Wednesday, March 25, 2026
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यूपी को बांटने की तैयारी!

 

SAMVAD


KP MALIK18वीं लोकसभा के लिए हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में जिस प्रकार से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके खासमखास भाजपा के चाणक्य अमित शाह के सपनों से बहुत दूर उत्तर प्रदेश में चुनावी रिजल्ट आया है, उससे गुजरात की इस जोड़ी में एक बेचैनी है। जाहिर है कि जिस उत्तर प्रदेश में 80 का नारा देकर ये जोड़ी तीसरी बार केंद्र में जाने के लिए कम से कम वो उन सभी सीटें जीतना चाहती थी, जिन पर उन्होंने अपनी पार्टी यानि भाजपा के उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। उत्तर प्रदेश में एकतरफा जीत का दावा करने वाले भाजपा के दिग्गजों का सपना 33 सीटों पर ही आकर टूट गया। अब इस हार का ठीकरा किसके सिर पर फोड़ा जाए, इसे लेकर काफी दिनों से अंदरखाने काफी कुछ चलता रहा, लेकिन किसी ने भी इस हार के अपने माथे पर नहीं फोड़ने दिया। जानकारों का मानना है कि एक तरफ जहां प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से इस करारी हार की वजह पूछी और इस हार पर मंथन करने को कहा, तो वहीं जब मुख्यमत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा की मीटिंग बुलाकर हारी हुई लोकसभा सीटों के लिए जिम्मेदार अपने सभी मंत्रियों और विधायकों से इसके बारे में पूछा, तो कुछेक को छोड़कर या तो किसी ने जवाब ही नहीं दिया या फिर जवाब दिया, तो इसके लिए खुद को जिम्मेदार नहीं माना। वहीं दोनों उप मुख्यमंत्री यानि केशव प्रसाद मौर्य, जो न तो अपनी खुद की पिछली बार विधानसभा सीट जीत पाए थे और न ही इस बार उनके क्षेत्र में उनका प्रदर्शन कुछ खास रहा और दूसरे बृजेश पाठक दोनों ही इस बैठक में नहीं पहुंचे और न ही अपने खराब प्रदर्शन के लिए अपने मुख्यमंत्री को कोई जवाब ही दिया। जानकारों का कहना है कि ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह खासे बेचैन हो चुके हैं और अब किसी भी तरह उत्तर प्रदेश में कुछ ऐसा करना चाहते हैं, जिससे अगली बार किसी एक के सहारे नहीं, बल्कि कई नेताओं के सहारे उत्तर प्रदेश से उन्हें ज्यादा से ज्यादा सीटें दिलाकर फिर से केंद्र में ले आएं।

दरअसल, बात तो अब उत्तर प्रदेश के बंटवारे की अंदरखाने चल रही है, जो केंद्र में मोदी सरकार के कमजोर होने के चलते अभी खुलकर सामने नहीं आ रही है। मोदी-शाह ऐसा इसे करने के लिए सही मौके का इंतजार कर रहे हैं। दिल्ली का मानना है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की जो करारी हार हुई है, वो कहीं न कहीं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ही खेल था, क्योंकि उन्हें पार्टी में ये दोनों शीर्ष नेता कहीं न कहीं आगे बढ़ने से रोकना चाहते हैं और उन्हें चलाकर उत्तर प्रदेश में भी बहुत ही सीमित रखना चाहते थे, और ये सब इसलिए वो कर रहे हैं, क्योंकि पिछले कई सालों से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समर्थक उन्हें भावी प्रधानमंत्री के रूप में न सिर्फ देख रहे हैं, बल्कि ये मांग भी उठा रहे हैं। बल्कि अभी हाल ही में तो ये बात भी योगी समर्थकों ने जोर-शोर से उठाई थी कि जब 26 सीटों वाले गुजरात से कोई प्रधानमंत्री बन सकता है, तो फिर 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेश से योगी प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सकते?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लगने लगा है कि उनकी कुर्सी के लिए दो ही लोग खतरा बन सकते हैं, एक उनकी पार्टी के ही कुछ लोग, जिनमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम सबसे ऊपर है और दूसरे वो विपक्षी नेता, जो आज भी काफी ताकतवर हैं और खास तौर पर इस बार हुए लोकसभा चुनाव के बाद और ताकतवर हो गए हैं। ऐसे विपक्षी नेताओं में उत्तर प्रदेश में सपा प्रमुख अखिलेश यादव हैं। जाहिर है कि इस बार जिस प्रकार का लोकसभा का रिजल्ट सामने आया है, उससे भाजपा के 400 पार के आंकड़े को दूर-दूर तक कहीं नहीं छुआ और इसका असर अब आगामी विधानसभा चुनावों पर भी पड़ना लाजिÞमी है। अगले करीब 6 महीने के अंदर हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड के विधानसभा चुनाव होने हैं और इन तीनों ही राज्यों में भाजपा को करारी हार मिलने का खतरा है, जिसे प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह दोनों ही बखूबी भांप चुके हैं। और अगर ऐसा हुआ, तो फिर ये जोड़ी केंद्र में और भी कमजोर हो जाएगी।

