जनवाणी ब्यूरो |
लखनऊ: श्रीराम के अनुज लक्ष्मण की नगरी में गोमती नदी के तट पर स्थित अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान के प्रांगण में चल रहे सात दिवसीय सत्संग के क्रम में चतुर्थ दिवस महानिर्वाणी अखाड़ा पंचायती के वरिष्ठ आचार्य महामंडलेश्वर प्रातः वंदनीय अनंत विभूषित स्वामी अभयानंद सरस्वती जी महाराज के श्री मुख से राजधानीवासीयों को राम गीता विषय पर सारगर्भित उपदेश प्राप्त हुआ। जिसमें लक्ष्मण जी के द्वारा पूछे गए पांच प्रश्नों का उत्तर देते हुए प्रभु श्रीराम ने स्वयं उन्हें उपदेश किया है, वह प्रश्न है।
चौ. कहहु ग्यान बिराग अरू माया।
कहहु सो भगति करहु जेहिं दया।।
दो. ईश्वर जीव भेद प्रभु,सकल कहो समुझाई।
जाते होई चरन रति,सोक मोह भ्रम जाई।।१४।।
प्र ०१ ज्ञान क्या है ?
प्र ०२ वैराग्य क्या है ?
प्र ०३ माया क्या है?
प्र ०४ भक्ति क्या है?
प्र ०५ ईश्वर और जीव में क्या अंतर है ?

जिस के उत्तर में भगवान श्री राम कहते हैं मैं मेरा और तुम तुम्हारा कि यह जो भेद बुद्धि है यही माया है ।सारे जगत में एकत्व की दृष्टि रखना कि यह सारा जगत ब्रह्ममय है यही ज्ञान है। सत्व रज और तम इन तीनों गुणों से अपने मन को हटा लेने का नाम ही वैराग्य है। ईश्वर और जीव में बस इतना ही अंतर है कि ईश्वर की असीमित शक्तियों का सीमित स्वरूप जीव है। परमात्मा को निरंतर प्रेम पूर्वक स्मरण करते रहने का नाम ही भक्ति है।
और अंत में भगवान घोषणा करते हैं जो जीवन कर्म और वचन तीनों के माध्यम से मुझ में समर्पित रहता है मैं उसके ह्रदय में विश्राम करता हूं।

बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम।
तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम॥ 16॥
राम गीता का यह प्रसंग श्रीरामचरितमानस के अरण्यकांड में दोहा संख्या 13 के बाद से दोहा संख्या 16 तक वर्णित है जब श्री राम लक्ष्मण और सीता जी तीनों ही पंचवटी में निवास करते थे आगे यह श्रृंखला ऐसे ही जारी रहेगी जिसमें विभीषण गीता, पुरजन गीता और गरुड़ गीता के प्रसंग आएंगे।

