यदि किसी में एक चतुर राजनेता की तरह घाघ मनोवृति नहीं है, तो कितना ही आसानी से भुनाया जा सकने वाला मुद्दा हाथ लग जाए, नतीजा कुल मिलाकर सिफर ही रहता है। इस तथ्य से मैं वाकिफ था, लिहाजा भैया जी से गणित ज्ञान लेने की सूझी। पहली फुर्सत में मैं उनके दरबार में सजदा करने चला गया। थोड़ी बहुत औपचारिकताओं के बाद मैं मूल विषय पर आया। बातों ही बातों में भैया जी ने गणित ज्ञान दिया कि मुद्दा पका पकाया कभी नहीं मिलता, मुद्दे में से मुद्दे को निकालना पड़ता है। इसके पश्चात मुद्दे को भुनाने के पहले मुद्दे को गरम करना होता है। जब मुद्दा गरम हो जाए, तो बस बिना समय गवाएं अपने वाली पर आ जाया जाए।
संचार तंत्र से निरंतर मुद्दों का प्रवाह होता आया है। लिहाजा प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा अपनी ढफली अपना राग के तहत प्रवाहित समाचारों का विश्लेषण कर लेने के उपरांत एक अदद मुद्दा हाथ आया। मुद्दा यह था कि मीडिया को बिकाऊ और टिकाऊ, इन दो श्रेणियों में बांटकर मीडिया की एकता और अखंडता को तार-तार कर देने की कोशिशें क्यों की जा रही है? सवाल गहरा था, विचारों की दुनिया में गोते लगाता रहा। आखिरकार इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि किसी भी मुद्दे को लेकर हवा देना या फिर उस मुद्दे को हवा में उड़ा देना, मीडिया के विवेकाधिकार के अंतर्गत आता है। ऐसे में मीडिया द्वारा प्रसारित खबरें किसी को मीठी लगती है और किसी को कड़वी लगती है। कभी-कभी खबरें तीखी लगती है और कभी-कभी चीठी लगा करती है।
मैंने पाया कि कोई भी मुद्दा किसी अन्य मुद्दे से ही निकलता है। संचार तंत्र द्वारा जो परोसा जाता है ,कुल मिलाकर आम नागरिकों को वह बहुत स्वादिष्ट लगा करता है। जैसे-जैसे मुद्दा एक हाथ से गुजर कर दूसरे हाथ में जाता है, वैसे-वैसे मुद्दे का स्वरूप बदलता जाता है। बदले हुए रूप में मुद्दे में से मुद्दा निकाल लेना आसान काम नहीं होता। इस काम को करने में राजनीतिज्ञ सिद्धहस्त हुआ करते हैं। यदि आप मुद्दे में से मुद्दा नहीं निकाल सकते, तो आप निश्चित ही राजनीति में सर्वथा अप्रासंगिक सिद्ध हो जाएंगे। दरअसल राजनीति में सफल सिद्ध होने की पहली शर्त यही है कि आपकी नजरें मुद्दे को तलाशने और उसे भुनाने में पारंगत हो।
राजनीति की प्रचलित परंपरा में यह सामान्य सिद्धांत की बात है कि किसी भी मुद्दे को प्रभावशाली तरीके से केवल नेता ही उछाल सकता है।आज तक ऐसा देखने में न आया कि कार्यकर्ता ने कोई मुद्दा उठाया हो और वह मुद्दा देश-प्रदेश की राजनीति में अहम मुद्दा बन गया हो। कार्यकर्ता केवल सुरसुरी छोड़ सकते हैं, मुद्दे को उठाने की दिशा में नेता के लिए ही यह अधिकार सुरक्षित है। राजनीति में कुछ शख्सियत ऐसी भी होती है जो निरंतर मुद्दे उछाला करती है। राजनीति के बाजार में ऐसी शख्सियत का बहुत मोल है। ये इतने मुद्देबाज होते हैं कि इनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व भी मुद्दे की बात बन जाया करता है। ऐसी शख्सियत भस्मासुर की स्थिति में होती है। आमतौर पर इन पर दलीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की जुर्रत कोई नहीं करता।
हाथी बचेंगे तो जंगल भी बचेंगे
