Thursday, March 26, 2026
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अंतिम नागरिक तक पहुंचे समृद्धि

04 11

भारत केवल 1947 में जन्मा नवीन राष्ट्र नहीं, अपितु सप्तसिन्धु की गोद में पला, वेदों के स्वर में गूंजता, उपनिषदों की चिंतनधारा में बहता, एक प्राचीन राष्ट्र है, जिसकी सांस्कृतिक चेतना हजारों वर्षों से अक्षुण्ण रही है। भारतवर्ष की पहचान सनातन सांस्कृतिक मूल्यों से है। हम भारत माता की जय बोलते हैं जो धर्म, दर्शन, साहित्य, संगीत, कला और जनमानस की राष्ट्रीय चेतना की प्रतीक हैं। यह जयघोष बताता है कि भारत हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक और द्वारका से लेकर कामरूप तक भाषा, बोली और सामाजिक परंपराओं में विविधता होते हुए भी विचारों में एक है। भारत का स्वतंत्रता संग्राम मात्र राजनीतिक मुक्ति की लड़ाई नहीं थी, यह आत्म-स्मृति की पुन:स्थापना का एक ऐसा संकल्प था, जो शोषण के विरुद्ध जनगण के अंतर्मन से उठी पुकार बन गया। यह वही संघर्ष था, जो महात्मा गांधी की करुणा, भगत सिंह की चेतना, सुभाष बोस की गर्जना और सावरकर की निर्भीकता में एकसाथ जीवंत हो उठा। हर स्वतंत्रता दिवस पर जब लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराया जाता है, तो इतिहास बताता है कि यह वही दीवार है, जिसने औरंगजेब की हिंसा देखी, बहादुरशाह जफर की विवशता झेली और 1857 की क्रांति के नायकों का लहू बहते देखा। यह कोई निष्प्राण दीवार नहीं, यह भारतीय सामाजिक चेतना की प्रतीक है।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम असंख्य बलिदानों की महागाथा है। भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव का हँसते हुए बलिदान, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकउल्ला और रामप्रसाद बिस्मिल की राष्ट्रवादी निष्ठा, गांधीजी के सत्याग्रह, नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज, सरदार पटेल, डॉ राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं की प्रखर राजनीति और जनआंदोलनों के आगे ब्रिटिश साम्राज्य टिक नहीं सका। आज जब हम स्वतंत्र हैं, तो यह स्वतंत्रता ऋण है, उन अनगिनत ज्ञात और अज्ञात बलिदानियों का जिनकी चिंताओं में भारत का भविष्य बसता था। परंतु क्या हमने इन स्वतंत्रता सेनानियों के मर्म को सही अर्थों में समझा है? क्या हमने अपनी सांस्कृतिक आत्मा को पुन: पहचाना है? आज का भारत वैश्विक मंच पर आगे बढ़ रहा है, परंतु उसकी वास्तविक प्रगति तभी सार्थक होगी जब वह अपने सनातन जीवनमूल्यों, भाषाओं और सामाजिक परंपराओं के साथ आगे बढ़ेगा।

हमें ऐसे भारत का निर्माण करना है जो विज्ञान में अग्रणी हो और आध्यात्म की दृष्टि से भी जाग्रत; जो तकनीकी ज्ञान से समृद्ध हो पर संस्कारों से भी अनुप्राणित हो। आज का युवा उत्तराधिकारी बने भारतीय मनीषा की उस परंपरा का जो वाल्मीकि से विवेकानंद तक, कृष्ण से चाणक्य तक, पतंजलि से भास्कराचार्य तक और आर्यभट्ट से योगीराज अरविंद तक फैली हुई है। प्रधानमंत्री ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हैं, तो ये भाषण समकालीन सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक परिस्थितियों का प्रतिबिंब होते हैं। इन संदेशों की सामाजिक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर रही है कि किस प्रधानमंत्री ने किस मुद्दे को किस दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया और वह जन सरोकारों से कितना जुड़ पाया। स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से दिए गए अब तक के सभी प्रधानमंत्रियों के संदेश केवल भाषण नहीं रहे, बल्कि वे भारतीय समाज में विचारों, मूल्यों और व्यवहार में परिवर्तन लाने में अग्रणी रहे हैं। हर प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में उस कालखंड की सामाजिक आवश्यकताओं और चुनौतियों की चर्चा की है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों से लाल किले को एक जन-संवाद मंच में बदलने का प्रयास किया है। ‘स्वच्छ भारत अभियान’, ‘जन धन योजना’, ‘हर घर जल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी योजनाओं की शुरूआत की है। भारत में जब तक अंतिम नागरिक के जीवन में गरिमा, समानता, और संप्रभुता का प्रकाश नहीं पहुंचेगा, तब तक स्वतंत्रता का लक्ष्य पूरा नहीं होगा। आज जब हम स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं, तो यह आत्मावलोकन करने का अवसर है कि क्या हम आज भी आत्मनिर्भर हैं? क्या हमारी नीतियां अपनी मिट्टी और देशज परंपराओं से उपजी हैं? आज हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुके हैं, जहां भारत पर बहुआयामी संकट के बादल घने होते जा रहे हैं। आज हर मोर्चे पर मौजूद संकट में सांस्कृतिक अतिक्रमण, वैचारिक विखंडन और तकनीकी उपनिवेशवाद प्रमुख है।

समाज में वैचारिक विखंडन और सामाजिक ध्रुवीकरण आज मीडिया, सोशल मीडिया और शिक्षण संस्थानों तक पहुंच रहा है। युवा पीढ़ी इतिहास से विमुख हो रही है, उन्हें भारत की परंपरा, दर्शन और संघर्षों से अनभिज्ञ रखा जा रहा है। आज के संकटों से लड़ने के लिए भारत में एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण अभियान की आवश्यकता है। जो एक संस्कारशील राष्ट्र बनाएगा।

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