विश्व पुस्तक मेला कई मायनों में विश्वस्तरीय सिद्ध हुआ है। इसने अनेक कीर्तिमान कायम कर दिए हैं। नई पुस्तकों के प्रकाशन का तो कदाचित रिकार्ड ही टूट गया है। जिस तेजी से तथा जिस मात्रा में पुस्तकें बरस रही हैं, उसे देख कर लग रहा है कि शीघ्र ही देश की आधी आबादी लेखक या कवि बन कर रहेगी। सरकारें खुश हो सकती हैं कि बेरोजगारी की आधी समस्या तो सॉल्व होने वाली है। कबाड़ी भी प्रसन्नता के सागर में गोते लगा सकते हैं कि उनका भविश्य नितांत उज्जवल रहने की संभावनाएं नजर आ रही हैं।
सोशल मीडिया पर भी पोस्ट दनादन बरस रही हैं। एक सज्जन की तो गद्य और काव्य विधा को मिलाकर तीस किताबें के जन्म और उनके नाडीच्छेदन (विमोचन) की सूचना ने तहलका मचा दिया है। संभवत:, यह भी पुस्तक मेले का एक रिकार्ड ही होगा? अब, तो लाइक का बटन दबाते तथा बधाई देते देते, अंगुलियां और आंखें दर्द करने लगी हैं। गर्दन और कंधे आराम की गुहार करने लगे हैं। स्वयं और मोबाइल सेट को विश्राम देने की सोच ही रहा था कि एक पोस्ट दनाक से कूदी। मेरे शहर की उदीयमान कवियत्री मिस चुलबुली की एक पोस्ट उदित हुई। उनकी विमोचित हुई पुस्तक को मुरादाबाद में एक पुरस्कार मिल गया था। चुलबुली मुस्कराते हुए अपना सम्मान ग्रहण कर रही थी।
किंतु मन में एक शंका ने जंप मारा। मिस चुलबुली ने जाने से पहले पुस्तक मेले में अपना चार दिन का कार्यक्रम बताया था। फिर वह और उसकी किताब दूसरे दिन अपनी मुराद पूरी करवाने मुरादाबाद कैसे पहुंच गयी? मैं फुनियाया, ‘कहां हो इस समय?’ ‘सर! पुस्तक मेले में।’ ‘फिर मुरादाबाद में सम्मान?’ चुलबुली खिलखिलायी, ‘अभी लेखक मंच के मंच पर हूं, बाद में बात करती हूं।’
मिस चुलबुली का कॉल नहीं आया और रात भर मेरा मन उस चट मंगनी पट ब्याह के तिलस्म में चुलबुलाता रहा। दूसरे दिन सायं तक अपनी उत्सुक्तता पर बमुश्किल काबू किए रहा फिर चुलबुली का नंबर डॉयल किया। नो रिप्लाई। तीसरे दिन भी वही हाल। अलबत्ता, उसकी पोस्ट बता रही थी कि उस काव्य संकलन की दो समीक्षाएं और विमोचन के कुछ समाचार अखबारों में अवश्य छपे हैं। पांचवें दिन, यह सोचकर कि सम्मानीय कवियत्री लौट चुकी होगी उसके घर पहुंचा। मुझे देखते ही चहकी, ‘आइए, सर!’
उसने सफाई दी, ‘सॉरी…सर, आपसे बात करने का टाइम ही नहीं मिला। काफी बिजी शिड्यूल रहा।’ मैंने कहा, ‘कोई बात नहीं पहले मुरादाबादी खबर का खुलासा करो।’ वह खिलखिलायी, ‘सर! आपसे क्या छुपाना। यह बात मेले में इसलिए नहीं बता सकी कि आस पास बहुत से लोग होते हैं। अपना मेला महान है, सर। वहां सब अरेंज हो जाता है, बस पर्स में दम होना चाहिए। मुझसे गलती यह हुई कि पुरस्कार की खबर मैंने, अतिउत्साह में दूसरे ही दिन डाल दी। जबकि मुझे हफ्ते दो हफ्ते ठहरना चाहिए था। आखिरकार, नई हूं ना। आप जैसा मार्गदर्शक तो वहां नहीं था।’

