Saturday, April 11, 2026
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अवसरवादी राजनीति का चेहरा राज ठाकरे

 

Nazariya 13


Tanveer Jafreeयदि हम पीछे मुड़कर राज ठाकरे के राजनैतिक महत्वाकांक्षा भरे जीवन पर एक नजर डालेंगे तो यही पाएंगे कि बाल ठाकरे की विरासत के रूप में शिव सेना की कमान न मिल पाने के विरोध में ही 9 मार्च 2006 को कथित रूप से हिंदुत्व तथा भूमिपुत्र के सिद्धान्तों पर आधारित महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (मनसे) महाराष्ट्र के एक क्षेत्रीय राजनैतिक दल के रूप में वजूद में आई। यह भी कहा जाता है कि उद्धव ठाकरे के साथ मतभेद तथा राज्य में चुनाव में टिकट वितरण जैसे अहम फैसलों में राज ठाकरे की अवहेलना के चलते भी मनसे गठित की गई। पर्रंतु हकीकत तो यह है कि यदि बाल ठाकरे अपनी राजनैतिक विरासत अपने पुत्र उद्धव ठाकरे को सौंपने के बजाये भतीजे राज ठाकरे को सौंप देते तो यकीनन मनसे वजूद में ही न आती। मनसे ने राज ठाकरे के नेतृत्व में बाल ठाकरे तर्ज की आक्रामक राजनीति करनी शुरू की। शिवसेना को कमजोर करने की कोशिश करते हुए बीएमसी,पुणे नगर निगम, ठाणे तथा नासिक नगर निगम जैसे महत्वपूर्ण स्थानों पर अपने प्रतिनिधि निर्वाचित कराये।

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इतना ही नहीं बल्कि 2009 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मनसे ने 13 विधानसभा सीटें भी जीतीं। इसके अलावा 24 से अधिक स्थानों पर मनसे दूसरे स्थान पर भी रही। बाद में उसकी सीटें लगातार कम होती गई।

अब सीटें जीतने के लिहाज से धीरे धीरे मनसे का राजनैतिक जनाधार लगभग समाप्त सा हो गया है। इसका मुख्य कारण यह है कि जो मनसे हिंदुत्व का ध्वजवाहक बनना चाहती थी उसी ने 2008 में उत्तर भारतीयों विशेषकर उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और बिहारी प्रवासियों के विरुद्ध खुले आम हिंसा शुरू कर दी। मनसे कार्यकर्ताओं ने महाराष्ट्र के विभिन्न भागों में उत्तर भारतीय दुकानदारों और विक्रेताओं पर हमला किया। कई जगह सरकारी संपत्ति नष्ट कर दी। छठ जैसे उत्तर भारतीयों के प्रमुख त्यौहार का विरोध किया जाने लगा। इस घटना पर लोकसभा में भी काफी हंगामा हुआ था।

इसी तरह 9 नवम्बर 2009 को समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आजमी को मनसे विधायकों द्वारा उन्हें हिंदी में शपथ लेने से रोका गया। और उनसे सदन में मार पीट की गई।

अभी पिछले दिनों पूर्व महाराष्ट्र में मनसे द्वारा खड़े किए गए अजान-लाउडस्पीकर-हनुमान चालीसा विवाद के मध्य मनसे प्रमुख राज ठाकरे को कथित तौर पर कोई धमकी भरा पत्र मिला। इस पत्र के मिलने के बाद एक मनसे नेता ने कहा कि राज ठाकरे को एक धमकी भरा उर्दू में लिखा गया पत्र मिला है, उनकी जान को खतरा है। इस नेता ने चेतावनी दी है कि अगर ठाकरे को कुछ हुआ तो ‘वे महाराष्ट्र को जला देंगे’।

स्वयं राज ठाकरे की राजनीति का अंदाज प्राय: आक्रामक व तल्खी भरा ही रहता है। वे कई बार अपने साक्षात्कार के दौरान आपे से बाहर और वरिष्ठ पत्रकारों के प्रति अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते दिखाई देते हैं।

अब जब से शिवसेना ने भाजपा से अपना पुराना नाता तोड़ कांग्रेस व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से मिलकर सरकार गठित की है तब ही से राज ठाकरे भाजपा के साथ अपने राजनैतिक संबंध बनाने की जुगत में लगे थे। या यूं कहें कि भाजपा व मनसे दोनों को ही एक-दूसरे से संबंध बनाने की मजबूरी दरपेश थी। परंतु इसके लिये राज ठाकरे को अपने मराठी नहीं, बल्कि हिंदुत्ववादी तेवरों में धार रखनी जरूरी थी।

जो उन्होंने मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने, अजान के वक़्त लाउडस्पीकर पर हनुमान चालीसा पढ़ने जैसा विवाद खड़ा कर, करने की पूरी कोशिश भी की। साथ ही राज ठाकरे ने अपने नये ‘हिंदुत्ववादी अवतार’ को क्षेत्रीय की जगह राष्ट्रीय ‘कवच’ पहनाने के लिए 5 जून को अयोध्या में राम लला के दर्शन का कार्यक्रम भी घोषित कर दिया। परंतु उत्तर भारतीयों द्वारा राज ठाकरे का पुराना रिकार्ड अब खोल दिया गया है।

बहराइच, अयोध्या से लेकर इलाहबाद और पूर्वांचल के कई जिलों में उन्हीं उत्तर भारतीयों ने राज ठाकरे का विरोध करने के लिए कमर कस ली है, जिन्हें 2008 में राज ठाकरे के निर्देशों पर मनसे कार्यकर्ताओं द्वारा इतना प्रताड़ित किया गया था| कि लाखों लोग रास्तों में और ट्रेनों, बसों व टैक्सियों में मार खाते, लुटते, पिटते अपने घरों को लौटने के लिये मजबूर हो गए थे।

राज ठाकरे के अयोध्या दौरे का विरोध करने वालों का कहना है कि उत्तर भारतीयों को अपराधी कहने वाले राज ठाकरे या तो उत्तर भारतीयों से माफी मांगें अन्यथा अयोध्या आने का साहस न करें।

इस पूरे प्रकरण में आश्चर्य की बात तो यह है कि जहां एक भाजपा सांसद खुलकर राज ठाकरे के अयोध्या दौरे का विरोध कर रहे हैं वहीं इन्हीं विरोध स्वरों के बीच अयोध्या से भाजपा के ही सांसद लल्लू सिंह, राज ठाकरे के समर्थन में आ गए हैं। सांसद लल्लू सिंह का कहना है कि जो भी प्रभु श्रीराम की शरण में आना चाहता है उसका अयोध्या में स्वागत है। उधर 10 जून को राज ठाकरे के भतीजे आदित्य ठाकरे भी अयोध्या आ रहे हैं।

अयोध्या में दोनों ‘ठाकरे’ के दौरे को लेकर पोस्टर लगाए जा रहे हैं। इसके चलते अयोध्या शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के टकराव का केंद्र बनता जा रहा है।

बहरहाल राज ठाकरे के रूप में अवसरवादी व विकृत राजनीति का एक और चेहरा तो जरूर उभर रहा है, परंतु इन सब के बीच उत्तर भारतीयों को यह जानना भी बेहद जरूरी है कि उत्तर भारतीयों के दम पर अपनी सरकार बनाने वाली व हिंदी भाषा का प्रसार करने की कोशिशों में लगी भारतीय जनता पार्टी हिंदी भाषा व उत्तर भारतीयों का विरोध करने वाले राज ठाकरे के प्रति नीतिगत व सैद्धांतिक रूप से आखिर क्या विचार रखती है?


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