राजनीतिक पंडितों का ऐसा मानना है कि गुजरे जमाने की चाणक्य की चार नीतियां वर्तमान दौर में अब लगभग अप्रासंगिक हो गई है। निरंतर परिवर्तित दौर में राजनीति के तौर तरीकों में भी आमूलचूल परिवर्तन आया है। कब, कौन, कहां और किसको दांव बता जाएं? इस बारे में पक्के तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता। व्यावहारिक रूप से देखा गया है कि बड़ा इस दल में होता है तो छोटा उस दल में होता है। ऐसा होने पर राजनीतिक दृष्टि से चित भी हमारी होती है और पुट भी। दरअसल जो कल तक राजनीति के शातिर खिलाड़ियों के दांवपेच हुआ करते थे, आजकल के जमाने में आम होते जा रहे है। ठेठ गांव की चौपाल से लेकर शहरों के कॉफी हाऊस तक एक से बढ़कर एक धुरंधर रोनाल्ड ट्रंप की खिंचाई करते हुए मिल जाते हैं। खैर।
राजनीति की शतरंज पर विभिन्न मोहरे परंपरागत चाल से हटकर डेढ़ी दूनी चाल चलने लगे हैं। कभी-कभी तो वजीर को भी प्यादे से मात खाने के लिए विवश हो जाना पड़ता है। कहते हैं कि परिस्थितियां सदैव एक समान नहीं होती। राजनीति में आकर कल तक के शोषित कब शोषक बन जाए, इस बारे में भी पक्के तौर पर कोई आकलन नहीं किया जा सकता। वैसे भी राजनीति में देखते-देखते दिन बदलने की परंपरा है। जो शख्सियत राजनीति में लंबे समय से कार्यरत है, यदि उसकी माली हालत जस की तस है – तो उसके होने या न होने के तो कोई मायने ही नहीं होते। मोदी जी लाख कहें, लेकिन यह जमाना ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’ के आधार पर थोड़े ही चला करता है।
आमतौर पर देखा गया है कि जो बिल्कुल नहीं खाता है, भला वह किसी और की परोसगारी क्या खाक कर सकेगा? हां, जहां तक नीति और सिद्धांतों पर आधारित राजनीति करने की बात है, तो इस जुमले को मात्र मुख शुद्धि के रूप में ही प्रयुक्त किया जाता है। वैसे जब जन्म जन्मांतर के शुभ कर्म उदय में आते हैं तब राजनीति में किसी मुकाम पर आकर ठहरना होता है। व्यावहारिक रूप से देखा गया है कि एक बार राजयोग मिलने पर आने वाली पीढ़ियों के भाग्योदय का समय आ जाता है। यही कारण है कि इन दिनों मैं अपने समूह को लामबंद करने की कोशिशों में प्रण-प्राण से लगा हुआ हूं।
सोचता हूं, बिना दबाव का प्रभाव रखें, राजनीति में अपना प्रादुर्भाव मुश्किल होगा। वैसे भी राजनीति में जब तक मतदाताओं का कोई समूह कहना मानने वाला न हो, तब तक राजधानी के नेता किसी को घास डालने वाले नहीं होते हैं। वैसे भी आजकल सीधी-सच्ची राजनीति की कोई पूछ परख ही कहां होती है? देखते देखते राजनीति में एक से बढ़कर एक चाल चली जाती है। कहीं पर निगाहें रखते हुए कहीं पर निशाना साध दिया जाता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि व्यक्ति या दल विशेष पर निशाना साध कर अपनी स्थिति का आकलन भी कर लिया जाता है। यही कारण है कि आए दिन घेराव, प्रदर्शन और हड़ताल के माध्यम से अपना अस्तित्व बताने के लिए कोई न कोई खटक्रम देखने को मिला करता है।

