
सभी धर्म ग्रंथों में लिखा है कि जो जैसा करता है, उसे वैसा ही उसी जन्म में भोगना पड़ता है, क्योंकि इतिहास खुद को दोहराता है। रविवार को महाराष्ट्र की पॉलिटिक्स में यह बात सच साबित होती दिखाई दी। सत्ता की चाहत बहुत बेरहम होती है। इसमें रिश्ते बौने पड़ जाते हैं। भतीजे अजित पवार के हाथों राजनीति के दंगल में चित हुए शरद पवार से बेहतर भला इसके बारे में कौन जानता होगा। रविवार को शरद पवार के साथ जो हुआ उसने उन्हें 1978 की याद जरूर दिलाई होगी। शायद यही वजह है कि उन्होंने कहा कि बगावत उनके लिए नई चीज नहीं है। वह पार्टी को दोबारा खड़ा कर देंगे। रविवार को बगावत का बिगुल बजाने वाले उनके भतीजे अजित पवार थे लेकिन, तब शरद पवार ने बड़ा उलटफेर किया था। रविवार को पूरे घटनाक्रम ने महाराष्ट्र में 1978 में वसंत दादा पाटिल सरकार के खिलाफ शरद पवार की बगावत की याद ताजा कर दी।