Tuesday, March 31, 2026
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जरूरत और रेवड़ी में अंतर समझना होगा

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Tanveer Jafreeउत्तर प्रदेश के जालौन में बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे का उद्घाटन करते समय 15 जुलाई 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में सर्वप्रथम उन राजनैतिक पार्टियों पर निशाना साधा था जो चुनाव जीतने मात्र के लिए जनता को लालच देने वाली योजनाओं की घोषणाएं किया करते हैं। प्रधानमंत्री ने इसे ‘रेवड़ी कल्चर’ का नाम दिया था। उन्होंने कहा था, ‘मुफ़्त की रेवड़ियों का ऐलान कर वोट लेने की कोशिश करने का अभ्यास देश के विकास के लिए हानिकारक है। चुनावी घोषणाओं में देश की जनता को मुफ़्त की चीजों का लालच देकर वोट हासिल करने की साजिश की है। ये रेवड़ी कल्चर आने वाली पीढ़ियों के लिए घातक साबित होगा। ऐसे लोगों को लगता है कि मुफ़्त की रेवड़ी के बदले उन्होंने जनता जनार्दन को खरीद लिया है।’

यही बात प्रधानमंत्री ने गत 26 अप्रैल को कर्नाटक में भी एक चुनावी जनसभा के दौरान दोहराते हुये कहा, ‘मुफ़्त की रेवड़ी की राजनीति की वजह से कई राज्य बेतहाशा खर्च अपनी दलगत भलाई के लिए कर रहे हैं। राज्य डूबते चले जा रहे हैं और आने वाली पीढ़ियों का भी ये खा जा रहे हैं। देश ऐसे नहीं चलता, सरकार ऐसे नहीं चलती।’

परंतु इसी के साथ प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार द्वारा दी जा रही ‘मुफ़्त सेवाओं’ की पैरवी इन शब्दों में की, ‘कुछ तात्कालिक चुनौतियों से निपटने के लिए देश के गरीब परिवारों को हर संभव सहायता दी जा रही है और ये सरकार का दायित्व है।

कोरोना के समय हमें जरूरत लगी तो हमने मुफ़्त वैक्सीन दिया देश को…क्योंकि जान बचानी थी। मुफ़्त राशन देने की जरूरत पड़ी तो दिया गया क्योंकि देश में कोई व्यक्ति भूखा नहीं रहना चाहिए। लेकिन देश को आगे बढ़ाना है तो हमें इस ‘रेवड़ी कल्चर’ से मुक्त होना ही पड़ेगा।’

आज सरकार के प्रतिनिधि बड़े गर्व से बताते रहते हैं कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत कोरोनाकाल में गरीब लोगों को 5 किलो अनाज मुफ़्त दिए जाने की जो योजना शुरू की गई थी उसका फायदा देश के 80 करोड़ लोग उठा रहे हैं। इतना ही नहीं बल्कि कोरोना काल खत्म हो जाने के बावजूद इस मुफ़्त राशन योजना को फिलहाल दिसंबर 2023 तक बढ़ाये जाने कभी खबर है।

जहां तक कोविड के दौरान मुफ़्त वैक्सीन लगाये जाने का प्रश्न है तो देश में अभी तक जितनी भी महामारी संबन्धी वैक्सीन लगाई गई हैं, कभी भी किसी भी सरकार द्वारा जनता से उसके पैसे वसूले नहीं गए। हां, कोविड वैक्सीन से पहले किसी सरकार के मुखिया ने अपनी फोटो युक्त प्रमाणपत्र जरूर बांटे जोकि राजनैतिक प्रचार के सिवा और कुछ नहीं था।

