Tuesday, June 25, 2024
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पुणे हादसे का समाज में सख्त संदेश जाना चाहिए

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Nazariya 22


ROHIT MAHESHWARIबीते दिनों महाराष्ट्र के पुणे में एक बेहद त्रासद हादसा हुआ है, जिसने समाज, कानून और मान्यताओं को बेपर्दा कर दिया है। पुणे में एक 17 वर्षीय नाबालिग, बिगड़ैल किशोर ने दो होनहार साफ्टवेयर इंजीनियरों को 2 करोड़ रुपए की कार से कुचल कर मार डाला। दो घरों के चिराग बुझ गए, लिहाजा उनके दुख और सदमे को महसूस ही किया जा सकता है, लेकिन समाज, जेल, कानून उस नाबालिग को ‘मासूम’ ही मान रहे हैं, क्योंकि वह 18 साल का नहीं था। जेल में उस ‘हत्यारे नाबालिग’ से सडक दुर्घटना पर 300 शब्दों का निबंध लिखवाया जाता है और करीब 15 घंटे में अदालत से उसकी जमानत भी हो जाती है! हालांकि अब किशोर की जमानत रद्द करके उसे सुधार गृह में भेज दिया गया है। ऐसा सोशल मीडिया पर हुई जबरदस्त आलोचना के बाद किया गया है। ये कोई पहला मामला नहीं है। पूर्व में भी ऐसी कई घटनाएं घटित हो चुकी हैं, लेकिन दो-चार दिन की सुर्खियों और चर्चाओं के बाद गाड़ी पुरानी पटरी पर दौड़ने लगती है। संविधान के किस पन्ने पर और किस अनुच्छेद में यह लिखा है कि कोई किसी की जान लेने का जघन्य अपराध करे, लेकिन निबंध लिखवा कर ही उसे जमानत दे दी जाए? कानून वाकई अंधा होता है, क्योंकि वह सिर्फ सबूत देखता है, हकीकत को नहीं जानता! नबालिग हत्यारे के पास ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था, कार का पंजीकरण नहीं था, लेकिन वह एक बेशकीमती कार दनदनाते हुए चला रहा था, क्योंकि वह 600 करोड़ रुपए की कंपनी के मालिक, बिल्डर का बेटा था!

क्या कानून के सामने ये साक्ष्य नहीं थे? क्या अमीर, बिल्डर बाप बराबर का दोषी नहीं है, जिसने 2 करोड़ रुपए की कार नाबालिग बेटे को खरीद कर दी? उस उच्छृंखल बालक ने सार्वजनिक सडक को ‘बंगले का आंगन’ समझ लिया और दो युवाओं को कुचल कर मार दिया। नाबालिग आरोपित को हिरासत में पिज्जा, बर्गर और बिरयानी आदि भोज परोसे गए, तो वह खातिरदारी भी ‘बड़े बाप की औलाद’ होने के कारण की गई। चैंकाने वाला तथ्य यह है कि नाबालिग अपराधी ने कार से दो युवा इंजीनियरों को कुचलने से पहले पब, बार में करीब दो घंटे तक, दोस्तों के साथ, खूब शराब पी, जिसका बिल 48,000 रुपए आया और भुगतान भी नाबालिग के क्रेडिट कार्ड से किया गया।

क्या बैंक नाबालिगों के क्रेडिट कार्ड भी बनाते हैं? गंभीर सवाल तो यह है कि मेडिकल परीक्षण में शराब पीने का सच क्यों नहीं सामने आया? क्या डॉक्टर भी बड़े बाप के सामने ‘बिक’ गए? उस त्रासद हादसे के बाद यह तथ्य सामने आया है कि उस नाबालिग ड्राइवर ने शराब पी रखी थी, लिहाजा दोस्तों और पब वालों को भी हिरासत में लिया गया है। जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के न्याय पर तरस आता है कि उसने हत्या की सजा निबंध लिखना ही तय की! क्यों न इसे भी संविधान में जोड़ लिया जाए?

सवाल यह है कि धनाढ्य बिल्डर ने क्यों किशोर पुत्र को बिना लाइसेंस के कार चलाने की अनुमति दी? क्यों बेटे को शराब पार्टी करने की इजाजत दी? क्यों होटल वालों ने किशोरों को शराब पीने की सुविधा दी? जब किशोर ने बार-बार जानबूझकर तमाम कानूनों का उल्लंघन किया तो उसे सामान्य कानून के तहत दंडित क्यों नहीं किया जाना चाहिए? बहरहाल नये सिरे से किशोर न्याय अधिनियम में सुधार की बहस तेज हुई। एक गंभीर आपराधिक घटना के बाद किशोर न्याय बोर्ड द्वारा किशोर को मामूली परामर्श के बाद छोड़ना भी विवाद का विषय बना। सामाजिक व राजनीतिक दबाव के बाद पुणे पुलिस द्वारा की गई तुरंत कार्रवाई समय की जरूरत थी। जो कालांतर भविष्य में ऐसी त्रासदियों को टालने में मददगार हो सकती है। कहा जाने लगा कि अपराध के अनुपात में दंड का निर्धारण किया जाना चाहिए। दरअसल, देश के विभिन्न भागों में भी किशोरों द्वारा तेज रफ्तार वाहन चलाने के तमाम मामले प्रकाश में आते रहते हैं, जिसमें खतरनाक ड्राइविंग के चलते कई किशोरों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है।

यह कोई इकलौता मामला नहीं है। एक मामले में बीएमडब्ल्यू कार से तीन पुलिसकर्मी मार दिए गए थे। अपराधी की अमीरी ने चश्मदीदों को 5-5 करोड़ रुपए की घूस देकर उनकी सच्चाई ही खरीद ली थी, लेकिन बाद में किसी परम शक्ति ने ही सारे भेद खोल दिए और उन ऐयाश अमीरों को सजा हुई। राजधानी दिल्ली में नशेडियों ने कार फुटपाथ पर सोए ‘बेचारों’ पर ही चढ़ा कर उन्हें कुचल दिया। अदालत में ये दलीलें भी दी गर्इं कि क्या फुटपाथ सोने के लिए होता है? बहरहाल देश में लाखों सड़क दुर्घटनाएं होती हैं और लाखों ही जिंदगी गंवाते हैं, लेकिन ऐसे मामले बेशुमार दौलत, नव अमीरी और गरीबों को कीड़े-मकौड़े समझने की संस्कृति की देन ही हैं। जब तक देश में आर्थिक असमानता, विलासिता मौजूद रहेंगे और कानूनों में संशोधन नहीं किया जाएगा, तब तक घरवालों को अचानक दुखद समाचार सुनने को विवश होते रहना पड़ेगा।

ये घटनाएं यातायात कानूनों को सख्ती से लागू करने और किशोर अपराधियों को दंडित करने के लिए कानूनी ढांचे की समीक्षा की आवश्यकता पर बल देती हैं। निस्संदेह, देश की न्यायिक प्रणाली को इस तरह के मामलों में उचित प्रतिक्रिया देनी चाहिए। सही मायनों में अपराधी की उम्र की परवाह किए बिना ऐसे घातक कृत्यों में कड़े दंड के जरिये मिसाल कायम की जानी चाहिए। इससे जहां जनता का विश्वास बहाल होगा, वहीं हमारी सड़कों पर किशोरों की लापरवाह ड्राइविंग से होने वाली मौतों को भी रोका जा सकेगा।


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