
कोरोना के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था ठीक से संभल ही नहीं पाई थी कि पहले रूस-यूक्रेन युद्ध और अब सिलिकॉन वैली बैंक से उपजे इस संकट ने आर्थिक सुधारों व स्थिरता की उम्मीदों को नया झटका दे दिया है। अमेरिकी इतिहास में वर्ष 2008 के सब-प्राइम संकट के बाद सिलिकॉन वैली बैंक (एसवीबी) को यदि जल्द नहीं संभाला गया तो यह वैश्विक मंदी के लिए महत्वपूर्ण कारण बन सकता है। 1983 में स्थापित एसवीबी बैंक अमेरिका का 16वां सबसे बड़ा बैंक है। अमेरिका के कैलिफोर्निया में इसका मुख्यालय स्थापित है। गत 10 मार्च को इस बैंक को अस्थाई रूप से बंद कर कैलिफोर्निया के फाइनेंशियल प्रोटेक्शन एंड इनोवेशन विभाग को इसके जमाकर्ताओं के हितों की रक्षार्थ रिसीवर के रूप में नियुक्त कर दिया गया है।
यह जानना जरूरी है कि आखिर ऐसी क्या परिस्थितियां हो गर्इं जो अमेरिका में इस बैंक को ऐसे वित्तीय संकट से गुजरना पड़ रहा है। एसवीबी बैंक आधारभूत रूप से नए स्टार्ट-अप, टेक-अप, यूनिकॉर्न (यूनिकॉर्न कंपनी वो स्टार्ट-अप कंपनियां है, जिनका वैल्यूशन एक अरब डॉलर के पार हो जाता है) तथा सैस कंपनियों को ऋण सुविधा प्रदान करती है। नीतिगत लचीलापन, व्यवसाय की समझ, नियामक प्रश्नों के बिना ग्राहक अनुकूल दृष्टिकोण रखने के कारण इस प्रकार की टेक-कंपनियों ने एसवीबी बैंक को पूंजी आवश्यकता के लिए बेहतर विकल्प समझा तथा इसका पूर्ण लाभ भी लिया। वर्ष 2018-19 तक जब तक कोरोना नहीं आया था, तब तक इन ऋणग्राही टेक-कंपनियों का प्रदर्शन भी अच्छा था इसलिए इस बैंक को भी किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं हुई।
इस दौरान इन कंपनियों के उत्साहजनक प्रदर्शन के कारण और एसवीबी जैसे बैंक द्वारा सामान्य बैंकों की अपेक्षा ज्यादा दर पर जमाएं स्वीकार करने से आवक पूंजी प्रवाह बेहतर रहा। अत: एसवीबी बैंक में सामान्य से अधिक जमाएं प्राप्त हुर्इं। वर्ष 2017 में जहां बैंक का डिपॉजिट 44 बिलियन डॉलर था वो ही 2021 में बढ़कर 189 बिलियन डॉलर हो गया। जमाओं में इस अप्रत्याशित वृद्धि के बीच एसवीबी बैंक द्वारा पर्याप्त ऋण नहीं बांटे जा सके जिससे बैंक पर ब्याज दरों का दबाव बढ़ने लगा। डिपॉजिट के विपरीत वर्ष 2017 में जहां बैंक द्वारा 23 बिलियन डॉलर के ऋण बांटे गए थे वहीं 2021 में केवल 66 बिलियन डॉलर के ऋण बांटे गए।
बाजार में स्टार्ट अप के लिए नए ऋणों की मांग में कमी हो जाने के कारण प्रबंधन द्वारा बैंक में उपलब्ध तरलता का विवेकपूर्ण उपयोग नहीं किया जा सका। ऐसी परिस्थितियों में बैंक ने निम्न ब्याज दर पर अरबों (लगभग 128 बिलियन डॉलर का) में बॉन्ड में निवेश किया। धीरे-धीरे विभिन्न अवसरों पर फेडरल बैंक द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि की जाने लगी। फलत: 4.5 प्रतिशत से 5 प्रतिशत तक ब्याज दरों (फेड दरों) में बढ़ोतरी से उपजे अंतर ने एसवीबी बैंक की समस्याओं को बढ़ा दिया।
इधर, पिछले एक-दो सालों में स्टार्ट-अप कंपनियों को प्रदर्शन कमजोर होने लगा तो इन कंपनियों ने अपने परिचालन खर्चे के लिए बैंक में जमाओं को निकालना शुरू कर दिया। निरंतर बढ़ती मांग से बैंक पर दबाव बढ़ने लगा और बैंक ने न केवल कम ब्याज दर पर खरीदे अपने बॉन्ड को बाजार में बेचा बल्कि बाजार से कम अवधि के लिए पूंजी जुटाने का प्रयास भी किया। बाजार से पूंजी न मिलने के कारण बैंक के हितधारकों द्वारा निवेश के नकदीकरण का दबाव प्रतिदिन बढ़ता चला गया। इतना ही नहीं, बैंक के सीईओ ग्रेग बेकर ने अपने 3.6 मिलियन डॉलर के शेयरों को बेच दिया जिससे बाजार में भी इसके शेयर में 60-70 प्रतिशत की भारी गिरावट आ गई।
वर्तमान में 175 बिलियन डॉलर की जमाओं और 209 अरब डॉलर की संपत्ति वाले एसवीबी बैंक के जमाकर्ताओं में भयंकर अविश्वास का माहौल है। जिस प्रकार से भारत में जमाओं को 5 लाख रुपए तक का जमा बीमा होता है उसी प्रकार वहां के नियम के अनुसार भी यह राशि 2.5 लाख डॉलर ही है, जो औसतन जमाओं के अंतर्गत आनुपातिक रूप से बहुत कम है। 2011 के बाद हालांकि इस बैंक का भारत में निवेश बहुत कम रहा है और अपुष्ट रिपोर्ट के अनुसार लगभग 20-21 भारतीय कंपनियां ही इससे प्रभावित होंगी।
इसका कोई प्रत्यक्ष प्रभाव भले ही भारत सहित वैश्विक अर्थव्यवस्था पर न हो किंतु वैश्विक बाजार संबन्धों की परस्पर निर्भरता और प्रगाढ़ता से इस घटना के अपरोक्ष रूप से तात्कालिक और दूरगामी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकते हैं। अत: अमेरिकी नियामक निकायों को आगे आकर इस पर विचार करना चाहिए और एसवीबी बैंक के प्रबंधन की अदूरदर्शिता से सबक लेते हुये ऐसे सेक्टोरल बैंकों को भी अपनी आक्रामक रणनीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। इसके साथ ही फेडरल बैंक को अपने नियामक कानूनों में ऐसी लोचशीलता के बारे में विचार करना चाहिए जिससे भविष्य में निवेशकों के विश्वास को बनाए रखने के साथ ही जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा की जा सके।


