जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: दुनियाभर में चर्चा का केंद्र बने अमेरिकी टैरिफ पर एक अहम घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिका की सर्वोच्च अदालत ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए व्यापक आयात शुल्क (टैरिफ) को गैरकानूनी ठहराया है। ये वही टैरिफ थे, जिनके माध्यम से ट्रंप ने मित्र और शत्रु देशों पर सख्त आर्थिक दबाव डालने की कोशिश की थी। इस नीति का शिकार भारत भी हुआ था, जिससे वैश्विक राजनीति और व्यापार जगत में हलचल तेज हो गई है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इन टैरिफ की मार झेलने वाले भारतीय निर्यातकों को कोई राहत या रिफंड मिलेगा?
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए व्यापर आयात शुल्क (टैरिफ) को गैरकानूनी करार देते हुए कहा कि राष्ट्रपति को अंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्ति अधिनियम (IEEPA) के तहत इस तरह के व्यापक आयात शुल्क लगाने का अधिकार नहीं था। अदालत ने 6-3 के बहुमत से यह फैसला सुनाया। यह निर्णय उन सभी टैरिफ पर लागू होता है, जिनमें भारत पर लगाया गया अतिरिक्त शुल्क भी शामिल है।
ट्रंप टैरिफ का पूरा खेल समझें
ट्रंप प्रशासन ने राष्ट्रीय आपातकाल का हवाला देते हुए कई देशों पर पारस्परिक टैरिफ लगाए थे। 2 अप्रैल 2025 को घोषित इन टैरिफ के तहत भारत पर भी भारी शुल्क लगाया गया था। खासकर रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत पर प्रभावी टैरिफ दर 50% तक पहुंच गई थी, जो किसी भी देश के लिए सबसे अधिक थी। हालांकि, जनवरी 2026 में अमेरिका और भारत के बीच व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के बाद इस दर को घटाकर 18% कर दिया गया, लेकिन तब तक भारतीय निर्यातकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
क्या भारतीय निर्यातकों को मिलेगा रिफंड?
अदालत के फैसले के बाद, भारतीय निर्यातकों को रिफंड मिलने की संभावना पर सवाल उठने लगे हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय निर्यातकों को सीधे तौर पर रिफंड मिलना बेहद कम है। इसका कारण यह है कि टैरिफ का भुगतान भारतीय निर्यातकों ने नहीं, बल्कि अमेरिकी आयातकों ने किया था। जब कोई अमेरिकी कंपनी भारत से सामान मंगाती है, तो वही कंपनी अमेरिकी कस्टम विभाग को टैरिफ का भुगतान करती है। बाद में यह अतिरिक्त लागत अमेरिकी उपभोक्ताओं से वसूली जाती है। अगर रिफंड प्रक्रिया शुरू होती है, तो इसका लाभ अमेरिकी आयातकों को मिलेगा, न कि भारतीय निर्यातकों को।
कुछ कंपनियां पहले ही रिफंड की मांग कर चुकी हैं
कुछ अमेरिकी कंपनियां, जैसे कि खुदरा क्षेत्र की बड़ी कंपनी कॉस्टको, पहले ही अदालत में रिफंड की मांग कर चुकी हैं। हालांकि व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि रिफंड की प्रक्रिया लंबी कानूनी लड़ाई के बाद ही संभव होगी, और इसमें कई साल लग सकते हैं।
भारतीय निर्यातकों पर टैरिफ का असर
हालांकि अमेरिकी आयातकों ने टैरिफ का भुगतान किया, इसका सीधा असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ा। उच्च शुल्क के कारण भारतीय उत्पाद अमेरिका में महंगे हो गए, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धा क्षमता कम हो गई। खासकर फार्मा, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग गुड्स और केमिकल्स जैसे क्षेत्रों को ऑर्डर घटने और कीमतें कम करने का दबाव झेलना पड़ा। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही अब टैरिफ को अवैध करार दिया गया हो, लेकिन जो नुकसान इस अवधि में हुआ, उसकी भरपाई के लिए अमेरिका में कोई स्पष्ट कानूनी प्रावधान नहीं है।
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता पर असर
विशेषज्ञों का कहना है कि यह सुप्रीम कोर्ट का फैसला भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों के लिए सकारात्मक साबित हो सकता है। अतिरिक्त 18% टैरिफ हटने से भारत के लगभग 55% निर्यात फिर से सामान्य एमएफएन दरों पर आ सकते हैं, जिससे भारत को चल रही व्यापार वार्ताओं में मजबूती मिल सकती है। इसके अलावा, अमेरिका की अर्थव्यवस्था में भी महंगाई को लेकर दबाव था, क्योंकि उच्च टैरिफ ने कीमतों को बढ़ाया और आर्थिक वृद्धि पर असर डाला। इस फैसले को व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण से राहत भरा माना जा रहा है।
आगे की संभावनाएं
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, अब यह मामला इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी सरकार और निचली अदालतें रिफंड को लेकर क्या रुख अपनाती हैं। यदि रिफंड का रास्ता खुलता है तो अमेरिकी आयातकों को कस्टम प्रक्रिया और अदालतों के जरिए अपना दावा करना होगा। भारतीय निर्यातकों के लिए यह फैसला तत्काल आर्थिक राहत नहीं लाता, लेकिन इसके बाद अमेरिकी बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धा क्षमता बहाल हो सकती है।

