Tuesday, March 10, 2026
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संभावित ऊर्जा संकट और भारत

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इस्राइल और अमेरिका द्वारा संयुक्त तौर पर 28 फरवरी को ईरान के विरुद्ध प्रारंभ की गई की भीषण जंग फिलहाल थम जाने का नाम नहीं ले रही है। समस्त खाड़ी क्षेत्र इस विनाशकारी जंग की जद में पूर्णतया आ चुका है। ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया गया है और ऐलान किया गया है कि रूस और चीन के मालवाहक जहाजों के अतिरिक्त अगर किसी भी अन्य देश का जहाज इससे निकलने की कोशिश करेगा तो फिर उस पर सैन्य आक्रमण अंजाम दिया जाएगा। उल्लेखनीय है कि भारत का तकरीबन 40 प्रतिशत तेल आयात होर्मुज स्ट्रेट के माध्यम से ही होता रहा है। भारत अपनी आवश्यकता का तकरीबन 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। भारत सरकार का दावा है कि भारत में फिलहाल तेल और गैस की कोई किल्लत नहीं है। लेकिन होमुर्ज स्ट्रेट के आसपास चल रहे भयंकर युद्ध ने एकदम स्पष्ट कर दिया है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा किसी तरह से एक संकरे होर्मुज स्ट्रेट पर निर्भर है।

युद्ध के कारणवश भारत के लिए अत्यंत संकट पूर्ण घड़ी उपस्थित हो गई है, क्योंकि भारत के कुल आयातित कच्चे तेल का तकरीबन 40 प्रतिशत अर्थात प्रतिदिन 27 लाख बैरल कच्चा तेल होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते से गुजर कर आता है। भारत के लिए कच्चा तेल मुख्य रूप से इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत आदि गल्फ देशों से आयातित किया जाता है। यदि दुर्भाग्य से यदि युद्ध लंबा खींच जाता है तो फिर भारत के लिए बड़ी भारी दुश्वारियां उत्पन्न हो जाएगी, क्योंकि तेल के दामों में प्रति बैरल दस डॉलर की बढ़ोतरी भी हो जाती है तो उसका पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर थोप दिया जाता है। आने वाले संकट पूर्ण दौर में भारत में महंगाई की दर और अधिक बढ़ सकती है। प्राकृतिक गैस-एलएनजी के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता मुल्क कतर ने ईरान के निरंतर ड्रोन आक्रमणों के तत्पश्चात बेहद खराब परिस्थितियों का हवाला देते हुए प्राकृतिक गैस का उत्पादन को रोक देने का फैसला लिया गया है। उल्लेखनीय है कि तकरीबन तीन करोड़ टन लिक्वेफाइड नेचुरल गैस-एलएनजी की 40 फीसदी आपूर्ति कतर से भारत के लिए की जाती रही है। एलएनजी गैस आयात करने वाली कंपनी पेट्रोनेट एलएनजी लिमिटेड ने भी अपने ग्राहकों गेल इंडिया और इंडियन आयल कारपोरेशन को आपूर्ति रुक जाने की सूचना दे दी गई है।

