वाह! क्या कहें अपने शहर की। सचमुच यह शहर अब स्मार्ट हो गया है। सड़कों पर गड्ढे हों या गलियों में पानी भरा हो, ये सब तो तरक्की की असली निशानियां हैं। आखिर गड्ढे ही तो बताते हैं कि सड़कें बार-बार बनाई जाती हैं, ठेकेदारों और इंजीनियरों का रोजगार चलता है। वरना बेरोजगारी इतनी बढ़ जाती कि नेताओं को नए-नए रोजगार योजनाएं बनानी पड़तीं। गड्ढों की यह स्मार्ट पॉलिसी अपने आप में क्रांतिकारी है। पानी का हाल पूछिए मत। आधे घंटे की सप्लाई और चौबीस घंटे की प्यास! जनता लाइन में लगकर पानी भरती है, एक-दूसरे पर बाल्टी पटकती है, यही तो सामाजिक मेल-मिलाप है। चुनावी सभा में नेता जब कहते हैं कि हमने जनता को जोड़ दिया है, तो भाई साहब, यह मजाक नहीं, सच्चाई है। सचमुच जोड़ दिया है, नल और टंकी के नीचे बाल्टी-लोटे की कतारों में। बिजली भी कमाल की चीज है। आती-जाती रहती है, मानो नेता जी के वादों का ट्रेलर हो। चुनाव के समय वादा आता है, जीत के बाद चला जाता है। इससे जनता हमेशा सतर्क रहती है।
ट्रैफिक देवता की लाल बत्ती जल रही है, लेकिन अगर ट्रैफिक पुलिस वाला खड़ा भी है तो कौन रुकेगा? यही असली आजादी है। जो भी गाड़ी वाला निकला, वही विजेता। जिधर मौका मिले, उधर कूद पड़ो। सिग्नल पर जनता और संसद में नेता, दोनों का व्यवहार एक जैसा ही है। अतिक्रमण तो हमारी संस्कृति का गहना है। नेता जी कहते हैं-हर गरीब को छत देंगे और देखिए, सरकार ने कितना निभाया है! हर फुटपाथ, हर चौराहे पर छत ही छत। कहीं ठेला, कहीं खोमचा, कहीं मंच। वीआईपी के लिए सड़कें खाली हो जाती हैं, बाकी जनता स्वयंसेवक की तरह गलियों में धकेल दी जाती है। कचरा प्रबंधन भी अद्भुत है। नगर निगम हर गली में सरप्राइज पैकेज छोड़ देता है। कहीं कचरा पड़ा है, कहीं गंदा पानी जमा है। यह सब देखकर नेता जी भाषण में कह सकते हैं- हमारे शहर की गंदगी अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गई है।
कोचिंग संस्थानों को मत भूलिए। गोद में पोतड़े गीले करते-करते ही मां-बाप पूछ लेते हैं-भाई साहब, कौन सा कोचिंग अच्छा रहेगा? और बच्चा बड़ा होकर सोचता है-कोचिंग जाऊं या छत से कूद जाऊं। आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं, लेकिन नेताओं को यह भी उपलब्धि लगता है। खेलों का हाल तो और भी शानदार है। मैदान की जरूरत किसे है? बच्चे तो ट्रैफिक में ही खेलना सीख जाते हैं। कभी फुटबॉल गड्ढे में चला जाए तो तैराकी का अभ्यास भी हो जाता है। और गाड़ियों के शीशे पर पत्थर मारकर बच्चे अपनी तीरंदाजी का हुनर निखार रहे हैं। जब-जब कोई नेता आता है, सड़कों को खाली करा दिया जाता है, ठेले वालों को धकेल दिया जाता है और जनता को चार किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर जाना पड़ता है। तो जनाब, जो लोग कहते हैं कि हमारा शहर अव्यवस्थित है, वो असल में स्मार्टनेस की परिभाषा नहीं समझते। शहर ने हमें सिखा दिया है कि-गड्ढों में तैरना, अंधेरे में जीना, पानी के लिए लड़ना, नेता के रंग बदलते देखना और कचरे के बीच मुस्कुराना।