जब सारा देश महालक्ष्मी की पूजा की तैयारी कर रहा था, उसी दौरान जारी की गई रिपोर्ट ने देश के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दीं, जिसमें बताया गया था कि हमारे देश के जंगलों से गजराज की संख्या तेजी से कम हो रही है। दुनिया में पहली बार यह गणना नई डीएनए तकनीक से की गई, जिसमें हर एक हाथी की पहचान उसके जेनेटिक सिग्नेचर से की जाती है। इस गणना से उजागर हुआ कि पिछले 8 साल में करीब 25 फीसदी हाथी जंगलों में कम हो गए। विदित हो 2017 में 29964 हाथी गिने गए थे, जबकि ताजा गणना में संख्या 22446 हो गई। समझना होगा कि हाथी किसी भी जंगल के अच्छे स्वास्थ्य का प्रतीक हैं। हाथी जंगल को विस्तार देने और संरक्षित करने में बड़ी भूमिका निभाता है।
जब दस्तावेज कहते हैं कि जंगल की सेहत सुधार रही है तो आखिर हाथी कैसे कम हो रहे हैं? यह जानने के लिए अक्टूबर महीने के आखिर आठ दिन में देश एक अलग-अलग हिस्सों में घटित घटनाएं काफी हैं। 29 अक्तूबर को छत्तीसगढ़ रायगढ़ जिले में सराईमूढ़ा के तालाब में 20 जंगली हाथियों का झुंड अठखेलियां कर रहा था, तब एक मादा शिशु हाथी तालाब के दलदल में फंस गई, हाथियों के झुंड ने सारी ताकत लगा कर उस बच्चे को बाहर निकाल लेकिन तब तक उसके प्राण निकल चुके थे। यही नहीं, इस जिले में बीते दस महीनों एक दौरान दलदल में फंसने के कारण छह शावक मारे जा चुके हैं। 25 अक्तूबर को यूपी के सहारनपुर जिले में शिवालिक रेंज में खेत से गुजरते एक हाथी की मौत इस लिए हो गई, क्योंकि वहां हाई टेंशन बिजली लाइन इतने नीचे थी कि वह हाथी से छू गई और हाथी का शरीर वहीं भस्म हो गया। 23 अक्तूबर को असम के मशहूर होजाई-पश्चिमी कार्बी आंगलांग हाथी गलियारे में कपिली नदी के किनारे दो मादा हाथी मरे मिले। जांच में पता चला कि उस इलाके में ग्रामीण खेतों को जानवरों से बचाने के लिए ‘जटका’ नामक बिजली की जुगाड़ करते हैं और ये हाथी उसी की चपेट में आ कर मारे गए। अभी दो दशक पहले तक ओडिशा हाथियों के मामले में बेहद सम्पन्न था लेकिन जैसे- जैसे खनन और अन्य आयोजनों के लिए जंगल घटे, राज्य हाथियों का कब्रगाह बनता गया। 2014-25 (फरवरी) तक 158 हाथी बिजली के करेंट से मारे गए। इस साल अभी तक राज्य में 97 गजराज काल के गाल के असमय समा गए जिनमें 32 करेंट से, तीन शिकार और तीन रेल पटरी पर मारे गए।
असल में हाथी को अपने शरीर की विशालता के कारण ढेर सारा भोजन व पानी चाहिए होता है। हाथियों के 100 लीटर पानी और 200 किलो पत्ते, पेड़ की छाल आदि की खुराक जुटाने के लिए हर रोज 18 घंटे तक भटकना पड़ता है। गौरतलब है कि हाथी दिखने में भले ही भारी भरकम है, लेकिन उसका मिजाज नाजुक और संवेदनशील होता है। थोड़ी थकान या भूख उसे तोड़ कर रख देती है। प्राकृतिक संसाधनों के सिमटने के चलते भूखा-प्यासा हाथी अपने ही पारंपरिक इलाकों में जाता है तो वहां उसे अब बस्ती, सड़क का जंजाल दिखता है।
‘द क्रिटिकल नीड आफ एलिफेंट’ डब्लूडब्लूएफ-इंडिया की यह रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में इस समय कोई 50 हजार हाथी बचे हैं, इनमें से साठ फीसदी का आसरा भारत है। देश के 14 राज्यों में 32 स्थान हाथियों के लिए संरक्षित हैं। यह समझना जरूरी है कि धरती पर इंसान का अस्तित्व तभी तक है जब तक जंगल हैं और जंगल में जितना जरूरी बाघ है उससे अधिक अनिवार्यता हाथी की है।
