Saturday, April 4, 2026
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शांति और नोबेल

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सन 1888 की बात है। डाइनामाइट का आविष्कारक सुबह अपनी बालकनी में बैठा अखबार पढ़ रहा था। अचानक उनकी नजर एक शोक संदेश पर पड़ी-मौत के सौदागर, डाइनामाइट के आविष्कारक अल्फ्रेड नोबेल का निधन। अपना नाम वहां देखकर वह हैरान रह गया।

अखबार ने गलती से उसके भाई लुडविग के स्थान पर उसके निधन का समाचार प्रकाशित कर दिया था। खुद को संभालने के बाद उसने वह शोक संदेश फिर से ध्यान से पढ़ा। उसमें लिखा हुआ था-डाइनामाइट किंग अल्फ्रेड नोबेल का निधन। वह मौत का सौदागर था, जो आज मर गया।

जब उसने अपने लिए ‘मौत का सौदागर’ संबोधन पढ़ा तो उसे बहुत दु:ख हुआ और वह सोच में पड़ गया कि क्या अपनी मृत्यु के पश्चात वह इसी नाम से स्मरण किया जाना चाहेगा?

इस घटना ने उसको झझकोर कर रख दिया और उसका जीवन बदल दिया। उसने निर्णय लिया कि वह कतई इस तरह स्मरण नहीं किया जाना चाहेगा। कई दिनों तक आत्ममंथन करने के बाद उसने विश्व शांति और समाज कल्याण के लिए कार्य करना प्रारंभ किया।

मृत्यु के पूर्व उसने वसीयत द्वारा अपनी समस्त संपत्ति विश्वशांति, साहित्य, भौतिकी, रसायन, चिकित्सा विज्ञान और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में अग्रणी कार्य करने वालों को पुरुस्कार प्रदान करने हेतु दान कर दी। उनकी मृत्यु के पश्चात उनकी वसीयत के अनुसार नोबेल फाउंडेशन की स्थापना की गई और उसके पांच वर्ष उपरांत 1901 में प्रथम नोबेल पुरस्कार प्रदान किए गए।

आज यह विश्व का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार है। अल्फ्रेड नोबेल आज ‘मौत के सौदागर’ के रूप में नहीं अपितु एक महान वैज्ञानिक, समाजसेवी के रूप में और नोबेल पुरस्कार के लिए स्मरण किया जाते हैं।
-सतप्रकाश सनोठिया


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