- कोच के बिना कैसे लगेंगे सपनों को पंख, 18 खिलाड़ियों का भविष्य दांव पर
- स्टेडियम में बिना कोच के नहीं मिलती सुविधाएं, एक सीनियर दे रहा कोचिंग
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: तीरंदाजी में देश के लिए मेडल जीतने का सपना देख रहे 18 खिलाड़ियों का भविष्य दांव पर लगा है। स्टेडियम में बिना कोच के ही एक सीनियर खिलाड़ी की उपस्थिति में पसीना बहाने वाले यह खिलाड़ी इस उम्मीद से प्रैक्टिस कर रहे हैं कि कभी तो उनके सपनों को उड़ान मिलेगी, लेकिन यह सपने तभी साकार हो सकते हैं। जब इन खिलाड़ियों को कोच मिले, जिसकी फिलहाल उम्मीद कम ही नजर आ रही है।

शुक्रवार को मेरठ के कैलाश प्रकाश स्टेडियम के कोने में तीरंदाजी की प्रैक्टिस कर रहे खिलाड़ियों ने अपनी व्यथा बयां की। इन खिलाड़ियों ने बताया कि वह पिछले कई सालों से बिना कोच के ही पसीना बहा रहे हैं। उनका सपना है कि वह ओलंपिक जैसे बड़े आयोजन में देश का प्रतिनिधित्व करें और पदक लेकर आए, लेकिन बिना कोच के यह संभव नहीं है, क्योंकि मेरठ में तीरंदाजी के लिए न तो कोच उपलब्ध है और न ही स्पोर्ट्स अथारिटी आॅफ इंडिया (साई) का प्रतिनिधि है, जो इनकी प्रतिभा को परख सके।
फिलहाल इनके द्वारा बिना कोच के ही पसीना बहाया जा रहा है, जबकि दूसरे खेलों में कोच है। इनके मन में इस बात का भी मलाल है कि आखिर उन्हें कोच व स्टेडियम की सुविधाएं कब मिलेंगी। आखिर कब तक वह इसी तरह अपने सपनों को साकार करने के लिए प्रशिक्षक के आभाव में इस तरह प्रैक्टिस करते रहेंगे। हालांकि एक सीनियर खिलाड़ी अमित इनको प्रैक्टिस करा रहे हैं, लेकिन बिना किसी कोच के इनके आगे बढ़ने का रास्ता साफ नहीं हो सकता।
सीनियर खिलाड़ी अमित ने बताया कि कई खिलाड़ी दूर से आते हैं, उनके आने-जाने का किराया भी रोज लगता है। कुछ परिवारों की माली हालत भी ज्यादा अच्छी नहीं है, ऐसे में यह खिलाड़ी अपने बुलंद हौसले के साथ पसीना बहा रहे हैं, लेकिन अगर कोई कोच नहीं मिलता है तो इन खिलाड़ियों के सपने कभी पूरे नहीं होंगे। उनसे जितना बनता है, वह भी करते हैं, लेकिन सुविधाएं न मिलने से खिलाड़ियों का मन टूटता है।
कबड्डी मैदान के बराबर में करते हैं प्रैक्टिस
खिलाड़ियों ने बताया कि उनके लिए स्टेडियम में कोई प्रैक्टिस जोन नहीं है, पहले उनको प्रशिक्षण के लिए जगह भी नहीं मिलती थी, लेकिन कुछ दिनों पहले प्रांतीय क्रीड़ा अधिकारी ने कबड्डी मैदान के बराबर में जगह दी है, जो काफी कम है, साथ ही यहां पर इस बात का खतरा भी लगातार बना रहता है कि उनके तीर से कोई दूसरा खिलाड़ी घायल न हो जाए। इसका असर उनके खेल पर भी पड़ता है।
खुद ही खरीदे सभी उपकरण
खिलाड़ियों का कहना है कि एक तीर की कीमत साढ़े आठ हजार है, जबकि टारगेट की कीमत साढ़े चार हजार व फेस की कीमत 300 रुपये है, यह सभी सामान वह अपने पैसों से ही खरीदते है। स्टेडियम की तरफ से कोई मदद नहीं मिलती है। वहीं, अगर धातु के बने तीर-कमान को खरीदा जाए तो यह ढाई से तीन लाख रुपये में मिलता है। इसे पंजाब के पटियाला से मंगवाना पड़ता है, जो हर किसी के बस में नहीं है।

