Friday, January 23, 2026
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पूर्र्वजों का पिंडदान और श्राद्ध अनिवार्य

इंदिरा एकादशी के दिन पितरों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने से तीन पीढ़ी के पूर्वजों का उद्धार होता है। वहीं, व्यक्ति विशेष पर नारायण की कृपा बरसती है। भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक पितृ पक्ष रहता है। इस दौरान रोजाना पितरों का तर्पण किया जाता है।

पंडित पूरन चंद जोशी

इंदिरा एकादशी,17 सितम्बर, बुधवार। सनातन धर्म में पुनर्जन्म का विधान है। व्यक्ति को जीवन में किए गए कर्मों के अनुसार नया जीवन मिलता है। अच्छे कर्म करने वालों को उच्च लोक में स्थान मिलता है। वहीं, बुरे कर्म करने वालों को न केवल नारकीय जीवन से गुजरना पड़ता है, बल्कि मृत्यु के बाद भी यम यातना से गुजरना पड़ता है। इसके अलावा, नरक लोक में स्थान मिलता है।

गरुड़ पुराण में निहित है कि बुरे कर्म करने वालों के कुल में कपूत पैदा होते हैं, जो अपने पूर्वजों का श्राद्ध कर्म और पिंडदान नहीं करते हैं। साथ ही पितृ पक्ष के दौरान पितरों का तर्पण भी नहीं करते हैं। ऐसे लोगों के पूर्वजों को प्रेतयोनि में लंबे समय तक भटकना पड़ता है। पूर्वजों की आत्मा को शांति दिलाने हेतु उनका श्राद्ध और पिंडदान अनिवार्य है। इसके साथ ही पितृ पक्ष के दौरान तिथि अनुसार पूर्वजों का तर्पण करना चाहिए। ऐसा करने से पितृ तृप्त होते हैं। उनकी आत्मा को उच्च गति प्राप्त होती है। इंदिरा एकादशी के दिन पितरों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने से तीन पीढ़ी के पूर्वजों का उद्धार होता है। वहीं, व्यक्ति विशेष पर नारायण की कृपा बरसती है। भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक पितृ पक्ष रहता है। इस दौरान रोजाना पितरों का तर्पण किया जाता है। गरुड़ पुराण में पितरों के तर्पण और पिंडदान की पूरी विधि बताई गई है। व्यक्ति तिथि अनुसार पितरों का तर्पण करते हैं। इसके लिए आप कुल पंडित की भी सलाह ले सकते हैं। इस साल 07 सितंबर से लेकर 21 सितंबर तक पितृ पक्ष है।

इस वार , 16 तारीख मंगलवार में एकादशी तिथि का आरंभ रात में 12 बजकर 23 मिनट से होगा और 17 तारीख बुधवार की रात में 11 बजकर 40 मिनट तक एकादशी तिथि रहेगी। शास्त्रों के अनुसार, एकादशी तिथि का व्रत उस दिन किया जाता है, जिस दिन सुबह से समय एकादशी तिथि रहती है। ऐसे में 17 तारीख बुधवार को ही एकादशी का व्रत और श्राद्ध भी किया जाएगा। इस दिन गौरी योग का शुभ संयोग भी रहेगा चंद्रमा अपनी स्वराशि कर्क में विराजमान रहेंगे। जिससे गौरी योग बनेगा। ऐसे में व्रत और श्राद्ध कर्म करने वालों को पुण्य फल की प्राप्ति होगी। वैसे तो हर महीने 2 एकादशी तिथि आती हैं। लेकिन पितृपक्ष में आने वाली एकादशी तिथि को इंदिरा एकादशी के नाम से जाना जाता है।

इस एकादशी को अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत करने से और पुण्य कार्य करने से पितरों की मुक्ति मिलती है। साथ ही उन्हें मोक्ष मिलता है। इंदिरा एकादशी के दिन व्रत और तर्पण करने वालों के पितरों के पापों का नाश हो जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इस व्रत का पालन करने वालों को सुख समृद्धि, शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। इस व्रत को करने से किसी कारण से नरक में पड़े पितरों को भी मुक्ति मिल जाती है। वहीं, इस व्रत को करने से व्यक्ति को बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। साथ ही इस दिन अगर आप व्रत नहीं कर रहे हैं तो भगवान विष्णु की पूजा जरूर करें और काले तिल से तर्पण जरूर करें। इतने करने से भी आपको पितरों को शांति मिलेगी। साथ ही इस दिन पितरों के नाम से दान पुण्य जरूर करना चाहिए। एकादशी के दिन आप कुछ नियमों का ध्यान रखते हुए तुलसी की पूजा कर सकते हैं। इससे साधक को अच्छे परिणाम मिलते हैं। इसके लिए सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत हो जाएं। इसके बाद विधि-विधान से भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करें। अब बिना स्पर्श किए तुलसी जी की पूजा करें। इंदिरा एकादशी के दिन तुलसी पर 16 शृंगार का सामान जैसे लाल चुनरी, सिंदूर आदि अर्पित करें। और तुलसी माता की आरती करें। इसके बाद शाम के समय तुलसी के पास घी का दीपक जलाएं और 7 बार परिक्रमा करें। बस इस बात का ध्यान रखें कि एकादशी के दिन तुलसी में जल अर्पित नहीं करना चाहिए।

एकादशी के दिन भगवान विष्णु के भोग में तुलसी दल जरूर शामिल करना चाहिए, क्योंकि तुलसी के बिना भगवान विष्णु का भोग अधूरा माना जाता है। लेकिन एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ने की मनाही होती है। ऐसे में आप तुलसी के गमले में या आसपास गिरे हुए साफ तुलसी के पत्तों का धोकर इस्तेमाल कर सकते हैं। या फिर एक दिन पहले भी तुलसी के पत्ते उतारकर रख सकते हैं। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली इंदिरा एकादशी का विशेष महत्व माना गया है। यह दिन भगवान विष्णु की उपासना के साथ-साथ पितरों को प्रसन्न करने का श्रेष्ठ अवसर भी है। इस व्रत को रखने से पापों का क्षय होता है, साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती है। साधक को पितृ दोष से भी मुक्ति मिलती हैं। इस दिन पूजा-पाठ, दान-दक्षिणा और विशेष रूप से वस्त्र- दान का बड़ा महत्व है। श्रद्धा भाव से किया गया यह व्रत पितरों की आत्मा को शांत करता है और घर-परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। इस दिन पुनर्वसु नक्षत्र और परिध योग का संयोग बना, जिससे इस व्रत का महत्व और भी बढ़ गया है। ऐसे में केवल पितृ सूक्तंऔर विष्णु चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

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