Friday, March 13, 2026
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उफ! गंदा है पर धंधा है यह

  • अंधविश्वास पर टिका झाड़ फंूक का हाईटेक धंधा, सड़क से लेकर विज्ञापनों तक पर कब्जा
  • बीमारियों से लेकर दुर्घटनाओं तक से बचाने का दावा

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: कुछ समय पहले तक किसी बच्चे की तबियत खराब होने पर उसे किसी की बुरी नजर लगने का शक होता था। आस पास के बाबा से झाड़ फूंक करवाकर गले या फिर हाथ में तावीज पहना दिया जाता था। ठीक न हुआ तो किसी बड़े तांत्रिक या मौलवी की शरण में पहुंचकर झांड़ फूंक करवाया जाता था। समय के साथ आज स्थिति बदली है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से लेकर अखबारों के विज्ञापनों तक में आज इन तांत्रिकों ने अपना स्थान बना लिया है।

बुरी नजर से बचाने वाला यंत्र और नजर से बचाओं वाली मालाओं के आकर्षक विज्ञापन। कीमत भी अच्छी खासी। बच्चे की तबीयत खराब हो या फिर गाड़ी को बुरी नजर से बचाना हो तो स्क्रीन पर दिए गए नम्बर पर आॅर्डर करें और घर बैठे तावीज और यंत्र पांए। इस आधुनिक युग में भी एक तबका 17 वीं शताब्दी में जी रहा है। नए जमाने में तावीज गंडों व झाड़ फूंक के धन्धे ने एक प्रकार से कॉरपोरेट कारोबार की शक्ल इख्तियार कर ली है।

जनसंचार के आधुनिक संसाधनों के माध्यम से कई लोग आज भी जोर शोर से अंधविश्वास पर टिके इस धंधे को प्रमोट करने में लगे हैं। बात मनचाही नौकरी की हो या फिर पुत्र रत्न प्राप्ति, प्रेम प्रसंग हो या फिर कारोबारी दिक्कत, गृह क्लेश या फिर ‘कुछ और’। आलम यह है कि अंधविश्वास के बाजार में आज हर समस्या का तोड़ तावीज और माला के रुप में मौजूद है।

किसी आम प्रोडक्ट की तरह इसके बजाप्ता विज्ञापन निकाले जाते हैं। टोल फ्री नम्बर पर आॅर्डर की बुकिंग ली जाती है और बाकायदा टाइम से डिलीवरी भी दी जाती है। कई बार तो तांत्रिक बाबाओं के साथ हाई प्रोफाइल मीटिंग मंदिरों या मजारों पर नहीं बल्कि मंहगे होटलों में होती है। ए सी कमरों में उनकी नजरें उतारी जाती हैं।

सब कुछ आंखों के सामने, फिर भी अंजान

जादू टोना करने वाले और तावीज गंडे बनाने वाले मौलवी से लेकर तांत्रिक और बाबाओं की फौज में ज्यादातर पाखण्डी प्रवृत्ति के लोग होते हैं। अपने पास आने वाले हर पीड़ित को ठगने के लिए यह पूरा होमवर्क करके रखते हैं। अपनी क्रियाएं करने से पहले वो सामने वाले की आंखों में तैरते विश्वास को परख लेते हैं और इसी का फायदा उठाकर वो कैमिकलों के माध्यम से उसे धोका देते हैं और मजबूरियों के अनुसार ठगी करते हैं। बाबाओं के तंत्र जाल में फंसने वाली ज्यादातर महिलाएं होती हैं।

दमदार माने जाते हैं दिल्ली के नजरबट्टू

नजर से बचाने का धंधा कारोबार की शक्ल ले चुका है। बाजारों में कई ऐसी दुकाने हैं जहां अपशकुन दूर करने का इलाज किया जाता है। खास बात यह कि इन दुकानों में नजर से बचाने के लिए देशी से लेकर विदेशी टोटके भी मौजूद हैं। मतलब कि देशी उपायों से काम न बने तो आप विदेशी उपायों को भी अपना सकते हैं। नजरबट्टू का कारोबार करने वाले बताते हैं कि दिल्ली के जनकपुरी इलाके से इसकी सप्लाई देश भर में होती है। हांलाकि मेरठ में भी यह कारोबार फल फूल रहा है लेकिन दिल्ली के जनकपुरी में यह कारोबार करोड़ों रुपये का है।

पहले से ही तैयार रहते हैं छपे हुए तावीज

इस गोरखधंधे में लिप्त लोग पहले से ही छपे हुए तावीज तैयार रखते हैं। यह तावीज वैसे तो सफेद कोरे कागज पर होत हैं, लेकिन इन पर पहले से ही कुछ अंक व तस्वीरें अंकित होती हैं। इन तावीजों पर ऐसा लेप लगा दिया जाता है कि कागज कोरा ही दिखाई देता है। इस दौरान अलग अलग धर्म के मानने वालों के लिए अलग अलग तरह की भाषाएं इन तावीजों पर छपी होती हैं।

इन काम में लगे एक व्यक्ति ने तो यहां तक बताया कि उनके यहां इस धंधे में नींबू का खेल अनमोल है। नाम पता न छापने की शर्त पर उसने बताया कि उनके यहां जो नींबू रखे होते हैं उनमें वो पहले से ही सीरिंज के माध्यम से लाल रंग इंजेक्ट कर देते हैं ताकि उसे जब किसी मरीज के सामने छुरी से काटा जाए तो वो अन्दर से लाल रक्त की भांति निकले और फिर मरीज को लूटा जा सके।

मेरठ में यहां होता है यह कारोबार

शहर का लिसाड़ी गेट इलाका इस काम का सबसे बड़ा अड्डा कहलाया जाता है। इसके अलावा भूमिया का पुल इलाका, ईदगाह के आसपास का इलाका, सराय लाल दास का कुछ क्षेत्र, जाकिर कॉलोनी, तारापुरी, रशीद नगर, जैदी फॉर्म, पिलोखड़ी रोड, श्याम नगर, शाहगासा व नौगजा क्षेत्र। इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में भी इस काम की भरमार है।

अपराध की श्रेणी में आता है यह घिनौना खेल

तावीज गंडों का यह खेल इतना घिनौना है कि इसमें कई बार कई कई जिंदगियां तबाह ओ बर्बाद हो जाती हैं। बेवकूफ बनाने के इस धंधे में लगे लोगों पर शिकंजा कसा जाए तो कई लोगों की जिन्दगियां बचाई जा सकती हैं। एडवोकेट जावेद का कहना है कि यह धोखाधड़ी का मामला है और धोखे से इस कार्य को अंजाम देने वाले व्यक्ति पर आईपीसी की धारा 420 के तहत मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई अमल में लाई जा सकती है।

देखिए इन तावीजों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। विज्ञापनों के माध्यम से लोगों को बेवकूफ बनाने का काम धड़ल्ले से चल रहा है। इस पर अंकुश जरूरी है। शिक्षित लोग जो सड़क किनारे बैठे इन तांत्रिकों व बाबाओं के जाल में नहीं फंसते लेकिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आए विज्ञापनों में जरुर फंस जाते हैं। -डॉ. श्वेता पूनिया (क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट)

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