जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: 1975 में रिलीज हुई फिल्म ‘चोरी मेरा काम’ में एक दृश्य है जिसमें शंकर बने अशोक कुमार का अपहरण होता है और उन्हें आंखों पर पट्टी बांधकर एक गुप्त स्थान पर ले जाया जाता है। बाद में शंकर अपने साथियों के साथ उसी जगह पर वापस आता है। वह फिर से अपनी आंखों पर पट्टियां बांधता है।
पिछली बार उसने अपनी नब्ज गिननी शुरू कर दी थी और धड़कनों की गिनती के हिसाब से ही उसने रास्ते के मोड़ याद कर रखे हैं। वह फिर से अपनी धड़कनों की गिनती शुरू करता है और आंखों पर पट्टी बांधकर अपने साथियों को ठीक उसी जगह वापस पहुंचा देता है। 47 साल बाद यही दृश्य फिल्म ‘कोड नेम तिरंगा’ में दोहराने की कोशिश की गई है, लेकिन फिल्म का असल सार लेखक, निर्देशक रिभु दासगुप्ता शायद समझ ही नहीं पाए।

ये भी एक संयोग ही है कि फिल्मकार अनुराग कश्यप की पाठशाला से निकले उनके दो शागिर्द एक ही दिन बॉक्स ऑफिस पर एक दूसरे के मुकाबले में हैं। अनुराग की बहन अनुभूति एमबीए करके फिल्ममेकिंग में आईं और ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में उनकी सहायक बनने के बाद अपनी पहली फिल्म ‘डॉक्टर जी’ लेकर दर्शकों के सामने हैं। उधर, फिल्में बनाने के अपने पारिवारिक पेशे को अपनाने वाले रिभु दासगुप्ता भी अनुराग के शागिर्द रह चुके हैं।
फिल्म ‘कोड नेम तिरंगा’ रिभु की बतौर निर्देशक चौथी फिल्म है। उनके निर्देशन की बानगी टीवी दर्शक धारावाहिक ‘युद्ध’ और वेब सीरीज ‘बार्ड ऑफ ब्लड’ में भी देख चुके हैं। अमिताभ बच्चन को वह दो बार निर्देशित करने का मौका पा चुके हैं और अपनी नई फिल्म के लिए परिणीति चोपड़ा के हीरो के रूप में वह तलाश पाए तो हार्डी संधू को। रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के एजेंट हिंदी सिनेमा के बीते 10 साल से पसंदीदा विषय बने हुए हैं। और, इसी सिलसिले की अगली कड़ी है फिल्म ‘कोड नेम तिरंगा’।

फिल्म ‘कोड नेम तिरंगा’ एक ऐसे निर्देशक की बनाई फिल्म है जिसका बचपन पश्चिम बंगाल के भद्रलोक में बीता। उस बंगाल में जहां के बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपने उपन्यास आनंद मठ में ‘वंदे मातरम्’ नामक कविता लिखी। रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार 1896 में हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में गाया। यह एक तरह का भाव गीत है, जिसमें कवि अपनी मातृभूमि की वंदना उसकी प्रकृति को याद करते हुए कर रहा है।
आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे साल में हिंदी सिनेमा के कर्णधारों को इस कविता का भाव क्या समझ आता है फिल्म ‘कोड नेम तिरंगा’ देखकर समझा जा सकता है। निर्देशक रिभु दासगुप्ता ने इसे फिल्म में एक युद्ध गीत में तब्दील कर दिया है। अमिताभ बच्चन के साथ वह टीवी सीरीज ‘युद्ध’ बना भी चुके हैं। ऐसी सोच वाले किसी लेखक, निर्देशक की एक फिल्म में उम्मीद भी क्या की जा सकती है? फिल्म ‘कोड नेम तिरंगा’ दर्शकों की बौद्धिक क्षमता की हंसी उड़ाने वाली फिल्म है।

नेटफ्लिक्स के लिए परिणीति चोपड़ा को लेकर ‘द गर्ल ऑन द ट्रेन’ बनाने वाले रिभु दासगुप्ता ने फिल्म ‘कोड नेम तिरंगा’ कोरोना संक्रमण काल में बनाई है। लोकेशन तुर्की की है और कहानी का सिरा उन्होंने पकड़ा है दिल्ली में संसद पर हुए हमले से। हमले का मास्टरमाइंड यहां ओमार नामक आतंकवादी बताया गया है जिसे पकड़ने के लिए रॉ की एजेंट दुर्गा अपनी पहचान बदलकर संयुक्त राष्ट्र के लिए काम करने वाले एक डॉक्टर को अपने प्रेम जाल में फंसाती है।
वजह? इलाके में होने वाली एक शादी में ओमार आने वाला है और डॉक्टर उस शादी के प्रीतिभोज के मेहमानों की सूची में शामिल है। इसी प्रीतिभोज में रॉ एजेंट की पहचान खुलती है। और अब तक आलिया भट्ट की फिल्म ‘राजी’ की लकीर पर चलती रही फिल्म ‘एक था टाइगर’ बन जाती है। ‘नाम शबाना’ भी याद आती है और नीरज पांडे की ही वेब सीरीज ‘स्पेशल ऑप्स’ भी।

