गौतम बुद्ध अपने शिष्यों को प्रतिदिन उपदेश दिया करते थे। लेकिन उपदेशों का लाभ कुछ ही लोगों को मिल पाता था। एक दिन बुद्ध के शिष्य ने उनसे पूछा, तथागत! क्या आप के सत्संग सुनने वाले सभी लोगों का कल्याण होता है? क्या सभी लोगों के दुख दूर होते हैं? बुद्ध ने कहा, कुछ का होता है और कुछ का नहीं होता है।
शिष्य ने फिर पूछा, आपके उपदेशों को सुनने के बाद भी सभी लोगों को शांति क्यों नहीं मिलती है। महात्मा बुद्ध ने ने इस प्रश्न के उत्तर में एक प्रश्न पूछा, अगर कोई व्यक्ति तुमसे राजमहल जाने का रास्ता पूछे और तुम्हारे रास्ता बताने के बाद भी भटक जाए तो तुम क्या करोगे।
शिष्य ने कहा, तथागत! मेरा काम सिर्फ उसे रास्ता बताने का है अगर वह फिर भी रास्ता भटक जाता है तो मैं क्या कर सकता हूं? बुद्ध ने कहा, ठीक इसी तरह मेरा काम भी लोगों का मार्गदर्शन करने का है। मैं लोगों को सिर्फ सही और गलत का अंतर बता सकता हूं।
मैं जो उपदेश देता हूं उन्हें जीवन में उतारना या नहीं उतारना, यह निर्णय लोगों को ही करना है। जो लोग अच्छी बातों को जीवन में उतार लेते हैं, उनका कल्याण हो जाता है। जो लोग इन बातों को नहीं अपनाते, वे हमेशा दुखी रहते हैं और भटकते रहते हैं।
उपदेश तो सिर्फ रास्ता दिखाते हैं उन पर चलना है या नहीं चलना, यह निर्णय हमें करना होता है। बुद्ध ने आगे कहा, मुझे ज्ञात है मेरे उपदेश सुनने वाले लोगों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती जाएगी। पर यहां आने वाले लोगों में से बहुत से ऐसे लोग हैं, जो किसी चमत्कार की अभिलाषा से आते हैं।
वे कुछ दिनों में ही आना बंद कर देते हैं। शेष आने वाले लोगों में से ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है, जो मेरे उपदेशों का पूर्ण अनुसरण करते हैं। जो विश्वास करके करते हैं, उनके सभी दुख और परेशानियां भी स्वत: समाप्त हो जाती हैं।