जब कोई राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पद पर विराजमान होते है और अचानक ही इस्तीफा दे देते है, मन में एक हुक सी उठती है कि उन्होंने इस्तीफा दिया तो क्यों दिया? यह जरूर है कि किसी न किसी बात को लेकर ही इस्तीफा दिया होगा। ऐसे में जब तक इस्तीफे की वजह नहीं जान लेता, मन में बेचैनी का आलम बना रहता है। इस्तीफा देने वाले कोई अपने वाले हो तो सीधे अपनी जिज्ञासा का समाधान कर लूं। लेकिन जब कोई बड़े राजनीतिक पद पर होते है और उन तक मेरी सीधी पहुंच नहीं होती, तब मीडिया का सहारा लिया करता हूं। क्योंकि मीडिया को खबरों के पार झांकने में महारत हासिल होती है। लेकिन इस्तीफे वाली खबर पर कोई साफ-साफ नहीं बो रहा है।
लेकिन इस मामले में मीडिया भी मेरी जिज्ञासा का पूर्ण रूप से समाधान नहीं कर पाता। क्योंकि एक ही अखबार और एक ही चैनल देखने की मुझे आदत नहीं है। इसलिए अनेक अखबारों का वाचन करता हूं और तमाम चैनल को देखता रहा करता हूं। राजनीतिक विश्लेषक और विचारकों के आलेखों का भी वाचन करता हूं और राजनीतिक बहस को भी सुनता-देखता हूं, इसके चलते और भी अधिक उलझ कर रह जाया करता हूं। मन डावांडोल हो जाता है और किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाता कि इस्तीफा देने वाले ने इस्तीफा क्यों दिया? दिल और दिमाग की धारणा पुरानी घड़ी के पेंडुलम की भांति हो जाती है। हर वक्त हिलती रहती है।
यकीनन मेरे जैसी मन:स्थिति से और भी गुजरते होंगे। इसलिए अपनी बिरादरी के तमाम लोगों की राजनीतिक जिज्ञासा का समाधान करने की दिशा में सूचना के अधिकार के अंतर्गत ऐसा भी प्रावधान होना चाहिए कि किसी के इस्तीफा देने के पीछे वास्तविक वजह का पता चल सके। निश्चित रूप से ऐसा होने पर नागरिकों के एक बड़े वर्ग की मानसिक गतिविधियों में आने वाले व्यवधान को रोका जा सकेगा। क्योंकि यह देखने में आया है कि जब आदमी किसी दुविधा का शिकार हो जाता है, तब उसकी मानसिक क्षमता कम हो जाती है। इसके चलते वह अपने क्षेत्र में अपनी स्वाभाविक क्षमता का लाभ नहीं ले पाता। खैर जाने दीजिए
वैसे सक्रिय राजनीति में भागीदारी के चलते किसी महत्वपूर्ण पद की प्राप्ति यूं ही नहीं हो जाती। बहुत तपना पड़ता है, जमाने भर के पापड़ बेलने पड़ते हैं, जाने कितने समीकरण बैठाएं जाते हैं और तब कहीं जाकर राजयोग फलित हुआ करता है। ऐसे में किसी राजनेता का ‘त्याग की प्रतिमूर्ति’ बन जाना कोई छोटी-मोटी बात नहीं होती। वैसे इतिहास में राजपाट छोड़कर वैराग्य पथ पर अनेक विभूतियां अग्रसर हुई हैं, लेकिन उन्होंने लौकिक सत्ता का परित्याग कर परम सत्ता को प्राप्त करने की दिशा में कदम बढ़ाया था। अपने यहां तो आलम यह है कि राजनीतिक कुर्सी से उतरते ही हर कोई शख्सियत गुमनामी के अंधेरे में खो जाया करती है। इसलिए मानवता के नाते उनसे सहानुभूति होना स्वाभाविक है।

