चंद्र प्रभा सूद |
मांगने की प्रवृत्ति सदा से ही अहितकारी कही गई है। इसीलिए हमारी संस्कृति में त्याग का विशेष महत्त्व दर्शाया गया है। याचना करने से मनुष्य का सब कुछ क्षीण होता है परंतु त्याग से सब प्राप्त होता है। ईश्वर मनुष्य को पात्रता के अनुसार स्वत: ही देते हैं। इसलिए मांगने से परहेज करना चाहिए। मांगना सरल नहीं बहुत कठिन कार्य है। मांगने की स्थिति आ जाने पर एक स्वाभिमानी मनुष्य पता नहीं कितनी मौत मरता है। ईश्वर मनुष्य को बिना मांगे ही मालामाल कर देता है।
कुछ लोगों की प्रवृत्ति ही मांगने की होती है यानी वे याचक वृत्ति के होते हैं। वे मांगकर ही अपना जीवन निर्वाह करते हैं। सारा समय उन्हें कुछ न कुछ मांगना ही होता है। कुछ व्यक्ति लापरवाह प्रकृति के होते हैं। इसलिए उनके पास आवश्यक वस्तुओं की कमी बनी रहती है। इसलिए उन्हें मांगना ही पड़ता है। कोई कितना भी तिरस्कार क्यों न करे, वे चिकने घड़े बने रहते हैं। मनुष्य को किसी से कुछ पाने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए क्योंकि जब उसकी अपेक्षा पूर्ण नहीं होती, तब मनुष्य दु:खी रहता है।
जब मनुष्य किसी से कुछ मांगने के लिए जाता है तो उसकी बुद्धि, उसका विवेक उसका साथ छोड़ देते हैं। मांगने वाले को लज्जा त्याग देती है। लक्ष्मी उससे नाराज हो जाती है। मनुष्य उस समय कान्तिहीन हो जाता है और उसकी कीर्ति मानो कहीं खो सी जाती है। यानी मांगना किसी भी तरह से कोई फायदे का सौदा नहीं, उससे मनुष्य को हानि होती है।
जिस प्रकार भौतिक जगत के माता-पिता अपने बच्चों के मांगने अथवा न मांगने पर भी, उनकी सारी आवश्यकताएं पूर्ण करते हैं, उसी प्रकार वह ईश्वर भी अपने बच्चों को कभी निराश नहीं करता। वह सदा ही उनकी जरूरतों का ध्यान रखता है। वही एकमात्र मनुष्य का ठौर है, उसकी शरण में ही जाना चाहिए। सबसे बड़ी बात वह किसी से चर्चा करके मनुष्य को अपमानित नहीं करता।
जहां तक हो सके, मांगने की प्रवृत्ति को टालना चाहिए। इसे आदत तो कदापि नहीं बनाना चाहिए। प्रयास यही करना चाहिए कि ईश्वर ने जितना दिया है, जो भी दिया है, उसी में सन्तोष करना चाहिए। उस मालिक को कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए, सदा उसी में अपना जीवन यापन करने का प्रयास करना चाहिए।


