- आयुष विभाग में आयुर्वेदिक-यूनानी दवाई बेचने के लिए नहीं किसी लाइसेंस की दरकार
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: बिना डिग्री या पढ़ाई के हकीम-वैध बनना है, तो इसके लिए बेहिचक सिर्फ आयुर्वेदिक-यूनानी दवाई की दुकान खोलना ही काफी है। यकीन मानिए, ऐसा करने वालों को रोकने के लिए आयुष विभाग का कोई अधिकारी आपसे कोई सवाल पूछने के लिए नहीं आने वाला है। बस इतनी एहतियात बरतना है कि बोर्ड पर हकीम या वैध नहीं लिखाना है।
जी हां! यह कोई मजाक नहीं है, बल्कि आम लोगों के स्वास्थ्य के साथ आयुष विभाग की ओर से किए जा रहे मजाक का ऐसा सच है, जिसकी ओर कोई ध्यान देने वाला नहीं है। मेरठ में मंगल पांडे नगर स्थित क्षेत्रीय आयुर्वेदिक-यूनानी चिकित्सा अधिकारी कार्यालय से लेकर स्थानीय स्तर पर नियुक्त चिकित्सक और विभाग के नोडल अधिकारी इस सवाल पर यही जवाब देते हैं।
दरअवसल हम सब आते-जाते देखते हैं कि कुछ लोग गाड़ी में बैनर आदि लगाकर विधिवत रूप से खुद को खानदानी हकीम-वैध होने का दावा करते हैं। और हर गंभीर और लाइलाज बीमारी का इलाज करने का दावा करते हैं। हालांकि इसके लिए उनके इलाज के पैकेज भी बेहद महंगे होते हैं। सवाल यह पूछा गया कि क्या ऐसे दवाई बेचने और खुद को खानदानी हकीम-वैध के रूप में प्रचारित करने वालों को किसी प्रकार के लाइसेंस की जरूरत नहीं है?

क्या ऐसा करके यह लोग जनस्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ और लोगों को लूटने का काम नहीं कर रहे हैं? इस सवाल के जो जवाब अधिकारियों से मिले, उन पर ही कई सवाल खड़े होना लाजिम है। अधिकारियों का कहना है कि अव्वल तो ऐसा करने वाले अपनी गाड़ी एक स्थान से दूसरे स्थान पर लेकर चले जाते हैं। दूसरे देशी दवाई बेचने के लिए किसी प्रकार के लाइसेंस की व्यवस्था विभाग की ओर से नहीं की गई है।
सवाल पूछा गया कि विभाग से लाइसेंस या अनुमति लिए बगैर कोई भी व्यक्ति देशी दवाई बेचने की दुकान खोल सकता है? जवाब मिला बिल्कुल ब्रांडेड आयुर्वेदिक और यूनानी दवाई की दुकान कोई भी खोल सकता है, विभाग उससे कोई सवाल करने का अधिकार ही नहीं रखता। जिला अधिकारी डा. रेनू का कहना है कि विभाग की ओर से उससे तब सवाल किया जाएगा, जब वह व्यक्ति खुद को हकीम या वैध लिखकर प्रचारित करेगा,
जब उससे बीयूएमएस और बीएएमएस की डिग्री तलब की जाएगी। उन्होंने बताया कि हाल ही संपूर्ण समाधान दिवस के दौरान कुछ स्थानों पर बिना डिग्री के आयुर्वेदिक चिकित्सा करने की शिकायत की गई थी। ऐसा करने वालों को विभाग की ओर से नोटिस जारी किए गए हैं। उनका कहना है कि बिना डिग्री के एलोपैथी से चिकित्सा करने वालों की निगरानी का काम मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय के स्तर से होता है।
नोटिस की भाषा तो कुछ और ही कहती है!
कार्यालय क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी स्तर से बनाए गए नोडल अधिकारी की ओर से जनपद में जो नोटिस 13 सितंबर को जारी किए गए, उनकी भाषा हालांकि डीओ के बयान से थोड़ा अलग है। इसमें कहा गया कि अधोहस्ताक्षरी द्वारा दिनांक 13 सितंबर को आपके प्रतिष्ठान/क्लिनिक का निरीक्षण किया गया। निरीक्षण के दौरान आप निजी चिकित्सा कार्य करते हुए पाए गए।
निरीक्षण के समय आप द्वारा निजी चिकित्सा से संबंधित रजिस्ट्रेशन तथा अपने शैक्षिक/ व्यवसायिक योग्यता संबंधी प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं किए गए। उक्त चिकित्सा पद्धति से उत्तर प्रदेश में निजी चिकित्सा कार्य करने के लिए विधि/ एक्ट द्वारा स्थापित मान्य बोर्ड एवं जिला स्तर पर पंजीकरण कराना आवश्यक है। इसके बाद तीन दिन में प्रमामण पत्र न दिए जाने की स्थिति में यूपी इंडियन मेडिसिन एक्ट 1939 की धारा-33 के अंतर्गत विधिक कार्रवाई कर प्राथमिकी/ वाद पंजीकृत करा दिया जाएगा।
ये है एक्ट 1939 की धारा-33 में प्रावधान
आयुर्वेदिक एवं यूनानी तिब्बी चिकित्सा पद्धति बोर्ड उप्र के रजिस्ट्रार की ओर से 15 नवंबर 2016 को एक आदेश प्रदेश भर में जारी किया गया। इस आदेश में के अनुसार बोर्ड के संज्ञान में लाया गया है कि राज्य रजिस्टर में वैध-हकीम के रूप में प्रविष्टि के बगैर कुछ लोग अपने नाम के आगे फर्जी ढंग से बीएएमएस व बीयूएमएस लिखकर चिकित्साभ्यास कर रहे हैं। कुछ चिकित्सक आयुर्वेद और यूनानी की फर्जी डिग्री/फर्जी रजिस्ट्रेशन प्रमाण पत्रों का भी प्रयोग कर रहे हैं।
आदेश हैं कि अपने जनपद में आयुर्वेदिक-यूनानी विधा में चिकित्साभ्यास करने वाले तथा बोर्ड में पंजीकृत न होने वाले चिकित्सकों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। अगर कोई चिकित्सक प्रमाण पत्र प्रस्तुत करता है, तो उसका सत्यापन बोर्ड से कराया जाए।

