
बिहार की राजनीति में बहुविध हलचल है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा सांसद बनने जा रहे हैं। 16 मार्च को चुनाव होने हैं। उनके बेटे निशांत ने राजनीति में एंट्री की है। अगले मुख्यमंत्री को लेकर कयासबाजी चल रही है। बिहार ऐतिहासिक रूप से भारतीय राजनीति की वह प्रयोगशाला रहा है, जिसके नतीजों ने दूरगामी असर डाले हैं फिर चाहे वह जेपी की संपूर्ण क्रांति हो या मंडल आयोग के बाद उपजी सामाजिक न्याय की लहर। लेकिन वर्तमान में बिहार के मुख्यमंत्री को ‘जबरिया रिटायर’ कर राज्यसभा में भेजने का जो ‘नया प्रयोग’ हो रहा है, वह किसी के गले नहीं उतर रहा। नीतीश कुमार का यह तर्क भी हजम नहीं हो पा रहा है कि वे सारे सदनों में रह चुके हैं और अब बस राज्यसभा की कमी को पूरा करना चाहते हैं। क्या नीतीश कुमार के इस कदम, जिसे उनके कई विरोधी भाजपा के समक्ष उनका ‘सरेंडर’ बता रहे हैं, से जनता दल (यू) का अस्तित्व संकट में नहीं आ जाएगा?
नीतीश कुमार की राजनीति को समझने के लिए केवल उनके हालिया कदमों को देखना पर्याप्त नहीं है; इसके लिए भारतीय लोकतंत्र में पिछले तीन दशकों में हुए नैतिक और वैचारिक परिवर्तनों को भी समझना होगा। नीतीश कुमार का राजनीतिक जीवन एक समय वैचारिक प्रतिबद्धता, समाजवादी पृष्ठभूमि और प्रशासनिक सुधारों की उम्मीदों से शुरू हुआ था, लेकिन समय के साथ यह यात्रा उस दौर की राजनीति का प्रतीक बन गई है जिसमें सत्ता की निरंतरता अक्सर सिद्धांतों से बड़ी हो जाती है। आज जब उनके राजनीतिक जीवन को ‘आखिरी दांव’ के रूप में देखा जा रहा है, तो यह केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का प्रश्न नहीं है; यह उस व्यापक संकट का भी संकेत है जिसमें भारतीय राजनीति धीरे-धीरे मूल्यहीनता, अवसरवाद और नैतिक अस्पष्टता की ओर बढ़ती दिखती है। नीतीश कुमार का उदय उस दौर में हुआ जब भारतीय राजनीति में समाजवादी विचारधारा की गहरी उपस्थिति थी। वे उस राजनीतिक परंपरा से निकले जिसमें जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया जैसे नेताओं का प्रभाव था। उस परंपरा का मूल लक्ष्य सत्ता प्राप्त करना भर नहीं था, बल्कि सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक नैतिकता और जनसरोकारों को राजनीति का आधार बनाना था।
राजनीति की लंबी यात्रा में अक्सर व्यक्तित्व और सिद्धांत दोनों की परीक्षा होती है। समय के साथ नीतीश कुमार की राजनीति में सबसे अधिक दिखाई देने वाली प्रवृत्ति रही है गठबंधन बदलने की रणनीति। वे कभी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा रहे, बाद में नरेंद्र मोदी के उभार के बाद उससे अलग हो गए, फिर वापस उसी गठबंधन में लौटे, और बाद में फिर उससे अलग होकर लालू प्रसाद यादव तथा तेजस्वी यादव के साथ सत्ता में आ गए। यह बार-बार का राजनीतिक परिवर्तन केवल रणनीतिक लचीलापन नहीं स्वीकारा गया बल्कि धीरे-धीरे इसे सिद्धांतहीन अवसरवाद के रूप में देखा जाने लगा। यहीं से नीतीश कुमार की राजनीति की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है—विश्वसनीयता का संकट। लोकतंत्र में जनता केवल विकास के वादों पर नहीं बल्कि राजनीतिक ईमानदारी पर भी भरोसा करती है। जब कोई नेता बार-बार अपने राजनीतिक साझेदारी बदलता है तो उसके समर्थकों के बीच भी यह प्रश्न उठने लगता है कि उसकी राजनीति का वास्तविक आधार क्या है। क्या वह किसी स्पष्ट विचारधारा से संचालित है, या केवल सत्ता में बने रहने की रणनीति से?
