Friday, April 4, 2025
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अब बेटियां बराबर की हकदार


राजेश माहेश्वरी
राजेश माहेश्वरी
सर्वोच्च न्ययालय ने महिलाओं के हक में बड़ा निर्णय दिया है। इस फैसले से चारों ओर खुशी की लहर है। न्यायालय ने कहा है कि पिता की पैतृक संपत्ति में बेटी का बेटे के बराबर का हक है, थोड़ा भी कम नहीं। कोर्ट ने कहा कि बेटी जन्म के साथ ही पिता की संपत्ति में बराबर की हकदार हो जाती है। जस्टिस अरुण मिश्रा की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय पीठ ने यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने अहम फैसले में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की व्याख्या करते हुए कहा है कि बेटी को पैतृक संपत्ति पर बराबरी के हक से वंचित नहीं किया जा सकता। बेटी चाहे हिंदू उत्तराधिकार कानून, 1956 में हुए संशोधन से पहले पैदा हुई हो या बाद में, उसे बेटे के समान ही बराबरी का हक है। वास्तव में जब महिलाएं सामाजिक रिश्तों को ताक पर रखकर अपने पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी की मांग करती भी थीं तो हिंदू उत्तराधिकार संशोधन कानून 2005 कई महिलाओं के सामने अड़चन पैदा किया करता था। इस वजह से बीते 15 सालों में महिलाओं की एक बड़ी संख्या पैतृक संपत्ति में अपना अधिकार मांगने से वंचित रह गई।
ताजा मामले में सुप्रीम कोर्ट के ही दो फैसलों प्रकाश बनाम फूलमती (2016) और दनाम्मा उर्फ सुमन सरपुर बनाम अमन (2018) में विरोधाभास के बाद कानूनी व्यवस्था तय करने के लिए मामला तीन न्यायाधीशों को भेजा गया था। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, एस अब्दुल नजीर और एमआर शाह की पीठ ने फैसले में कहा, चूंकि बेटी को जन्म से संपत्ति पर अधिकार प्राप्त होता है। इसलिए संशोधित कानून लागू होने की तिथि को पिता का जीवित होना जरूरी नहीं है। तीन सदस्यीय पीठ के अध्यक्ष जस्टिस अरुण मिश्रा ने यह दोहराया कि ‘बेटा तब तक बेटा होता है जब तक उसे पत्नी नहीं मिलती है, लेकिन बेटी जीवनपर्यंत बेटी रहती है।’
वर्ष 2000 में विधि आयोग ने एक रपट में उल्लेख किया कि आम आदमी के फायदे के लिए सभी तरह के संपत्ति-कानून बनाने चाहिए, क्योंकि संपत्ति का अधिकार मनुष्य की आजादी और विकास के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है। आयोग ने उस कानून को बदलने की भी अनुशंसा की, जो हिंदू अविभाजित संयुक्त परिवार में महिलाओं को सह-कानूनी उत्तराधिकारी होने को रोकता है। तब तक यह अधिकार पुरुष वंशजों, उनकी माताओं, पत्नियों और अविवाहित बेटियों को ही हासिल था। बहरहाल 2005 में संसद ने आयोग की रपट का संज्ञान लिया तथा उसे स्वीकार करते हुए हिंदू उत्तराधिकार कानून, 1956 में संशोधन पारित किया। नतीजतन बेटी को भी पैतृक संपत्ति में बराबर का हिस्सेदार मान लिया गया, लेकिन फिर एक पेंच रह गया। संशोधित कानून के मुताबिक, यदि 9 सितंबर, 2005 को बेटी का पिता जीवित होगा, तभी कानून लागू होगा। पिता के दिवंगत होने की स्थिति में बेटी वंचित ही रहेगी। अब सर्वोच्च अदालत के तीन न्यायाधीशों की पीठ ने सभी भ्रमों, स्थितियों और सवालों पर विराम लगा दिया है। फैसला दिया गया है कि पैतृक संपत्ति में सह-हिस्सेदारी हिंदू महिला का ‘जन्म’ से ही अधिकार है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। अगर वसीयत लिखने से पहले पिता की मौत हो जाती है तो सभी कानूनी उत्तराधिकारियों को उनकी संपत्ति पर समान अधिकार होगा। हिंदू उत्तराधिकार कानून में पुरुष उत्तराधिकारियों का चार श्रेणियों में वर्गीकरण किया गया है और पिता की संपत्ति पर पहला हक पहली श्रेणी के उत्तराधिकारियों का होता है। इनमें विधवा, बेटियां और बेटों के साथ-साथ अन्य लोग आते हैं। हरेक उत्तराधिकारी का संपत्ति पर समान अधिकार होता है। इसका मतलब है कि बेटी के रूप में आपको अपने पिता की संपत्ति पर पूरा हक है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि बदलते समय में भी हमारे देश में बेटियों को पराया समझा जाता है, इसलिए इन्हें लोग अपनी संपत्ति का हकदार नहीं मानते हुए अपनी संपत्ति को बेटों के नाम कर देते हैं। लेकिन शादी के बाद किस लड़की पर क्या मुसीबत आ जाए कि उसे अपनी पैतृक संपत्ति की कब बेहद जरूरत पड़ जाए, यह कोई नहीं विचारता है। लेकिन हमारे देश में पैतृक संपत्ति के विवाद के जितने मामले, लड़ाई-झगड़े भाइयों के सामने आते हैं, उतने या यूं कहें कि भाई-बहनों के नामात्र के ही होते हैं। हमारे देश की लड़कियां अपने माता-पिता की संपत्ति पर कभी भी हक जमाने की कोशिश नहीं करतीं। हां, कुछ लड़कियां शादी के बाद दहेज लोभियों के दबाव में अपनी पैतृक संपत्ति से अपना हिस्सा मांगने की मांग करती हों। लेकिन फिर भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से उन लड़कियों को राहत मिल सकती है जो किसी मजबूरी के कारण अपनी पैतृक संपत्ति पाना चाहती हो या फिर उनकी पैतृक संपत्ति के गलत रिश्तेदारों, रास्ता भटक चुके भाइयों द्वारा इसका दुरुपयोग का खतरा हो।
सामाजिक ढांचा और कानूनी पक्ष यह है कि बेटी का ससुराल की संपत्ति में भी कोई अधिकार नहीं होता। विवाह में कटुता आने पर पति अपनी आर्थिक स्थिति के हिसाब से महज गुजारा भत्ता ही देता है, मगर ससुराल की चल-अचल संपत्ति पर उसका हक नहीं होता। ऐसे में अपनी पैतृक संपत्ति में अधिकार मिलने से उसकी स्थिति मजबूत होगी। कोर्ट ने इस मामले में सरकार का पक्ष भी जानना चाहा था और सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने केस में कोर्ट के फैसले पर सहमति जताते हुए इसे बेटियों का मौलिक अधिकार जैसा माना। सर्वोच्च न्यायालय से ये फैसला आते ही सोशल मीडिया में तमाम प्रतिक्रियाएं हुईं। किसी ने इसे उनके सम्मान से जोड़ा तो कोई इसे बराबरी का अधिकार मान रहा है। खैर हर किसी ने तहेदिल से इसको अपनाया, जो दर्शाता है कि अब लोगों की सोच में काफी बदलाव आ रहा है।
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