कहानी के स्तर पर फेल होने के बाद रिभु दासगुप्ता बतौर निर्देशक भी फेल होते हैं तो इसलिए क्योंकि उनके पास कहानी का सिर्फ एक विचार है। इस विचार पर उनकी लिखी कहानी और पटकथा बेदम है। फिल्म की लंबाई बढ़ाने के चक्कर में वह लंबे लंबे दृश्य गढ़ने की कोशिश करते हैं और दर्शकों को करीब सवा दो घंटे की फिल्म में फंसाए रखने में बार बार गच्चा खाते हैं। रिभु की पूरी कोशिश है कि वह किसी तरह परिणीति चोपड़ा को एक्शन स्टार के रूप में स्थापित कर सकें।
ऐसी ही कोशिशों में हाल ही में कंगना रणौत फिल्म ‘धाकड़’ में मात खा चुकी हैं। नकली एक्शन फिल्मों के चक्कर में ही विद्युत जामवाल और टाइगर श्रॉफ अपने करियर का तिया पांचा कर चुके हैं। फिल्म ‘कोड नेम तिरंगा’ में एक एक्शन दृश्य तो ऐसा है जिसमें सिर्फ लोग मरते दिखते हैं, कौन उन्हें मार रहा है, पूरे दृश्य में नहीं दिखता। यूं लगता है कि परदे पर कोई हिंसक वीडियो गेम चल रहा है और जिसका रिमोट निर्देशक किसी तरह दर्शकों के हाथ में थमाना चाहता है।

फिल्म ‘कोड नेम तिरंगा’ की अगली कमजोर कड़ी इसके कलाकारों का अभिनय है। परिणीति चोपड़ा को इतने गंभीर किरदार में सोच पाना ही मुश्किल है। दूसरे उन्होंने इस किरदार के हिसाब से खुद को ढालने में बिल्कुल मेहनत नहीं की है। तनाव के दृश्यों में सिगरेट पीने भर से रॉ एजेंट स्मार्ट नहीं दिख जाता।
इसके लिए एक एजेंट जैसी कद काठी, शरीर सौष्ठव और फुर्ती भी जरूरी है। परिणीति चोपड़ा की सोलो हीरोइन के तौर पर आखिरी हिट फिल्म कौन सी थी, अब याद भी नहीं रहता। उनकी अभिनय की सीमाएं हैं और जब रॉ एजेंट दुर्गा की तौर पर वह इन्हें लांघने की कोशिश करती हैं, तो पकड़ी जाती हैं। स्लो मोशन में पिस्तौल से गोली निकलते समय रॉ एजेंट की आंखें मिंच जाने वाले दृश्य भी इस फिल्म में देखने को मिलते हैं और एक आतंकवादी को अपने मोबाइल से फोन करते रॉ के दूसरे नंबर के अधिकारी भी।

परिणीति चोपड़ा के अलावा हार्डी संधू ने भी फिल्म ‘कोड नेम तिरंगा’ में अपने अभिनय से काफी निराश किया है। फिल्म की एक कव्वाली को गाते समय गर्दन की नसें तान देने वाले हार्डी संधू पूरी फिल्म में अदाकारी के समय तनकर खड़े भी नहीं हो पाते हैं। सहयोगी कलाकारों की फिल्म में लंबी फेहरिस्त है। शिशिर शर्मा के संवादों की मिक्सिंग करते समय रिवर्ब का इतना ज्यादा इस्तेमाल किया गया है कि कई बार तो समझ ही नहीं आता कि आखिर वह बोल क्या रहे हैं।
रिवर्ब साउंड एडिटिंग में इस्तेमाल होने वाला एक टूल है जिससे आवाज में भारीपन और उसमें एक तरह की गूंज सा असर लाया जाता है। रजित कपूर का काम बढ़िया है लेकिन शरद केलकर को एक आतंकवादी के रूप में कुछ खास करने को नहीं मिला। दिब्येंदु भट्टाचार्य एक जैसे किरदारों में दिखकर अब टाइपकास्ट हो चले हैं। दर्शक उन्हें पसंद करते हैं, लेकिन ये पसंद कितने दिनों तक कायम रहेगी, इसका फैसला दिब्येंदु को खुद करना है।

