Sunday, May 26, 2024
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रालोद के पियादे फिर प्यासे, सपा के ‘गुलाम’ को टिकट ?

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  • धरी रह गई रालोद नेताओं की चुनावी तैयारियां

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: राष्ट्रीय लोकदल नेता सुनील रोहटा, ऐनुद्दीन शाह, डा. राजकुमार सांगवान, चौधरी यशवीर सिंह तन-मन धन से रालोद के साथ हैं, लेकिन जिस तरह के निर्णय पार्टी हाईकमान ले रहा हैं, उसके बाद तो ये तमाम रालोद नेता एक तरह से उम्रदराज हो जाएंगे। फिर इन्हें टिकट कब मिलेगा? अब आने वाले समय में उम्र का तकादा भी होगा कि चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। केवल इनके हिस्से में इंतजार केवल इंतजार ही रहेगा।

पार्टी के साथ इनकी वफादारी रही, लेकिन पार्टी हाईकमान ने इनकी वफादारी को दरकिनार करते हुए सपा नेता एवं पूर्व विधायक गुलाम मोहम्मद को बैकडोर से रालोद में एंट्री कराई और टिकट थमा दिया। रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी का यह निर्णय हर किसी को नागवार गुजरा तथा असंतोष भी पैदा हो गया। यह एक तरह से देखा जाए तो रालोद की छवि पर बड़ा धब्बा लगा है। पांच वर्षों से रालोद के तमाम नेता सिवालखास विधानसभा में घर-घर जाकर चुनाव की तैयारी करते रहे, लेकिन ऐनवक्त में रालोद के पियादे फिर प्यासे रह गए और सपा के गुलाम को टिकट थमा दिया गया।

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दरअसल, सिवालखास विधानसभा पहले से ही रालोद के हिस्से में थी। जयंत चौधरी ने पार्टी के नेताओं से कहा भी कि सिवालखास गठबंधन के चलते रालोद के हिस्से में आया हैं। इसके बाद से रालोद के पियादों की बांछे खिली हुई थी। चुनाव लड़ने के लिए भागदौड़ भी खूब कर रहे थे। दबथुवा में जब सपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी की जनसभा हुई थी तो उसमें भी रालोद के इन पियादों ने बड़ी मेहनत कर भीड़ जुटाई थी।

देखा जाए तो तब रैली के लिए पिच रालोद नेताओं ने तैयार किया, जिस पर बेटिंग सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव कर गए थे। कई दिनों से जद्दोजहद हो रही थी कि सिवालखास में कौन चुनाव लड़ेगा? तमाम रालोद नेता हर रोज दिल्ली स्थित जयंत चौधरी के आवास पर पहुंचकर दावेदारी भी कर रहे थे। लोगों को गाड़ियों में भरकर भी दिल्ली ले जा रहे थे, लेकिन पर्दे के पीछे तो कुछ ओर ही चल रहा था, जिसको रालोद के ये पियादे समझ ही नहीं पाये।

एक माह पहले ही पूर्व विधायक गुलाम मोहम्मद को सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की तरफ से कह दिया गया था कि चुनाव की तैयारी करो, लखनऊ कैसे घूम रहे हो? इसके बाद गुलाम मोहम्मद भी चुनाव की तैयारी में जुट गए थे। दरअसल, गुलाम मोहम्मद का जाट समुदाय के प्रति व्यवहार अच्छा नहीं हैं, जिसको लेकर जाट समुदाय उससे नाराज ही रहा हैं।

भाजपा के प्रति कृषि कानूनों के लेकर नाराजगी थी, उधर जाट समुदाय के प्रति गुलाम के रुखे व्यवहार के चलते भाजपा को लाभ मिल सकता हैं। क्योंकि भाजपा प्रत्याशी मनिंदरपाल बेहद विनम्र हैं और व्यहवाहिरक भी। ऐसे में सपा-रालोद गठबंधन को यहां पर बड़ा झटका लग सकता है।

फिर बसपा ने भी सिवालखास से नन्हें खान को प्रत्याशी बनाया हैं। ऐसे में बसपा और सपा-रालोद गठबंधन से भी मुस्लिम उम्मीदवार होने के बाद समीकरण गडबड़ा सकते हैं। रालोद की इस सीट को लेकर जबरदस्त तैयारी थी, जिसमें गुलाम के प्रत्याशी बनाने के बाद स्थितियां बदल सकती हैं।

गठबंधन में गांठ डाल सकती है ‘गुलाम’ की उम्मीदवारी!

जिले की हॉट सीट बनी सिवालखास पर गैर रालोदी प्रत्याशी उतारना गठबंधन के लिए भारी पड़ सकता है। अभी तक इस सीट पर बने माहौल पर बात की जाए तो यहां के समीकरण पल-पल बदल रहे हैं। अब चर्चा है कि यहां से सपा के पूर्व विधायक गुलाम मोहम्मद की उम्मीदवारी तय की जा सकती है, जो गठबंधन में गांठ डालने का काम कर सकती है।

सिवालखास विधानसभा जाट और मुस्लिम दोनों ही बिरादरी की बाहुल्य मानी जाती है। सपा और रालोद के बीच गठबंधन होने के बाद से इस सीट पर रालोद के प्रत्याशी की उम्मीदवारी मजबूत मानी जा रही थी, मगर सोमवार को एकाएक बदले माहौल से अब यहां के हालात बदल गए हैं। संभावना जताई जा रही है कि अब इस सीट पर गठबंधन किसी गैर रालोदी को चुनाव लड़ाने जा रहा है।

ऐसे में यह कदम गठबंधन के लिहाज से आत्मघाती हो सकता है। यहां से चुनावी मैदान में गैर रालोद प्रत्याशी का आना वर्तमान सियासी फिजा के लिए बेहतर संकेत नहीं माना जा रहा है। क्षेत्र से मिल रहे अपडेट पर बात करें तो यहां जाट मतदाता रालोद के खाते में सीट न आने से नाराजगी जता रहे हैं। उनकी यह नाराजगी किसी दूसरे दल को वोट देने के रूप में भी बदल सकती है। ऐसे में पूर्व विधायक गुलाम मोहम्मद की उम्मीदवारी गठबंधन में गांठ का बड़ा सबब बन सकती है।

आसपास की सीटों पर भी पड़ सकता है असर!

सिवालखास क्षेत्र में बने सियासी माहौल का असर आसपास की सीटों पर भी पड़ सकता है। यहां के मतदाताओं की नाराजगी इस बात के साफ संकेत अभी दे रही है हालांकि यह असर गठबंधन के लिए कितना नुकसान दे होगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा। उधर, मुजफ्फरनगर में कोई मुस्लिम प्रत्याशी ना देना और मेरठ की साथ में से चार सीटों पर गठबंधन के प्रत्याशी मुस्लिम होना सियासी लिहाज से बड़े नुकसान का कारण बन सकता है।

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