Tuesday, March 24, 2026
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बढ़ रहा कोरोना का खतरा, घट रही डाक्टरों की तादाद

मेडिकल में डाक्टरों की कमी के चलते स्वास्थ्य सेवाओं पर संकट

सरकारी फरमान डिग्री हासिल करने के बाद भी नहीं छोड़ सकेंगे मेडिकल

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसके उलट काबिल डाक्टरों की संख्या लगातार घट रही है। जिसके चलते मेडिकल कॉलेज में खासतौर से कोरोना मरीजों के लिए चलायी जा रही स्वास्थ्य सेवाएं कभी भी ठप हो सकती हैं।

हालांकि डाक्टरों की कमी के चलते स्वास्थ्य सेवाओं पर आसन्न संकट के मद्दे नजर शासन ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। डैमेज कंट्रोल के लिए कई फरमान भी जारी किए गए हैं।

इन्हीं फरमानों में एक डाक्टरी में पीजी की डिग्री हासिल करने के बाद कम से एक साल तक उसी मेडिकल में सेवाएं देनी होंगी जहां से डिग्री हासिल की है।

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हालांकि इस फरमान ने डिग्री हासिल करने जा रहे नवागत डाक्टरों में खासी नाराजगी भी है, लेकिन महामारी ऐक्ट लागू होने की वजह से उनके सामने फरमान मानने के अलावा कोई चारा भी नहीं है।

प्रदेश में 1200, मेरठ में 62 नए डिग्री धारक

डाक्टरों की यदि बात की जाए तो 20 अगस्त तक संपन्न होने जा रही मेरठ समेत प्रदेश के अन्य मेडिकल कॉलेजों में कुल संख्या 1200 हैं। जबकि इनमें से मेरठ के मेडिकल कॉलेज से 62 डिग्रीधारक डाक्टरों की सौगात मिलने जा रही है। हालांकि यह सौगात तो पहले ही मिल जाती, लेकिन सिस्टम की खामियों के चलते परीक्षाएं ही निर्धारित समय से तीन माह देरी से करायी जा रही हैं।

परीक्षा के लिए बेलने पड़े पापड़

नए डिग्री धारी डाक्टरों को लेकर प्रदेश सरकार भले ही अपनी पीठ थपथपा रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत की यदि बात की जाए तो मेडिकल से जो डिग्री धारक तैयार होकर मिलने जा रहे हैं उन्हें इन परीक्षाओं को कराने के लिए कड़े पापड़ बेलने पड़े। आमतौर पर मई माह में परीक्षाएं संपन्न होकर 30 जून तक परिणाम आ जाने चाहिए। मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया का भी कुछ ऐसा ही फरमान है, लेकिन परीक्षाएं ही तीन माह देरी से करायी जा सकीं। उसके लिए भी कई बार विरोध प्रदर्शन करने पड़े तब कहीं जाकर परीक्षा की व्यवस्था हो सकी। हालांकि अभी यह तय नहीं कि क्या परीक्षा परिणाम के लिए भी विरोध प्रदर्शन करना होगा।

अपर मुख्य सचिव के आदेश

स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव रजनीश दुबे के 11 अगस्त के पत्र में महामारी अधिनियम 1897 का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि कोरोना वायरस से संक्रमित रोगियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। उनके समुचित इलाज के लिए चिकित्सकों की उपलब्ध जरूरी है। प्रदेश के राजकीय क्षेत्र के 24 व निजी क्षेत्र के 28 मेडिकल कॉलेज हैं, जहां डेडिकेटेड कोविड-19 आइसोलेशन वार्ड संचालित किए जा रहे हैं। एमडी, एमएस व पीजी डिप्लोमा डिग्री हासिल को उसी विशिष्टता में रिक्त सीनियर रेजीडेंट के पद पर नियमानुसार अर्हता धारित करने की स्थिति में शर्तों व प्रतिबंधों के आधीन नियुक्त करने की कार्रवाई अविलंब की जाए।

  • सभी क्लीनिकल एवं पैराक्लीनिकल में पैथोलॉजी एवं माइक्रोबायोलॉजी में रिक्त सीनियर रेजीडेंट पद पर एक साल की नियुक्ति।
  • जिस विभाग में उर्त्तीण की संख्या अधिक है, वहां मेरिट के आधार पर नियुक्ति की जाए। जो डिग्री धारक बच जाएंगे उन्हें प्रदेश सरकार के नए मेडिकल कॉलेजों में नियुक्ति दी जाएगी।
  • जिनका डीएम/एमसीएच पाठयक्रम में अध्ययन के लिए आगामी प्रवेश परीक्षा के माध्यम से चयन हो जाएगा, ऐसे अभ्यार्थियों को सीनियर रेजीडेंट के पदसे अवमुक्त किया जा सकेगा।

इन्हें भेजा गया है आदेश

चिकित्सा एवं प्रशिक्षण, कुल सचिव किंग जार्ज मेडिकल, निदेशक एसजीपीजीआई लखनऊ, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, राजकीय आयुर्विज्ञान संस्थान नोएडा, सुपर स्पेशियलिटी बाल चिकित्सालय एवं स्नातकोत्तर शैक्षणिक संस्थन नोएडा, प्रदेश के सभी मेडिकल कालेज प्राचार्य एवं प्राचार्य स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय।

ये कहना है प्राचार्य का
SK Garg copy

मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. एसके गर्ग ने बताया कि कोविड-19 महामारी एक्ट लागू किया गया है। इसे हेल्थ इमरजेंसी की संज्ञा भी दी जा सकती है। चिकित्सकों की कमी को देखते हुए शासन ने यह व्यवस्था मरीजों के भले के लिए लागू की है।

ये कहना है आईएमए सचिव का
Dr Anil Nausran

इंडियन मेडिकल काउंसिल के सचिव डॉ. अनिल नौसरान का कहना है कि जिस प्रकार से युद्ध कॉल में फौजियों को फ्रंट पर जाना होता है उसी तर्ज पर महामारी काल में मेडिकल के डॉक्टरों व पैरामेडिकल को भी फ्रंट लाइन पर आना होता है। उनका संगठन भी इसी तर्ज पर दिन रात काम में लगा है।

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