वन पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता को सहेज कर रखने में गजराज की महत्वपूर्ण भूमिका है। पर्यावरण-मित्र पर्यटन और और प्राकृतिक आपदाओं के बारे में पूर्वानुमान में भी हाथी बेजोड़ हैं। अधिकांश संरक्षित क्षेत्रों में, आबादी हाथियों के आवास के पास रहते हैं और वन संसाधनों पर निर्भर हैं। तभी जंगल में मानव अतिक्रमण और खेतों में हाथियों की आवाजाही ने संघर्ष की स्थिति बनाई और तभी यह विशाल जानवर खतरे हैं। एक बात जान लें किसी भी जंगल के विस्तार में हाथी सबसे बड़ा ‘बीज-वाहक’ होता है। वह वनस्पति खाता है और लीद भोजन करने के 60 किलोमीटर दूर तक जा कर करता है और उसकी लीद में उसके द्वारा खाई गई वनस्पति के बीज होते हैं। हाथी की लीद एक समृद्ध खाद होती है और उसमें बीज भली-भांति प्रस्फुटित होता है। जंगल का विस्तार और पारंपरिक वृक्षों का उन्नयन इसी तरह जीव-जंतुओं द्वारा नैसर्गिक वाहन से ही होता है। यही नहीं हाथी की लीद कई तरह के पर्यावरण मित्र कीट-भृगों का भोजन भी होता है। ये कीट ना केवल लीद को खाते हैं, बल्कि उसे जमीन के नीचे दबा भी देते हैं, जहां उनके लार्वा उसे खाते हैं। इस तरह से कीट कठोर जमीन को मुलायम कर देते हैं। इससे वहां जंगल उपजने का अनुकूल परिवेष तैयार होता है।
घने जंगलों में जब हाथी ऊंचे पेड़ों से पत्ती तोड़ कर खाता है तो वह एक प्रकार से सूरज की रोशनी नीचे तक आने का रास्ता भी बनाता है। फिर उसके चलने से जगह-जगह जमीन कोमल होती है और उस तरह जंगल की जैव विविधता को फलने-फूलने का मौका मिलता हैं। हाथी भूमिगत या सूख चुके जल-साधनों को अपनी सूंड, भारी भरकम पैर व दांतों की मदद के खोदते हैं। इससे उन्हें तो पानी मिलता ही है, जंगल के अन्य जानवरों की भी प्यास बुझती हैं। कहना गलत ना होगा कि हाथी जंगल का पारिस्थितिकी तंत्र इंजीनियर है। उसके पद चिन्हों से कई छोटे जानवरों को सुरक्षित रास्ता मिलता है। हाथी के विशाल पद चिन्हों में यदि पानी भर जाता है तो वहां मेंढक सहित कई छोटे जल-जीवों को आसरा मिल जाता है। यह वैज्ञानिक तथ्य है कि जिस जंगल में यह विशालकाय शाकाहारी जीव का वास होता है वहां आमतौर पर शिकारी या जंगल कटाई करने वाले घुसने का साहस नहीं करते और तभी वहां हरियाली सुरक्षित रहती है और साथ में बाघ, तेंदुए, भालू जैसे जानवर भी निरापद रहते हैं।
इसी साल मार्च में हाथियों और मानव के बीच बढ़ते संघर्ष को देखते हुए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, प्रोजेक्ट एलीफेंट के तहत 22 राज्यों में जंगल से सटे गांवों को ‘अर्ली अलर्ट सिस्टम’ से जोड़ने की घोषणा की थी, ताकि गांव के आसपास हाथियों की हलचल बढ़ने पर उन्हें सतर्क किया जा सके। इस दौरान प्रभावित गांवों में सायरन और सेंसर लगाने की योजना थी, जिससे हाथियों के आने पर तेज आवाज करके सभी को सतर्क कर देंगे। इसके साथ ही हाथियों के मूवमेंट की जानकारी वन महकमे को भी सेंसर के जरिए तुरंत मिल जाएगी। लेकिन हाल की घटनाओं से स्पष्ट है कि सेंसर योजना अभी फाइलों से निकाल कर जंगल तक आई नहीं है।