भारतीय राजनीति में यह प्रवृत्ति केवल बिहार तक सीमित नहीं है। कई राज्यों और राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन और विरोध के समीकरण लगातार बदलते रहते हैं। इससे लोकतंत्र में एक प्रकार की राजनीतिक अस्थिरता और वैचारिक भ्रम पैदा होता है। जनता के लिए यह तय करना कठिन हो जाता है कि कौन सा दल किस विचार का प्रतिनिधित्व करता है। नीतीश कुमार के ‘आखिरी दांव’ को इसी व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए। यह दांव केवल सत्ता बनाए रखने का प्रयास नहीं है; यह उनकी राजनीतिक विरासत को बचाने की भी कोशिश है। वे शायद यह समझते हैं कि यदि वे वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में अपनी प्रासंगिकता बनाए नहीं रख पाए, तो आने वाले समय में बिहार की राजनीति पूरी तरह नई पीढ़ी के हाथों में चली जाएगी। इसलिए उनकी हर राजनीतिक चाल अब पहले से अधिक निर्णायक और जोखिम भरी दिखाई देती है। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि राजनीति में केवल रणनीति ही पर्याप्त नहीं होती। किसी भी नेता की दीर्घकालिक प्रतिष्ठा इस बात पर निर्भर करती है कि उसने अपने समय में राजनीतिक नैतिकता और जनहित के लिए कितना योगदान दिया। कोई नेता बार-बार सत्ता में आता है लेकिन समाज में स्थायी परिवर्तन नहीं ला पाता, तो उसकी राजनीतिक सफलता भी विवादास्पद हो जाती है।
नीतीश कुमार के मामले में भी यही सवाल उठता है। क्या उनकी राजनीति बिहार को स्थायी रूप से बदलने में सफल रही है, या वह केवल प्रशासनिक सुधारों और गठबंधन प्रबंधन तक सीमित रह गई है? यह प्रश्न अभी पूरी तरह तय नहीं हुआ है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि उनकी राजनीतिक यात्रा भारतीय लोकतंत्र के उस संक्रमणकाल को दशार्ती है जिसमें आदर्श और व्यावहारिकता के बीच संतुलन लगातार टूटता जा रहा है।
आज भारतीय राजनीति में जिस प्रकार की भाषा, ध्रुवीकरण और नैतिक गिरावट दिखाई देती है, उसमें नीतीश कुमार जैसे नेताओं की भूमिका भी चर्चा का विषय बनती है। एक समय वे संयमित और संतुलित राजनीति के प्रतीक माने जाते थे, लेकिन लगातार बदलते गठबंधनों ने उनकी उस छवि को धूमिल कर दिया। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि राजनीति में केवल व्यक्तिगत ईमानदारी पर्याप्त नहीं होती; राजनीतिक स्थिरता और वैचारिक स्पष्टता भी उतनी ही आवश्यक होती है।
अंतत: नीतीश कुमार का आखिरी दांव केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है; यह भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़े उस बड़े प्रश्न का प्रतीक है कि क्या राजनीति फिर से मूल्यों और सिद्धांतों की ओर लौट सकती है, या वह पूरी तरह चुनावी गणित और सत्ता की रणनीतियों में सिमट जाएगी।
यदि राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम बनकर रह जाती है, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर हो जाती है। लेकिन यदि नेता अपने अनुभव और विवेक के आधार पर नैतिक साहस दिखाएं, तो राजनीति फिर से जनविश्वास अर्जित कर सकती है। इस दृष्टि से नीतीश कुमार का वर्तमान दौर केवल उनके व्यक्तिगत भविष्य का प्रश्न नहीं है। यह उस ऐतिहासिक क्षण का भी संकेत है जिसमें यह तय होगा कि भारतीय राजनीति अवसरवाद की दिशा में और आगे बढ़ेगी या फिर लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की ओर लौटेगी। शायद यही कारण है कि उनके हर कदम को आज केवल एक राजनीतिक रणनीति नहीं बल्कि एक प्रतीकात्मक आखिरी दांव के रूप में देखा जा रहा है।

