Wednesday, May 27, 2026
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संकट में प्रकृति के सफाईकर्मी गिद्ध

यही कोई तीन वर्ष पहले की बात है। मैं अपनी गाड़ी द्वारा बांदा से पन्ना, मध्यप्रदेश जा रहा था। रास्ते में अजयगढ़ के पहले और करतल कस्बे के थोड़ा आगे पहाड़ की एक बड़ी चट्टान पर बैठे हुए सात-आठ गिद्ध दिखे। सहसा विश्वास नहीं हुआ, लगा स्वप्न है, मेरा भ्रम है। मैं रुककर सड़क पर खड़ा उन्हें अपलक साश्चर्य देखने लगा कि तभी एक गिद्ध चलते हुए उछलकर दूसरी शिला पर पंख फैलाकर बैठ गया। मेरा तन-मन खुशी के उजाले से भर गया। दो दशक से अधिक समय हो गया था किसी गिद्ध को देखे हुए। समाचार पत्रों, रेडियो और टेलीविजन की खबरों में पढ़ने, सुनने और देखने को मिलता कि गिद्ध अब लगभग विलुप्त हो गये हैं।

हालांकि, गिद्ध संरक्षण के समाचार भी यदा-कदा पढ़ने को अवश्य मिलते पर कहीं गिद्ध नहीं दिखते। बहुत दुख होता कि मैंने अपने जीवन काल में ही प्रकृति के सफाईकर्मी मवेशी मुर्दाखोर विशाल पक्षी जटायु वंशज गिद्ध को खत्म होते देखा-सुना, जिनकी भूमिका प्रकृति और मानव जीवन को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण थी। मन पीड़ा से कराह उठता, एक हूक सी उठती कि हम प्रकृति के अनुपम उपहार को बचा न सके। तब मन बार-बार बचपन के स्मृति-वन में भटकता, यादों की पिटारी में गिद्धों को खोजता। तब सुंदर दृश्य मानस पटल पर सजीव हो उठते और बड़े-बुजुर्गों से सुनी वे कहानियां उभरने लगतीं, जिनके नायक गिद्ध थे। अपने गांव ‘बल्लान’ में खेतों के मध्य आम, कैथा, जामुन, नीम के सघन वृक्षों की छांव में वह माटी का खपरैल वाला घर और गाय के गोबर से लिपा बड़ा सा आंगन।

दोपहर में आंगन में मूंज की सुतली से बुनी चारपाई पर जब लेटता तो लगता प्रकृति माता ने आसमान को ही नीली चादर बना ओढ़ा दिया हो। नीले गगन में सैकड़ों की संख्या में छोटे-बड़े सिलेटी-कत्थई रंग के पक्षी खिलौनों की मानिंद आकाश में तैरते दिखते, जैसे वर्तमान में ड्रोन उड़ते हैं। कभी-कभार कोई पंख फड़फड़ाता अन्यथा सभी हवा के साथ गोल घेरे में अनायास घूमते रहते। मुझे वह दृश्य बहुत प्यारा लगता। मैं दादी से चहक कर पूछता कि आकाश में वे क्या उड़ रहे हैं। दादी कहतीं, ‘वे जटायू हैं, गीध-चील। ऊपर से मरे जानवर का देखत हैं और देख जांय पर उतर के खाय जात हैं।’ ओह, तब समझ में आता कि हमारे खेतों के बगल से बह रही बम्बी (छोटी नहर) के किनारे वाले खेत में मृत मवेशी खाने वाले डरावने से पक्षी गिद्ध और चील हैं। लगभग हर दो-तीन दिन के अंतराल में आकाश में यही नजारा होता। किंतु पशुओं के शव चट कर जाने के बाद वे कहां चले जाते थे, हम नहीं जानते थे।

जब 7 साल का हुआ तो शिक्षक पिता जी के साथ अतर्रा कस्बे में पढ़ने हेतु चला आया था। रास्ते में दो जगह पर हर बार किसी न किसी जानवर का मांस नोचते-निगलते गिद्ध दिख जाते, कभी-कभी तो खाल उतारते तीन-चार आदमी भी। कुछ कुत्ते भी अपना हिस्सा छीन रहे होते, और सियार भी मांस के लोभ में अवसर ताकते तैयार दूर खड़े दिखते। पेट भर चुके गिद्ध पंख फैलाकर किसी मेड़ पर पर पता नहीं कौन सी साधना करते थे, पर उन्हें देखते ही मेरे अंदर तक डर समा जाता था। कस्बे के निकट ‘गुठिल्ला पुरवा’ में एक बंजर खेत पर लकड़ी का बड़ा सा तराजू एक बल्ली पर टंगा हवा के साथ हिलता-डुलता रहता, पास ही जानवरों की हड्डियों का ढेर दिनानुदिन बढ़ता रहता। पिता जी ने बताया था कि यहां जानवरों की हड्डियां खरीदी जाती हैं। गिद्ध अपनी चोंच से हड्डियों को बिलकुल साफ कर देते थे। वास्तव में गिद्ध प्रकृति के सफाई कर्मी ही तो थे जो जानवरों के शवों का निपटान करते थे, अन्यथा दुर्गन्ध-सड़ांध से मानव बस्तियों में रहना मुश्किल होता।

फिर आगे न जाने क्या हुआ कि धीरे-धीरे गिद्ध खत्म होने लगे और एक दिन आकाश गिद्धों से रिक्त हो गया। मृत जानवर सड़ते रहे और दुर्गन्ध फैलती रही। राहगीर नाक में अंगौछा रख जल्दी-जल्दी बढ़ वहां से आगे निकल जाते। जब बड़ा हुआ तो समझ आया कि गिद्धों की मौत का कारण बीमार जानवरों की एक दर्द-निवारक दवा डाइक्लोफेनाक है, जिसका असर मृत जानवरों के मांस पर भी बना रहता था और गिद्धों द्वारा मांस खाने से वह उनके गुर्दों एवं श्वास तंत्र को प्रभावित करती थी, फलत: गिद्ध मरने लगे थे। इस दवा के कारण भारत में 98 प्रतिशत गिद्ध मारे गये। सरकार ने डाइक्लोफेनाक पर प्रतिबंध लगा गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन के मानवीय प्रयत्न आरम्भ किए। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, असम, मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल में गिद्ध संरक्षण केंद्र खोले गये। हर वर्ष सितम्बर के पहले शनिवार को विश्व भर में गिद्धों के संरक्षण हेतु जागरूकता दिवस मनाया जाता है ताकि गिद्धों को बचाने के लिए समुदाय एकजुट हो, क्योंकि गिद्ध ही हैं जो पशुओं के शवों को खाकर बीमारी रोकते और वातावरण शुद्ध रखते हैं। संकट काल से गिद्धों को बचाकर आगामी पीढ़ी को सौंपना ही हमारा कर्तव्य है।

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