Sunday, February 25, 2024
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मां पर शायरी ने मुनव्वर को रोशन किया

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Nazariya 22


RAMESH THAKURउर्दू साहित्य का विशाल वटवृक्ष रविवार की सर्द शाम को नवाबों के शहर लखनऊ में ढह गया। 26 नवंबर 1952 को उत्तर प्रदेश के जिले रायबरेली में जन्मे मशहूर शायर जनाब मुनव्वर राणा ने एक अस्पताल में अंतिम सांस लेकर नश्वर दुनिया को अलविदा कह दिया। खुदा ने उनके निधन की वजह दिल के दौरे के रूप में मुकर्रर की। जबकि थे कैंसर से पीड़ित। उनके न रहने की खबर सोमवार तड़के पूरे संसार में आग की तरह फैली, जिसने भी सुनी वह स्तब्ध रह गया। बड़ी-बड़ी हस्तियों ने दुख जताया। मुनव्वर के निधन से न सिर्फ उर्दू-साहित्य को नुकसान होगा, बल्कि अवधि-हिंदी भाषा को भी गहरा धक्का लगेगा। विश्व पटल पर उन्हें अवधि का खूब प्रचार-प्रसार किया। उर्दू शायरी में नया प्रयोग करके उन्होंने देशी भाषाओं को अपनी जुबान बनाई थी। राणा की कहीं प्रत्येक शायरी-कविता में ऐसी तल्खियां होती थीं, जो सियासतदानां को हमेशा नागवार गुजरी। उनकी प्रस्तुति में झलकता अलहदापन सुनने वालों को अपनी ओर खींचता था। मुनव्वर राणा का जन्म बेशक उत्तर प्रदेश में हुआ, लेकिन ज्यादा वक्त उन्होंने कोलकाता में ही बिताया। वहां उनके वालिद का छोटा-मोटा कारोबार था। बचपन में बह बेहद शरारती, नटखट व उधमी रहे। पारिवारिक सदस्य उन्हें ‘मोटू’ कहते थे, क्योंकि वह शुरू से ही शारीरिक रूप से हट्टे-कट्टे थे। पहलवानी का भी शौक था जिसका हुनर उन्होंने मदरसे में तालीम लेने के दौरान टीचर को पटक कर दिखाया था। गलती पर टीचर ने डांटा तो उन्हें चित कर दिया, उसके बाद राणा को उनके वालिद ने खूब पीटा, तभी से उन्होंने पहलवानी का शौक त्याग दिया।

राणा का इंतजार ‘पहलवानी का अखाड़ा’ नहीं, बल्कि ‘साहित्य जगत’ कर रहा था। कविताओं ने ही उनको ‘मोटू’ से ‘मुनव्वर राणा’ स्थापित किया। ये नाम उर्दू-साहित्य में सदैव अदब-सम्मान से लिया जाता रहेगा। साहित्य के अलावा अन्य सामाजिक मसलों पर उनकी बेबाक टिप्पणियां भी जगजाहिर रहीं। शायरी में शौहरत प्राप्ति की जहां तक बात है, तो मुनव्वर को सबसे ज्यादा प्रसिद्वी ’मां’ के स्नेह और रिश्तों पर उकेरी कविताओं से ही मिली। मां की ममता को दर्शाने वाली कविता की एक लाइन हमेशा सभी के दिलों में जिंदा रहेंगी।…. किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई, मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में मां आई…। इन लाइनों में भावुकता और मार्मिकता का ऐसा संगम समाहित है जिसे सुनकर रूहें कांप उठती हैं। एक वक्त था जब शायरी के लिए सजने वाली कोई ऐसी महफिल नहीं होती थी जिसे वह अपनी शायरी से न लूटते हों? जहां उनकी मौजूदगी होती थी, तो वहां दूसरे शायर जाने से भी कतराते थे। महफिलों के अनगिनत किस्से हैं जो उनसे जुड़े हुए हैं।

हैदराबाद के एक मुशायरे में अपने कलामों के बारे में एक दफे कहा था कि ‘वह गजल को कोठे से उठाकर मां तक ले आए हैं’। वह एक ऐसा संदेश था जिसने सीधे राजनीति पर प्रहार किया था। वहीं, दुबई एक मुशायरे में जब उन्होंने एक मां पर लिखी शायरी की एक लाइन पढ़ी, तो वहां बैठे दूतावास के एक बड़े अधिकारी बिलख-बिलख कर रोने लगे। उन्होंने तुरंत अपनी मां को फोन लगाया, और मांफी मांगी। बाद में पता चला उस अधिकारी की मां से कुछ दिनों से अनबन चल रही थी। उनकी शायरी में ऐसी ही ताकत थी कि बिछड़ों को भी एक करने का मादा रखती हैं। राणा बेबाक राजनीतिक बयानबाजी को लेकर बीते कुछ वर्षों से ज्यादा चर्चाओं में थे। उन्होंने योगी आदित्यनाथ के दोबारा जीतने पर लखनऊ से पलायन करने की भी बात कह दी थी। इसके अलावा उन्हें वर्ष 2014 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था जिसे बाद में उन्होंने लौटा दिया था। तब से वह कुछ ज्यादा ही सियासतदानों के निशाने पर आ गए। दरअसल, उनकी चुभने वाली बेबाक बयानबाजियां ही उन्हें हमेशा परेशान करती रहीं। गले के कैंसर से पीड़ित 71 वर्षीय इस शायर का विवादों से कभी नाता छूटा ही नहीं? कहते हैं कि प्रसिद्वी के साथ विवादों का जुड़ना स्वाभाविक हो जाता है, इसलिए राणा साहब भी अछूते नहीं रहे। हालांकि उनके विवाद इसलिए कमतर आंके जाते हैं क्योंकि उन्होंने उर्दू साहित्य विधा पर जो अमिट छाप छोड़ी, वह अकल्पनीय है। उनके योगदान को पीढियां याद रखेंगी। उनके जाने से उर्दू-साहित्य को नि:संदेह बड़ी क्षति होगी। इससे इतर मुनव्वर ने मां व अन्य रिश्तों को गजल के माध्यम से जो प्रस्तुति दी, उसे शायद ही कोई कभी भुला पाए।

कहतें हैं कि काबिलियत ही शख्स को शख्सियत में तब्दील करती है। मुनव्वर की सबसे बड़ी खासियत यही थी कि वह उर्दू के बड़े शायर होते हुए भी अपने शेरों में अवधी और हिंदी जमकर प्रयोग करते थे। इसी वजह से उनकी लोकप्रियता और तेजी से बढ़ी। उम्दा शैली का ऐसा शायर शायद ही अब कभी इस संसार को नसीब हो। उन्हें सिर्फ भारतीय श्रोता ही पसंद नहीं करते थे, समूचा संसार उनकी कविताओं को सुनने के लिए बेताब रहता था। हम नहीं थे, तो क्या कमी थी यहाँ। हम ना होंगे तो क्या कमी होगी।। मशहूर शायर मुनव्वर राणा का ये शेर उनके इंतकाल पर याद किया जा रहा है। ऐसे शायर कभी-कभार ही धरती पर अवतरित होते हैं। उनकी गैरमौजूदगी भविष्य में साहित्य संसार में ‘सूखे’ जैसा एहसास कराएगी।


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