- मजदूर है तो मजबूर भी है रोज लेते हैं खतरनाक नींद
- बागपत रोड और फुटबाल चौराहे के पास दिल्ली रोड पर फुटपाथ और डिवाइडर पर सोने को मजबूर बेसहारा
जनवाणी संवाददाता |
गंगानगर: एक अकेला इस शहर में, रात हो या दोपहर में आबोदाना ढूंढता है। दिनभर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद आने वाली नींद ये नहीं देखती कि पीठ के नीचे मखमली बिस्तर है या कठोर फर्श।
यही जिंदगी है हजारों मजदूरों की जो खुले आसमान के नीचे रात गुजारने को मजबूर है। इनकी सुबह यही से शुरू होती है और रात भी तमाम खतरों के साथ समाप्त होती है।
बिना छत के जिंदगी गुजार रहे ये मेहनतकश लोग मजबूर है अपनी किस्मत से। यातायात दुर्घटना में आए दिन शहर में अनेक लोगों की जान जाती है, लेकिन शहर में कुछ लोग ऐसे है जो सड़क के बीचोंबीच सुकून की नींद सोते हैं। ये वो लोग हैं जो शहर में दूरदराज के इलाकों से कमाने के लिए आते हैं।
इनके पास न तो यहां घर है और न ही कोई ऐसी जगह जहां ये सुरक्षित व सुकून से सो सकें। खुले आसमान के नीचे आकर मुख्य सड़क के डिवाइडर पर सो गया। उसे क्या पता था कि जहां वो सो रहा है वो जगह कितनी खतरनाक है। उन्हें सुबह का सूरज देखना भी नसीब नहीं होगा।
ये लोग अभाव के कारण अपनी जान पर खेलकर तेज रफ्तार गाड़ियों के बीच सड़क के डिवाइडर पर सोने के लिए मजबूर है। इनकी मजबूरी का अंदाजा आप इस बात से लगा सकता है कि बागपत रोड से फुटबाल चौराहे तक जाने वाली सड़क व फुटबाल चौराहे से दिल्ली रोड के डिवाइडर पर सोने वाले मजदूरों ने बताया कि हमारे जैसे 10 से 20 लोग यहां पर सोते हैं, यहां सोने से गर्मी नहीं लगती है, क्योंकि आसपास से गाड़ियां निकलती रहती है।
जिससे हवा लगती है और फिर हमारे पास कोई ढंग की जगह भी नहीं है, इसलिए यहीं सो जाते हैं। बेघर लोग बताते हैं कि क्यों, खासतौर पर गर्मी और मानसून के महीनों में वे सड़क डिवाइडरों और फुटपाथों पर सोने का जोखिम मोल लेते हैं।
फुटपाथ पर सोना इनकी मजबूरी

हर रात जब काम के बाद घर लौटता हूं, तो फुटपाथ व डिवाइडर पर सो रहे लोगों पर निगाहें अटक जाती हैं। फुटपाथ सोने के लिए नहीं होते हैं।
रविवार रात बागपत रोड पर कुछ मजदूरों को डिवाइडर पर सोते देखा। न बिछाने के लिए चादर थी और न ओढ़ने के लिए, फटे-पुराने कपड़ों में किसी तरह बदन ढका था।
अगल-बगल से सरसराती हुई गाड़ियां निकलती थीं। दूर से आती गाड़ियों को देखकर लगता था कि अब डिवाइडर पर ही चढ़ जायेगी। दिल की धड़कन बढ़ गयी थी। फिर भी सोने के लिए बस वही एक जगह बची थी। न तो अपना घर था और न ही सरकार की ओर से उपलब्ध करायी गयी कोई जगह, जहां रात में सो सकें।
हादसा होने की प्रबल आशंका
बागपत रोड पर बने डिवाइडर पर मजदूर तबके के लोग आए दिन थक-हारकर बेखौफ सोते हैं। जिनके साथ कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है।
ये इतने गरीब हैं कि किसी तरह से पेट भर लें, वहीं बहुत है। ऐसे में आशियाना तो दूर की बात है। खुले आसमान के नीचे इनकी हर रात गुजरती है। इंसान हैं, तो दिल तो धक-धक करता ही होगा।
तब मन में कई सवाल उठते हैं कि विकास का दावा करने वाली सरकार क्या इनके लिए रात में आशियाने का इंतजाम भी नहीं कर सकती? एनजीओ क्या इन लोगों के लिए कुछ नहीं कर सकते? हां! सोचने वाली बात ये है कि अपने स्तर पर इसके लिए सरकार पर दबाव बनाया जाए। एनजीओ व जागरूकजनों को उनकी मदद के लिए प्रेरित करना चाहिए।
दिल्ली रोड पर हर रात मौत के मुंह में मजदूर
इन लोगों के लिए ठिकाने का मतलब फुटपाथ पर है सोने के लिए जगह भर है। शहर के फुटबाल चौराहे से दिल्ली रोड ही नहीं कई ऐसी सड़कें हैं, सैंकड़ों मजदूरों की रात इन्हीं पर कटती है।
दैनिक जनवाणी पड़ताल में सामने आया है कि मेरठ शहर में रोजाना सैंकड़ों लोग डिवाइडर, सड़क किनारे, रिक्शाओं पर और फुटपाथ पर सोते हैं। इनके साथ कभी भी कोई भी हादसा हो सकता है, लेकिन अफसरों को इनकी फिक्र नहीं है और यहां सोने वाले लोगों के पास कोई चारा नहीं है।
फुटबाल चौराहे के निकट दिल्ली रोड पर जनवाणी संवाददाता के सामने मजदूरों का दर्द झलक गया। मजदूरों ने बताया कि वह इतना नहीं कमा पाते कि कमरा किराए पर ले सकें। इसलिए डिवाइडर पर सोना मजबूरी है। दो पैसे बचाकर घर भी देने होते हैं। ये लोग हर रात मौत के मुंह में रहते हैं।


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