Saturday, March 28, 2026
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पुरस्कार उगलती शांति प्रकिया

‘जहांपनाह, आपके एक इशारे पर शांति स्थापित हो जाती है। एक-दूसरे को फूटी आँख न सुहाने वाले और बात-बेबात लड़ने वाले पक्ष आपकी बातों को चुटकियों में मानकर सीजफायर कर लेते हैं। यह दुनिया के अजूबों में शुमार है, हुजूर!’

‘यही तो! हम तो दुनिया भर में शांति स्थापित करने के प्रयास में जुटे हुए हैं। और इस महान काम के लिए जिन देशों को हथियार चाहिए, उन्हें हम आधुनिकतम मिसाइलें, टैंक, फाइटर जेट्स से लैस कर रहे हैं। जिन देशों के पास पैसे नहीं, उन्हें हम आसान किस्तों पर लोन दिला देते हैं। ताकि शांति स्थापना का काम रुक न पाए और हमारी तिजोरी भी भरी रहे।’

‘हुजूर, क्या शांति स्थापित करने के लिए लड़ाना-भिड़ाना जरूरी है? क्या समझाइश, बातचीत और भाईचारे से काम नहीं चल सकता?’

‘हो सकता है उनकी जरूरत बातचीत से पूरी हो जाए, लेकिन सीधे-सीधे सब कुछ शांत हो जाए और उसमें हमारी कोई भूमिका ही न रहे,यह कैसे हो सकता है और फिर हमारे धंधे का क्या होगा! हम भी दुकान सजाकर बैठे हैं। बिना दाना डाले हमारे हथियार कौन खरीदेगा? हमारे बनाए बम और मिसाइलें कौन आजमाएगा? हमारा अंतरराष्ट्रीय वर्चस्व कैसे कायम रहेगा? अगर कोई देश कमजोर होता दिखे, तो वहां ‘लोकतंत्र बहाल करने’ के नाम पर सैन्य कार्रवाई का प्रस्ताव लाकर युद्ध करवाना जरूरी हो जाता है। कहीं कोई विद्रोह हो, तो बगैर पूछे दोनों पक्षों को हथियार सप्लाई करके संघर्ष को लंबा खींचना पड़ता है ताकि सुनियोजित शांति स्थापित हो सके।

अगर कभी बगैर हमारे हस्तक्षेप के कोई शांति समझौता हो जाए, तो उसमें ऐसा कोई ‘गोलमोल’ प्रावधान डालना पड़ता है कि आने वाले वर्षों में नित नये विवाद फिर जन्म लेते रहें और हमारे शांति प्रयास जारी रहें। यह सब हमारे ‘पावर प्रोजेक्शन’ का हिस्सा है। हम ऐसी शांति नहीं चाहते जो स्थायी हो। हमें ऐसी शांति चाहिए जो टूटी-फूटी, अस्थिर और झूलती रहे, ताकि आगामी वर्षों में नए सौदे, नए मिशन, और नई ‘शांति प्रक्रिया’ चलती रहे। तभी तो हमारी अर्थव्यवस्था और राजनीति दोनों की गाड़ी चलती रह सकती है।

‘हुजूर आप महान है और आपके ये शांति प्रयास भी महान है!’

‘इसीलिए हम शांति की बातें सबसे ज्यादा करते हैं, पर शांति स्थापित नहीं होने देते। क्योंकि अगर सचमुच शांति कायम हो गई, तो हमारी दुकान बंद हो जाएगी। हमारे हथियार जंग खा जाएंगे। और हमें मंचों पर ‘शांति के मसीहा’ कहलाने का मौका भी नहीं मिलेगा।

‘हुजूर, सुना है कि ग्लोबल पुरस्कार वाले आपको ग्लोबल अशांति पुरस्कार देने की घोषणा करने वाले हैं, जहांपनाह उनसे पहले ही क्यों न हम स्वयं ही विश्व शांति पुरस्कार स्थापित कर सम्मान आपके नाम करवा दें!’

‘वेरी नाइस, गुड आइडिया, जल्दी एक संस्था बनाकर हमारे नाम विश्व शांति पुरस्कार घोषित करवा दो.उन्होंने अपनो नाक और लंबी करते हुए कहा!’

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