मेरे सूत्र बताते हैं कि शीर्ष नेतृत्व में अंदरखाने उत्तर प्रदेश के बंटवारे को लेकर गंभीर चर्चा हो रही है। हालांकि नरेंद्र मोदी और अमित शाह जानते हैं कि इस बार की अपनी कमजोर सरकार के चलते उत्तर प्रदेश में मिली करारी हार का बदला लेने के लिए योगी आदित्यनाथ को सीधे नहीं हटा सकते, वो भी तब और नहीं जब उनके कंधे पर संघ का हाथ रखा हो। इसलिए एक ही वार में योगी आदित्यनाथ का कद छोटा कर दिया जाए, यानि एक तीर से दो निशाने लगेंगे। एक निशाना योगी आदित्यनाथ पर लगेगा और वो एक छोटे प्रदेश के मुख्यमंत्री रह जाएंगे और दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में लोकसभा सीटों के लिहाज से सबसे मजबूत हो चुके अखिलेश यादव की कमर भी इससे टूट जाएगी यानि उनका कद भी छोटा हो जाएगा।
दिल्ली में भाजपा के अंदरखाने नेतृत्व में ऐसी योजना है कि उत्तर प्रदेश के कम से कम तीन हिस्से करके उसे बांट दिया जाए, जिसमें एक-एक बंटे हुए प्रदेश को 26 से 27 सीटों में बांट दिया जाए। मंथन इस बात का चल रहा है कि उत्तर प्रदेश को तीन हिस्सों में बांटा जाए या चार हिस्सों में? मेरी जानकारी के मुताबिक उत्तर प्रदेश को तीन हिस्सों में बांटने की बात अधिक चल रही है, जिसमें से एक पश्चिमी उत्तर प्रदेश, एक अवध प्रदेश और एक पूर्वांचल बनेगा। इस कदम से न सिर्फ योगी आदित्यनाथ अवध प्रदेश में सिमट कर रह जाएंगे या फिर उन्हें पूर्वांचल का मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा, जिसकी अधिक संभावना है। दूसरी तरफ अखिलेश यादव की ताकत घट जाएगी, क्योंकि उनकी अपनी 37 सीटें तीन हिस्सों में यानि तीनों प्रदेशों में बंट जाएंगी।

पश्चिम उत्तर प्रदेश के लोग तो पहले से ही अलग राज्य की मांग करते रहे हैं। साल 2000 में जब उत्तर प्रदेश को बांटकर उससे उत्तराखंड को अलग किया गया था, तो लोगों ने इस बंटवारे का बिलकुल भी विरोध नहीं किया था। इसके बाद जब 2007 में बसपा की उत्तर प्रदेश में सरकार बनी और मायावती प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं, तो उन्होंने उत्तर प्रदेश के बंटवारे का प्रस्ताव उस समय की केंद्र की कांग्रेस सरकार को भेजा था, लेकिन वो केंद्र की कांग्रेस सरकार ने मंजूर नहीं किया और बंटवारे का मामला लटक गया। लेकिन अब शायद कांग्रेस को भी इस प्रदेश के बंटवारे में शायद ही कोई आपत्ति हो। बाकी मायावती तो पहले से ही ऐसा चाहती हैं। कुछ दिन पहले इस विषय पर जब मैंने यह खबर लिखी थी तो कई लोगों के प्रश्न आए थे कि अगर राज्य की सरकार सहमत ना हो तो उस स्थिति में राज्य का पुनर्गठन हो सकता है या नहीं? उसका जवाब यह है कि भारतीय संविधान के आर्टिकल-3 के मुताबिक राष्ट्रपति के अनुमोदन के बाद संसद में सामान्य बहुमत से बिल पास करके नए राज्य का गठन किया जा सकता है। इसमें उस राज्य की विधानसभा का मत लेना तो आवश्यक है परंतु वह मत हां हो या ना हो, वह संसद पर बाध्यकारी नहीं होता। अत: आर्टिकल-3 के मुताबिक संसद के पास ही राज्य पुनर्गठन का संपूर्ण अधिकार निहित है। खैर उत्तर प्रदेश का बंटवारा हो सकेगा या नहीं, ये तो नहीं पता लेकिन ये तय है कि अगर मोदी सरकार ऐसा करती है तो कुछ तनाव तो अवश्य बढ़ेगा और ये तनाव सबसे ज्यादा भाजपा में ही होगा।


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