बसंत लगता है कि तुम नाराज हो रहे हो! तुम नाराज मत हुआ करो। जरा हमारी मजबूरी भी समझा करो। हमें तो आज भी तुम्हारा इंतजार रहता है। हम आज भी तुम्हारा इंतजार करते हैं,हालाँकि अब इंतजार भी नेटवर्क की उपलब्धता पर डिपेंड करता है। माना कि पहले तुम्हारे आने की सूचना हवा में फैली खुशबू ही दे दिया करती थी। लेकिन अब स्थिति यह हो गई है कि बारह महीने सावन तो बारह महीने बसंत।कभी स्थिति यह बन जाती है कि बारह मासा पतझड़!
बहरहाल,तुम्हारे आने की खुशबू पहले हवा से आती थी, अब मोबाइल के नोटिफिकेशन से आती है। या फिर कैलेण्डर या पंचांग के पन्नों से।‘हैप्पी बसंत पंचमी’ के संदेशों के साथ पीले फूलों वाला कोई रेडीमेड पोस्टर चंचल मन को चलायमान कर देता है और हम खो जाते हैं वासंती रंगों में। अब हमें कभी यह नहीं कहना पड़ता कि मेरा रंग दे बसंती चोला माय, रंग दे बसंती चोला!
तुम्हें लगता होगा कि हम बदल गए हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। इस बदलाव के लिए हम दोषी नहीं हैं। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। तुम भी तो कितना बदल चुके हो! क्या हमने तुम्हें दोष दिया है। दोषी तो हम भी नहीं हैं बसंत। जमाना डिजिटल हो गया है, अर्थतंत्र ज्यादा प्रभावी हो गया है। भावनाएं अब जीडीपी में नहीं गिनी जातीं, और इसीलिए तुम्हारी मादक हवा, सरसों के पीली चादर बिछे खेत, कोयल की कूक, पंछियों की चहचहाहट और आम्र मंजरिया हमारे बजट भाषण में फिट नहीं बैठते। देखो, हमने संस्कार नहीं छोड़े हैं। मां-बाप को वृद्धाश्रम में रखते हैं, सड़क पर तो नहीं छोड़ते न! उनसे मिलने जाते हैं, साल में एक बार, बाकी समय वीडियो कॉल पर ही आशीर्वाद ले लेते हैं।
आनलाइन आरती, आनलाइन भजन और ‘पंडित जी लाइव’ पर विशेष पैकेज। श्रद्धा पूरी है, बस पवित्र पावन गंगा की जगह अब हस्त कमल में डेटा बहता रहता है। तुम्हें शिकायत हो सकती है कि बच्चे छतों पर, गलियों में, सड़कों पर, मैदानों में अब पतंग नहीं उड़ाते। लेकिन तुम्हें समझना चाहिए कि अब यह पिछड़ेपन की हरकत से आज का बाल गोपाल दूर हो चला है। वह जानता है कि पतंग में नेटवर्क नहीं मिलता, न उसमें रील बनती है, न लाइक मिलते हैं।
बसंत,अब तुम मोबाइल की स्क्रीन पर उड़ते हो, पीली-पीली सरसों के साथ, फिल्टर लगा हुआ है।
सजीले हाथों में केसरिया भात की सजी हुई थाल के साथ आभासी उत्सव मनाते हम लोग। बसंत, तुम कहते हो कि हमने तुम्हें महसूस करना छोड़ दिया है, यह गलतफहमी है तुम्हारी। हम तुम्हें मोबाइल में महसूस करते हैं, वॉलपेपर में, स्टेटस में और दो मिनट की भावुक कविता में भी। इसलिए नाराज मत होना बसंत। हम बदले नहीं हैं, बस अपडेट हो गए हैं, अब आभासी हो चले हैं। तुम्हें जीना अब थोड़ा आॅफलाइन काम हो गया है। और हम आॅफलाइन के लिए समय कभी-कभी ही निकाल पाते हैं। वैसे भी तुम सीजनल हो और हमें बारहमासा बसंत की चाह है। बसंत, समझ रहे हो न, मैं क्या कहना चाह रहा हूं।

