
मुंबई से 120 किलोमीटर दूर अहमदाबाद-मुंबई राजमार्ग पर टाटा संस के पूर्व अध्यक्ष साइरस मिस्त्री की कार दुर्घटना में हुई मृत्यु ने एक बार फिर से सड़क दुर्घटना और खतरनाक सड़कों को लेकर बहस छेड़ दी है। देश में बढ़ती सड़क दुर्घटनाएं सभी के लिए चिंता का कारण हैं। वाहन चलाते समय सीट बेल्ट न पहनना, हेलमेट न पहनना, शराब पीकर गाड़ी चलाना आम बात हो गयी है। आजकल तो ड्राइविंग करते समय सोशल मीडिया का उपयोग करना हादसों का एक और बड़ा कारण है। देश में रोजाना सड़क हादसों में 415 लोगों की जान जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2030 तक सड़क हादसों में मरने और घायल होने वालों की तादाद घटाकर आधी करने का लक्ष्य रखा है। भारत सरकार उससे 5 साल पहले यानी 2025 तक ही इस लक्ष्य पूरा करने की बात कह रही है। बावजूद इसके देश भर में सड़क दुर्घटनाएं कम नहीं हो रही हैं। देश की संसद भी इससे चिंतित है, लेकिन उपायों को लेकर कुछ खास होता दिख नहीं रहा। अंतरराष्ट्रीय सड़क संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में 12.5 लाख लोगों की हर साल सड़क हादसों में जान जाती है। दुनिया भर में वाहनों की कुल संख्या का महज 3 फीसदी हिस्सा भारत में है, लेकिन देश में होने वाले सड़क हादसों और इनमें जान गंवाने वालों के मामले में भारत की हिस्सेदारी 12.06 फीसदी है। सेव लाइफ फाउंडेशन के आंकड़ों की मानें, तो 2021 में भारत में सड़क दुर्घटनाओं की गंभीरता 38.6 रही (प्रति सौ दुर्घटनाओं में मृत्यु), जबकि 2020 में यह आंकड़ा 37.5 था। दुर्घटना की गंभीरता सड़क दुर्घटना के घातक होने के जोखिम को इंगित करती है। कहने का अर्थ है कि सड़क दुर्घटना जितनी गंभीर होगी, उसमें मृत्यु होने का जोखिम भी उतना ही अधिक होगा। सड़क दुर्घटना से होनेवाली मौतों में हमारा देश शीर्ष पर है। वहीं सामाजिक कार्यकतार्ओं का कहना है कि सड़क हादसों में होने वाली मौतों की तादाद सरकारी आंकड़ों के मुकाबले कहीं ज्यादा है, दूर-दराज के इलाकों में होने वाले हादसों की अक्सर खबर ही नहीं मिलती।
बीते वर्ष सड़क दुर्घटना में सबसे अधिक जानें 21,792 उत्तर प्रदेश में गर्इं, जो सड़क हादसे में हुई कुल मौतों का 14 प्रतिशत है। सड़कों के आधार पर यदि सड़क दुर्घटना को देखा जाये, तो राष्ट्रीय राजमार्ग सर्वाधिक घातक साबित हुए हैं। बीते वर्ष हुए कुल सड़क हादसों के 30.3 प्रतिशत के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग जिम्मेदार रहे हैं। वहीं राज्य राजमार्गों पर 23.9 प्रतिशत दुर्घटना दर्ज हुई। जबकि 45.8 प्रतिशत हादसे अन्य सड़कों पर हुए। एक्सप्रेसवे पर कुल 1,899 हादसे हुए, जिसमें 1,214 लोग घायल हो गये और 1,356 लोग अपनी जान गंवा बैठे। मृत्यु के मामले में भी राष्ट्रीय राजमार्ग अग्रणी रहे हैं, यहां बीते वर्ष सड़क दुर्घटना में कुल 53,615 मौतें हुईं जो कुल मौतों का 34.5 प्रतिशत है। इसके बाद राज्य राजमार्ग का स्थान है, जहां बीते वर्ष 39,040 लोगों 25.1 प्रतिशत ने अपनी जान गंवायी। विश्व बैंक के एक अध्ययन के अनुसार, सड़क दुर्घटनाओं के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को सालाना सकल घरेलू उत्पाद के पांच से सात प्रतिशत का नुकसान उठाना पड़ता है। क्योंकि देश में सड़क दुर्घटना में मारे जाने वाले व्यक्तियों में से लगभग 84 प्रतिशत 18 से 60 वर्ष के कामकाजी लोग होते हैं।
इतना ही नहीं, देश में होने वाले सड़क हादसों का बहुत अधिक बोझ गरीब परिवारों पर पड़ता है, क्योंकि हताहत होने वाले 70 प्रतिशत से अधिक लोग इन्हीं परिवारों से आते हैं। आय के खत्म हो जाने और इलाज में अत्यधिक खर्च आने के कारण इन परिवारों की आर्थिक-सामाजिक स्थिति बहुत प्रभावित होती है।
सड़क हादसों पर किसी एक पक्ष को दोषी ठहराना गलत होगा। इसके लिए व्यापक दृष्टिकोण अपनाना होगा। पूरी सिविल सोसायटी के साथ जन-अभियान चलाना होगा ताकि जिस सड़क पर चल रहे हैं उसकी तकनीकी गुणवत्ता और जोखिमों की पूरी जानकारी मिले। चालकों की लापरवाही जैसे ओवर स्पीड, लगातार चलना और नशा ज्यादातर दुर्घटनाओं के कारण होते हैं। लेकिन प्रबंधकीय और प्रशासनिक खामियों के बीच बनी सड़कों की बनावट, लचर रख-रखाव और पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी खास फोकस जरूरी है। हादसों को रोकने की खातिर पूरे मार्ग में सतर्कता की अनिवार्यता के सुनिश्चित पालन की व्यवस्था होनी चाहिए। यह भी सच है कि भारत में तमाम एक्सप्रेस वे उतने चौड़े नहीं हैं जैसे अंतरराष्ट्रीय मापदंड के अनुसार होने चाहिए, जबकि इन पर दौड़ने वाले वाहन अंतरराष्ट्रीय स्तर के हैं। ऐसे में भारतीय सड़कों पर अंतरराष्ट्रीय मानक के वाहनों की गति और उनके चलाने के तौर तरीकों के सामंजस्य का ज्ञान चालक के लिए बेहद जरूरी है जो अमूमन भारत में नहीं है।
सुरक्षित सफर के लिए सड़कों पर तकनीक के उपयोग बढ़ाने के साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सहारा लेना होगा। सीसीटीवी का जाल फैलाना होगा जिन्हें वाइ-फाइ से एक सेंट्रलाइज्ड मॉनिटरिंग सिस्टम में जोड़कर जोन या सेक्टरों में बांटकर सतत निगरानी और विश्लेषण किया जाए। इसके अलावा टायरों के निर्माण की प्रक्रिया को भी अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाना होगा। सीट बेल्ट रिमांइडर, चालक के साथ बैठे व्यक्ति के लिए एक एयर बैग की अनिवार्यता जैसे कई बदलाव सरकार ने किए हैं। इसके अलावा हम लोगों को भी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए सभी नियमों को ध्यान में रखते हुए ही सड़क पर चलना चाहिए। सड़क हादसों को कम करने के लिए सरकारी प्रयासों के अलावा सभी को मिलकर इसे जनआंदोलन का रूप देना ही होगा तभी सरकार भी सड़क सुरक्षा के अपने लक्ष्यों को पूरा कर पाएगी।


