जनवाणी संवाददाता |
मुजफ्फरनगर: श्रीराम कॉलेज की राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई के सात दिवसीय विशेष शिविर के द्वितीय शिविर का आयोजन भगत सिंह जी को फूल अर्पण कर के शाहिद दिवस के रूप में गांव खेड़ी विरान में किया गया । शिविर में लगभग 50 स्वयंसेवको ने प्रतिभाग किया और देशभक्ति गीत, नृत्य एवं देश भक्ति संबंधी नाटक प्रस्तुत किए। इसके पश्चात विद्यालय के प्रांगण में साफ सफाई कर श्रमदान किया साथ ही स्वयंसेवकों ने ग्रामवासियों को वीर सेनानियो के प्रति दान करने के लिए जागरूक किया ।
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इस अवसर पर शिविर में उपस्थित आज की मुख्य अतिथि प्राथमिक विद्यालय प्राचार्य कुसुम रही जिन्होंने स्वयंसेवकों को बताया कि आज 23 मार्च है। भारत में इसे शहीद या शहीदी दिवस के रूप में मनाते हैं। यह दिन देश के लिए बहुत खास है। आज ही के दिन स्वतंत्रता की लड़ाई में भारत के तीन सपूतों ने हंसकर फांसी की सजा को गले लगाया था । शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत को आज के दिन शहीद दिवस के रूप में मनाते हैं और इन्होंने किस प्रकार से देश की आजादी में योगदान दिया इस बारे में विस्तार पूर्वक बताया गया।
इसके पश्चात शिविर में उपस्थित बायोसाइंस विभाग अध्यक्ष डॉ अश्वनी कुमार ने बताया कि भगत सिंह ने 23 साल की युवा उम्र में ही मां भारती की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। उनके इस जज्बे को देखकर देश के युवाओं को भी देश की आजादी के लिए लड़ने की प्रेरणा मिली। भगत सिंह ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनसे प्रेरित होकर ही कई लोगों ने क्रांतिकारी मार्ग को अपनाया।
इसके पश्चात शिविर में उपस्थित प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक रोहित शर्मा ने स्वयंसेवकों को बताया की जिस आजाद भारत में आज हम सुकून की सांस ले रहे हैं, उसकी आजादी के लिए वे हंसते हुए और आजादी के गीत गाते हुए फांसी पर झूल गए थे। दरअसल अंग्रेजों के बढ़ते हुए अत्याचार से सबसे पहले भगत सिंह ने लौहार में सांडर्स की गोली मार कर हत्या कर दी। उसके बाद ‘पब्लिक सेफ्टी और ट्रेड डिस्ट्रीब्यूट बिल’ के विरोध में भगत सिंह ने सेंट्रल असेम्बली में बम फेक था। हालांकि उनका मकसद सिर्फ अंग्रेजों तक अपनी आवाज पहुंचाना था कि किसी की हत्या करना नहीं। इस घटना के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था।
शिविर में उपस्थित राष्ट्रीय सेवा योजना योजना कार्यक्रम अधिकारी अंकित कुमार ने बताया कि 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई थी। लेकिन उन्हें 11 घंटे पहले ही 23 मार्च 1931 को शाम 7.30 फांसी पर चढ़ा दिया गया। फांसी के समय कहा जाता है कि भगत सिंह मुस्कुरा रहे थे और उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ नारे लगाते हुए फांसी के फंदे को चूमा था। कुछ लोग कहते हैं कि भगत सिंह की आखिरी इच्छा थी कि उन्हें फांसी पर लटकाने की जगह गोली मार दी जाए।देश की नई पीढियों को ऐसे महान क्रांतिकारियों के काम और विचारों को अपनाने की जरूरत है जिससे देश की बागडोर कर्तव्यनिष्ठ हाथों में बनी रहे।
शिविर के सफल संचालन में शारीरिक प्रशिक्षु सरिता एवं हितेंद्र तथा स्वयंसेवक हर्ष सैनी, हर्ष बंसल, आस मोहम्मद, हर्षित, अंशिका गोयल, स्नेहा तायल, तोहिद सेटू ,तबिश ,स्नेहा पांडे श्रद्धा तोमर,स्वीटी उपाध्याय जावेद ,अभय त्यागी तथा अजय कुमार इत्यादि का महत्वपूर्ण योगदान रहा