डोनाल्ड ट्रंप अनेक दफा यह ऐलान कर चुके हैं कि भारत द्वारा रूस से तेल खरीदा जा रहा है। इस तेल खरीद से यूक्रेन के खिलाफ जंग जारी रखने में रूस को बेहद मदद मिल रही है। प्रेसिडेंट ट्रंप का भारत पर इल्जाम है कि रूस इस दौलत का इस्तेमाल करके यूक्रेन के विरुद्ध निरंतर जंग संचालित करता रहा है। भारत सरकार का कहना है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों को मद्देनजर रखते हुए रूस से तेल खरीदता रहा है और दुनिया के अन्य देश भी ऐसा ही करते रहे हैं। अमेरिका और भारत के मध्य रूस से तेल खरीदारी करने का सवाल एक बड़ा संगीन मुद्दा बन चुका है। फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की आमद को निरंतर बनाए रखने की गरज से अमेरिका के वित्त मंत्री एस्कॉर्ट बेसेंट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा है कि भारतीय रिफाइनरियों को रुस से तेल खरीदने के लिए 30 दिनों की मुकम्मल छूट प्रदान कर दी गई है। अमेरिकन सरकार द्वारा रूस से तेल खरीदने पर भारत पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ आयद कर दिया गया था। अतिरिक्त टैरिफ आयद करने के बाद भारत पर कुल 50 प्रतिशत अमेरिकन टैरिफ आयद कर दिया गया था। लेकिन अमेरिका से भारत की ट्रेड डील संपन्न हो जाने के तत्पश्चात 50 फीसदी टैरिफ को घटाकर 18 फीसदी कर दिया गया है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फरमाया था कि भारत द्वारा रूस से तेल खरीदारी खत्म करने का वादा किया गया है। अत: इसीलिए भारत के साथ ट्रेड डील अंजाम दी जा रही है और भारत पर आयद किए गए 50 प्रतिशत टैरिफ को घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है। हालांकि भारत ने सरकार ने कहा था कि देश के डेढ़ अरब नागरिकों की ऊर्जा जरूरतों और सुरक्षा अंजाम देना उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता बनी रहेगी। भारत में तेल रिफाइनरी कंपनियों रुस से आयातित कच्चे तेल को रिफाइन करके कई देशों को निर्यात भी करती रही हैं। मैरिटाइम इंटेलिजेंस कंपनी केप्लर ने बताया है कि भारत के पास रिफाइनरी और कमर्शियल स्टोरेज में तकरीबन 10 करोड़ बैरल कच्चा तेल विद्यमान है। इस में से तकरीबन 90 फीसदी का इस्तेमाल किया जा सकता है। जो कि भारत के लिए तकरीबन 35 दिनों की जरूरतों को है पूरा कर सकता है। अनेक अंतरराष्ट्रीय विवेचकों की राय है की ईरान विरुद्ध अमेरिकी इस्राइल युद्ध वस्तुत यूक्रेन रूस जंग की तरह लंबे काल तक नहीं चल सकता है। लेकिन इस युद्ध के 15 दिनों से अधिक खींच जाने पर भारत पर ऊर्जा संकट का गहन गंभीर असर पड़ सकता है।

इस्राइल और अमेरिका द्वारा संयुक्त तौर पर सैन्य आपरेशन एपिक फ्यूरी के तहत ईरान पर विनाशकारी आक्रमण अंजाम दिया गया। खास तौर पर ध्यान केंद्रित योग्य तथ्य है कि विगत कुछ वर्षों के दौर में चीन की साम्यवादी हुकूमत द्वारा अरबों खरबों बिलियन डॉलर खर्च करने के बाद ईरान में आधुनिकतम अस्त्र शस्त्रों का निर्माण करने की खातिर की भारी बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया गया है। पहले डोनॉल्ड ट्रंप द्वारा वैनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो का अपहरण अंजाम दिया गया और वेनेजुएला की राजसत्ता और तेल को अपने काबू करने के बाद ट्रंप साहब द्वारा ईरान में अपनी पसंद की हुकूमत कायम करने के लिए ईरान पर सैन्य आक्रमण अंजाम दिया गया। सर्वविदित है कि विश्व पटल पर अमेरिका और चीन दो सबसे शक्तिशाली सैन्य ध्रुव हैं। रूस भी वस्तुत: यूक्रेन युद्ध चीन की जबरदस्त सैन्य इमदाद के दमखम ही पर लड़ता रहा हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इस्राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू का यह अनुमान एकदम गलत सिद्ध हुआ कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व को हलाक करके वह ईरान में यथाशीघ्र सत्ता परिवर्तन अंजाम दे देंगे। ईरान की फौज के प्रबल प्रतिरोध को देखते हुए ईरान बनाम अमेरिका इस्राइल जंग लंबी भी खींच सकती है फिर तो भारत को जबरदस्त तौर पर तेल संकट का सामना करना पड़ेगा।

रूसी तेल की प्रबल आपूर्ति के कारण चीन को संभवत तेल आपूर्ति संकट का अधिक सामना नहीं करना पड़ेगा। अमेरिका के टैरिफ कूटनीतिक दबाव के कारण भारत द्वारा रूस से आयात किए जाने वाले कच्चे तेल की मात्रा आधी से भी कम कर दी गई है। किंतु भारत-अमेरिकी व्यापार डील की रूस विरोधी शर्तों को यदि भारत द्वारा स्वीकार किया जाता है तो फिर हम ऊर्जा संकट से कदाचित नहीं बच सकेंगे। भविष्य में क्या होगा?

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