Friday, February 13, 2026
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कमजोर और कमतर होता रुपया

 

Nazariya 12


Sateesh Singhनौ मई को रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर 77।40 पर पहुंच गया, जो अब तक सबसे निचला स्तर है। एक दिन के अन्दर डॉलर के मुकाबले रुपएमें 50 पैसे की कमजोरी आ गई। आठ मई को रुपया कमजोर होकर 76.90 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। गौरतलब है कि वर्ष 2022 के 10 मई तक रुपये में 4 प्रतिशत की कमजोरी आ चुकी है और विश्व के प्रमुख करेंसियों में अमेरिकी डॉलर सबसे मजबूत बना हुआ है।

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डॉलर सूचकांक भी 0.35 प्रतिशत की बढ़त के साथ 104.02 के स्तर पर पहुंच गया है। रुपये को कमजोरी के लिए वैश्विक शेयर बाजार में अनिश्चितता की स्थिति, बढ़ती महंगाई, घरेलू शेयर बाजार से विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफपीआई)द्वारा बड़ी मात्रा में निकासी करना आदि प्रमुख कारण हैं। घरेलू शेयर बाजार से एफपीआई ने 6 मई को 5,517.08 करोड़ रुपये के शेयर बेचे, जिसके कारण रुपया और भी कमजोर हो गया।

भू-राजनैतिक संकट के कारण विश्व के अनेक देशों में अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है, जिसके कारण वैसे उत्पादों, जो रूस और यूक्रेन से दूसरे देशों को निर्यात किए जाते हैं और ईंधन की कीमत में अभूतपूर्व इजाफा हुआ है। इन कारणों से महंगाई लगातार उच्च स्तर पर बनी हुई है और निवेशक निवेश का जोखिम लेने से परहेज कर रहे हैं।

इस साल अब तक एफपीआई भारतीय शेयर बाजार से एक लाख करोड़ रुपये की निकासी कर चुके हैं। इस वर्ष एफपीआई ने शेयर बाजार से हर दिन 2200 करोड़ रुपए की निकासी की है। वहीं, रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने के बाद एफपीआई प्रतिदिन शेयर बाजार से 4500 करोड़ रुपए की बिकवाली कर रहे हैं।

ब्रेंटक्रूड 9 मई को 0.14 प्रतिशत बढ़कर 112.55 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया। अगर कच्चे तेल की कीमत यूं ही आसमान को छूती रही तो रुपया और भी कमजोर होकर डॉलर के मुकाबले 80 के स्तर पर पहुंच सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक रुपये के अवमूल्यन को रोकने के लिए लगातार कोशिश कर रहा है, लेकिन अभी तक उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली है। हाल ही में महंगाई पर काबू पाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपोदर में 0.40 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है।

मौजूदा परिदृश्य में महंगाई को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय बैंक आगामी महीनों में भी नीतिगत दरों में बढ़ोतरी कर सकता है। वैसे महंगाई की स्थिति दुनिया के दूसरे देशों में भी बनी हुई है और इस पर काबू पाने के लिए दुनियाभर के देश नीतिगत दरों में बढ़ोतरी कर रहे हैं। अमेरिकी फेड ने भी ब्याज दरों में 0.50 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है।

यह सच है कि महंगाई को रोकने के लिए नीतिगत दरों में इजाफा करना कुछ हद तक कारगर हो सकता है, लेकिन नीतिगत दरों में बढ़ोतरी करने से निवेश, ऋण वृद्धि, रोजगार सृजन आदि में भी कमी आ सकती है, जो विकास की गति को तेज करने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए, केंद्रीय बैंक को लिए गए निर्णय के गुण-दोष का आकलन करने के बाद ही मामले में कोई निर्णय लेना चाहिए।

विश्व की सबसे मजबूत करेंसी होने के कारण दुनिया के अधिकांश देश अंतर्राष्ट्रीय कारोबार डॉलर में करते हैं। भारत भी दूसरे देशों के साथ कारोबार डॉलर में करता है। इसलिए, जब भारत आयात करता है तो डॉलर खर्च होता है और विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आती है। फिलवक्त, डॉलर के मुकाबले रुपये का अवमूल्यन होने से कच्चे तेल और दूसरे उत्पादों के आयात के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं, जिससे ईंधन , पेट्रोलियम उत्पाद और अन्य जिंसों की कीमत में वृद्धि हुई है।

रुपये की कीमत रुपये की मांग एवं आपूर्ति पर निर्भर करती है। आयात एवं निर्यात भी रुपये की कीमत को तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। हर देश के पास दूसरे देशों की मुद्रा का भंडार होता है, जिससे वे दूसरे देशों के साथ कारोबार या आयात-निर्यात करते हैं। आज की तारीख में जिस देश के पास जितना अधिक डॉलर होता है, वह उतनी ही आसानी से दूसरे देशों के साथ कारोबार कर सकता है, क्योंकि अमेरिकी डॉलर विश्व की सबसे मजबूत करेंसी है। इस वजह से दूसरे अधिकांश देशों से आयात किए जाने वाले वस्तुओं या उत्पादों की कीमत को डॉलर में चुकाया जाता है।

विगत 3 वित्त वर्षों में केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर टैक्स लगाकर 8.02 लाख करोड़ रुपये की कमाई की है। वहीं, सिर्फ वित्त वर्ष 2020-21 में केंद्र सरकार को पेट्रोल और डीजल पर कर आरोपित करके 3.72 लाख करोड़ रुपये राजस्व की प्राप्ति हुई थी, जो वित्त वर्ष 2019-20 से दोगुनी से भी अधिक थी। वित्त वर्ष 2019-20 में पेट्रोल और डीजल पर लगाए गए टैक्स से सरकार को 1.78 लाख करोड़ रुपये की कमाई हुई थी।

वर्ष 1960 से भारत में कच्चे तेल की खपत में तेजी आने लगी, क्योंकि विकास के विविध मानकों को गतिशील रखने के लिए देश में ज्यादा कच्चे तेल की जरूरत थी। वर्ष 1965 तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपये की कीमत को पाउंड में मापा जाता था, जबकि वर्ष 1966 से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में रुपए को डॉलर के बरक्स मापा जाने लगा। वर्ष 1966 में 1 डॉलर की कीमत 7.5 रुपये थी, जो अब 80 पहुंचने के कगार पर है।

रेटिंग एजेंसी इक्रा के अनुसार अगर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत औसतन 130 डॉलर बैरल बनी रहती है तो भारत का चालू खाते का घाटा वित्त वर्ष 2023 में बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.2 प्रतिशत रह सकता है। वैसे, मौजूदा परिदृश्य में कच्चे तेल की कीमत के 150 से 200 डॉलर प्रति बैरल पहुंच सकती है। अस्तु, इस मद में ज्यादा घाटा होने की संभावना बनी हुई है।


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