जनवाणी बयूरो |
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने त्रिपुरा हिंसा में गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत जेल में बंद किए गए पत्रकारों और वकीलों की याचिका पर सुनवाई को लेकर सहमति जता दी है।
दरअसल, हाल ही में त्रिपुरा में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। स्थिति नियंत्रण में आने के बाद त्रिपुरा पुलिस ने हिंसा के बारे में अपनी सोशल मीडिया पोस्ट से कथित रूप से सांप्रदायिक नफरत को बढ़ावा देने के आरोप में सुप्रीम कोर्ट के चार वकीलों को गिरफ्तार कर लिया था। इनके खिलाफ सख्त यूएपीए और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था।
इसी मामले में दो वकीलों और एक पत्रकार ने यूएपीए के कठोर प्रावधानों के तहत दर्ज आपराधिक मामले रद्द करने का अनुरोध किया।
गौरतलब है कि त्रिपुरा में अल्पसंख्यक समुदाय के पूजा स्थलों के खिलाफ कथित हिंसा को लेकर सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर उच्चतम न्यायालय के वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं समेत 102 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है।
इस मामले में सिविल सोसाइटी के सदस्य, जो कि तथ्य जांचने वाली समिति का भी हिस्सा रहे लोगों ने यूएपीए की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी इस समिति का कहना है कि यूएपीए में गैरकानूनी गतिविधियों की परिभाषा अस्पष्ट और व्यापक है और ऐसे मामलों में आरोपियों की जमानत कराना भी काफी मुश्किल हो जाता है।
बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा से भड़की त्रिपुरा में आग
पड़ोसी बांग्लादेश में दुर्गा पूजा के दौरान सांप्रदायिक हिंसा के विरोध में विश्व हिंदू परिषद ने त्रिपुरा में रैली निकाली थी। इसी दौरान हालात बिगड़ गए और आगजनी, लूटपाट और हिंसा की घटनाएं हुईं।
कुछ रिपोर्ट्स में तो यहां तक सामने आया था कि एक मस्जिद में तोड़फोड़ के साथ कई दुकानों को आग के हवाले कर दिया गया। हालांकि, पुलिस ने ऐसी घटनाओं को नकार दिया था।

