन नेशनल लोकदल से राज्यसभा सदस्य चुने गये और आखिरी बार उन्होंने 2009 में कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा था, जिसमें उन्हें बुरी तरह हार का मुंह देखना पड़ा था।
इस लोकसभा सीट पर दो बार हारने के बाद वह तीसरी बार सपा के टिकट पर मैदान में हैं। इस बार परिस्थितियों 2009 के बिल्कुल विपरीत हैं, ऐसे में क्या वह अपनी हार की हैट्रिक से बच पायेंगे और एक रिकॉर्ड कायम करेंगे, यह मतदाताओं के मिजाज पर निर्भर करेगा।

