- अच्छे और सस्ते इलाज की आस में दूर-दूर से आते हैं मरीज
- चिकित्सा सेवाओं के नाम पर होता है खिलवाड़
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए सरकारी अस्पताल किसी संजीवनी से कम नहीं होते। इन अस्पतालों में मरीजों को बेहतर और सस्ता इलाज दिए जाने की बात कही जाती है, लेकिन जमीनी हकीकत का तब पता चलता है, जब इन अस्पतालों में मरीजों का हाल सामने आता है। ऐसे ही हालात मेडिकल में नजर आए जब मरीजों के तीमारदार खुद ही अपने मरीज को एक जगह से दूसरी जगह लेकर जाते नजर आए। वहीं, आयुष्मान योजना के एक कार्ड धारक ने तो यहां योजना के लाभार्थियों की अनदेखी करने का आरोप लगाया।
सोमवार को मेडिकल कॉलेज की लाल बिल्डिंग के सामने एक मरीज को उसके तीमारदार दूसरी जगह लेकर जा रहे थे। जबकि दूसरे मामले में एक महिला अपने मरीज को खुद व्हील चेयर पर लेकर जाती नजर आई। पूछने पर इन लोगों ने तो अपनी पहचान छिपा ली, लेकिन इतना जरूर बताया कि उन्हें न तो कोई वार्ड ब्वॉय मिला न ही कोई अन्य कर्मचारी जो उनके मरीज को एक जगह से दूसरी जगह लेकर जाए। इसलिए वह खुद ही यह जिम्मेदारी निभा रहे हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि मेडिकल में जितना नर्सिंग स्टॉफ जरूरी है, वास्तव मे उतना नहीं है। वहीं, दूसरी ओर मेडिसिन वार्ड में हर बेड पर मरीज थे और पास में ही उनके तीमारदार भी मौजूद नजर आए। इनमें से ही एक मरीज नाजरा के तीमारदार ने बताया वह आशियाना कॉलोनी के रहने वाले हैं,
एक सप्ताह से मरीज उल्टी-दस्त से ग्रसित है, लेकिन यहां इलाज ठीक से नहीं हो रहा है। दवाएं बाहर से मंगवाई जा रही है, अब डाक्टर ने मरीज को दूसरे वार्ड में शिफ्ट करने को लिख दिया है। सबसे चौकाने वाली बात यह कि यह मरीज आयुष्मान योजना की लाभार्थी है। बावजूद इसके यहां मरीज को सही इलाज नहीं मिल रहा है। सोमवार को मेडिकल कॉलेज में मरीजों की संख्या ज्यादा रहती है। जिस वजह से ओपीडी में भीड़ लगती है। ऐसी ही आर्थोपेडिक ओपीडी के बाहर भी मरीजों की लंबी कतार लगी थी। इसी तरह के हालात पर्चा काउंटर, दवा काउंटर व फीस जमा करने वाले कांउटरों पर नजर आई। मरीज घंटों लाइन में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करने को मजबूर होते रहे हैं।