दुनिया के कई देशों में इसका मजाक भी उड़ाया गया। रहा सवाल मुफ़्त राशन बांटने का तो पिछले लोकसभा चुनाव में तो भारतीय जनता पार्टी ने मुफ़्त राशन हासिल करने वाले मतदाताओं की अलग श्रेणी ही बना डाली जिसका नाम ‘लाभार्थी’ रखा गया। कोई आश्चर्य नहीं कि यह योजना दिसंबर 23 के बाद 2024 के लोकसभा चुनाव तक भी बढ़ा दी जाए।

कर्नाटक में मोदी को इसलिए ‘रेवड़ी’ फिर याद करनी पड़ी क्योंकि कांग्रेस ने भाजपा द्वारा अपने चुनाव प्रचार में परोसे गए विभाजनकारी एजेंडे के मुकाबले में राज्य की जनता से पांच ऐसे वादे किए थे जो सीधे तौर पर कांग्रेस को फायदा पहुंचाने वाले तो जरूर थे, परंतु सरकार के राजस्व पर निश्चित रूप से भरी बोझ साबित होने वाले थे।

इनमें एक वादा था ‘गृह लक्ष्मी योजना’, इसके अंतर्गत महिलाओं को हर महीने 2000 रुपये की सहायता राशि देने की बात है जबकि ‘युवा निधि योजना’ के तहत स्नातक की पढ़ाई करने वाले युवाओं को दो साल तक तीन हजार रुपये और डिप्लोमा होल्डर्स को दो साल तक 1500 रुपये प्रति माह बेरोजगारी भत्ता दिए जाने का वादा किया गया है।

इसी प्रकार ‘अन्न भाग्य’ योजना में गरीब परिवारों को हर महीने 10 किलो चावल की गारंटी देने की बात कही गई है तो ‘सखी योजना’ के तहत महिलाओं को सरकारी बसों में फ्री बस पास उपलब्ध कराने का घोषणा की गई है। इसी तरह ‘गृह ज्योति’ योजना में हर घर को 200 यूनिट बिजली देने का वादा किया गया है। कर्नाटक की नई सिद्धारमैया सरकार ने शपथ ग्रहण के बाद सबसे पहले इन्हीं वादों को पूरा करने की घोषणा भी कर दी है।

इसके पहले हिमाचल प्रदेश में गत वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जनता से जो अनेक वादे किए थे, उनमें सत्ता संभालते ही बेरोजगार युवाओं को एक लाख सरकारी नौकरियां देने, ग्रामीण सड़कों के लिए भू-अधिग्रहण कानून लागू कर भू-स्वामियों को चार गुना मुआवजा देने, महंगाई से निपटने के लिए लोगों की जेबों में पैसा डालने, पुरानी पेंशन योजना लागू करने, महिलाओं को 1500 रुपए प्रति माह देने और 300 यूनिट बिजली मुफ़्त देने जैसे वादे प्रमुख थे।

ऐसे ही वादों ने कांग्रेस को हिमाचल प्रदेश व कर्नाटक में सत्ता दिलाई। इसी प्रकार दिल्ली में बिजली पानी शिक्षा व स्वास्थ्य की मुफ़्त घोषणा कर अरविंद केजरीवाल सत्ता में आए और यही ‘रेवड़ी वितरण फार्मूला’ पंजाब में भी लागू किया गया। पूर्व में भी किसानों का कर्ज मुआफ करने,किसानों का बिजली बिल मुआफ करने के नाम पर विभिन्न पार्टियां वोट मांगती रही हैं।

कहीं मुफ़्त तीर्थ यात्रा करने के नाम पर वोट तो कहीं मुफ़्त शौचालय बनाने के नाम पर, कहीं मुफ़्त आवास देने के नाम पर, कहीं मुफ़्त राशन के नाम पर तो कभी मुफ़्त वैक्सीन के नाम पर वोट मांगा जाता रहा है।

यह तय करने का अधिकार आखिर किसे है और यह कौन तय करेगा कि कौन सी योजना ‘रेवड़ी वितरण’ की श्रेणी में आती है और कौन सी योजना जनता की वास्तविक जरूरत है?


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