रामचरितमानस में तुलसीदास जी स्पष्ट रूप से कह गये हैं कि ‘दुष्ट संग नहीं देहि विधाता’, लेकिन किया क्या जा सकता है। दुष्टों की भरमार है। जहां जाओ वही इसी श्रेणी के लोगों की जमात बैठी हुई है। सज्जन का जीना मुहाल है और दुर्जन गुलाब जामुन खा रहे हैं। परेशान होकर आदमी स्थितियों का पुनरावलोकन करता है और दुष्टों से बचने का प्रयास करता है। हनुमान जी सीता माता की खोज करते हुये लंका में पहुँचे तो उनके मुख से विभीषण का निवास स्थान देखकर यही निकला कि ‘यहां कहां सज्जन कर वासा।’ वही बत्तीस दांतों के मध्य जीभ वाली स्थिति। जब भी किसी को मंत्रीमंडल में फेरबदल करना पड़ता है, सोचते हैं कुछ भले आदमी मिल जाएंगे, लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात। एक नागनाथ तो दूसरा सांपनाथ। दुष्टों से भला आदमी बच नहीं सकता। प्रभु से यही कामना करता है कि उसे दुष्ट की संगत नहीं मिले। पर यह कैसे संभव हो सकता है। कदम-कदम पर दुष्टता का नंगा ताण्डव हो रहा है। रक्तबीज की तरह दुष्ट उठ खड़े होते हैं।
आफिस में मैं मेरे सात्विक तरीके से काम करता हूं तो वे ही लोग आते हैं-‘आदमी हो या नामर्द, सदैव विनम्रता से झुके रहते हो। तुम्हारी यह विनम्रता हमें पसंद नहीं है, या तो अपना रवैया बदलो वरना ठीक नहीं होगा। आखिर क्यों समय पर आते और जाते हो? क्यों तमाम कार्य का निष्पादन यथासमय कर देते हो। रिश्वत भी नहीं खाते। यह भी कोई जीवन है?’ मैंने कहा-‘यह मेरी जीवन शैली है और आप लोग मुझे इस पर बदस्तूर चलने दें। मैं इससे हट नहीं सकता।’ लेकिन वे कब मानने वाले थे। बड़ी मुश्किल से उन दुष्टों को चाय समोसा खिलाकर निजात पाई।
यही हाल मौहल्ले का है। दीपक जी फाटे में पैर उलझाते फिरते हैं। किसी के घर से जरा सा पानी बाहर आ गया तो बात का बतंगड़ बनाकर मौहल्ला विकास समिति की बैठक आहूत कर लेंगे। समझाओ तो अड़ियल टट्टू की तरह अड़ जाएंगे। मैंने एक दिन दीपक जी से कहा-‘अमां यार एक ही मौहल्ले में रहते हो और हर किसी से सम्बन्ध खराब करने पर तुले रहते हो। थोड़ा धीर-गंभीर रहो। सबको अपना समझो। हरवक्त गुस्सैल भूमिका ठीक नहीं होती। अब बताओ मलकानी के घर का बाल्टी-दो बाल्टी पानी बाहर आ भी जाता है तो उसमें अपना जाता क्या है? मलकानी अभी मकान का पूरा काम नहीं करवा पाया है। बाद में तो पानी अपने आप बंद हो जाएगा।’
दीपक जी बात का मर्म समझने के एवज मुझसे उलझ गए-‘अरे यार तुम उसके हिमायती बनकर आये हो क्या? मलकानी कितना पाजी है, यह मैं जानता हूं। मौहल्ले में ऐसा नहीं रखें तो कल मुझे ही निगल जाएगा और यह मलकानी की वाइफ बड़ी तेज है। मेरी वाइफ के मुंह लग गई तो उल्टा सीधा बोलने लगी। सच कहता हूं, उसका मौहल्ले में जीना हराम कर दूंगा। तुम अपना काम करो-बीच में पंगा मत लो।’ मैं चुप हो गया और उनकी दृष्टता को विनम्रता से नमस्कार कर घर में घुस गया।
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संपत्ति एक रूप दो
एक सेठ किशनचंद को अपने धन का अत्यन्त अभिमान था। गरीबों की तो वह हंसी उड़ाता रहता। व्यवहार में भी उनका शोषण ही करता। काम कराके पैसे देने में झगड़ा करता। व्यापार में उन्हें ठगता। बेचारे कुछ कह न पाते, परंतु अन्तरंग में दु:खी होते। गरीब आदमी किसी अमीर का मुकाबला कर भी कैसे सकता है। सब चुप रह जाते, लेकिन उसे बददुआ जरूर देते। सेठ दान भी जहां यश मिलता, वहां करता। पूजादि अनुष्ठानों में भी प्रदर्शन ही करता और अपनी सम्पदा, व्यापार आदि की वृद्धि की मनौती ही मनाता। एक दिन रात्रि को घर में सो रहा था। कुछ डाकू आ गए। नाना प्रकार से कष्ट देकर मार गए और धन लूट ले गए। उसका लड़का बाहर रहता था। समाचार सुनकर आया, बचपन में स्वर्गीय दादी के संस्कार थे।
पिता को भी वह इन कार्यों से रोकने का प्रयत्न करता था, परन्तु उसकी चलती नहीं थी ; अत: वह अपनी शिक्षा पूरी करके सर्विस करना ही उचित समझकर, शान्तिपूर्ण जीवन चला रहा था। बेटे ने बची हुई सम्पत्ति को बहीखातों के अनुसार संभाला। जिनका देना था, दिया और शेष सम्पत्ति का एक परोपकार ट्रष्ट बना दिया। जिससे उसने अपनी ही दुकानों से एक में धर्मार्थ औषधालय तथा दूसरे में पुस्तकालय एवं वाचनालय खोल दिया और घर में धार्मिक पाठशाला संचालित करवाई। सम्पदा जहां की वहां। अपने परिणामों के अनुसार उसका उपयोग होता है, इसलिए सत्य ही कहा है, बच्चों को भी सम्पदा और सुविधाओं की अपेक्षा,अच्छे संस्कार देना अधिक आवश्यक है।

