Saturday, March 14, 2026
- Advertisement -

एक छात्र की गणनात्मक मौत

हमारे समाज में छात्र अब इंसान नहीं रहा, वो एक चलता-फिरता प्रतिशत बन चुका है। घरवाले उसे बेटा नहीं, निवेश मानते हैं कोचिंग की फीस, ट्यूशन, किताबें, सबका रिटर्न चाहिए। जब सोमवार की सुबह गौरव ने सांस लेना बंद किया, तो मातम नहीं, घाटा हुआ। पिता बोले, ‘बस 95 प्रतिशत तक पहुंचने ही वाला था। एक-दो रात और जाग जाता तो टॉप रैंक मिल जाता।’ मां ने रिवीजन नोट्स की तरफ देखा और कहा, ‘हमने तो प्रीमियम कोचिंग दिलवाई थी, शांत कमरा दिया था, कोई ध्यान भटकाने वाली चीज नहीं थी। फिर भी उसने ये ‘अर्ली रिटायरमेंट’ क्यों ले ली?’ पड़ोसी शोक मनाने नहीं आए, वो तो प्रतिशत की गिरावट का विश्लेषण करने आए थे—‘सिंपल फेलियर’ था या ‘कंपाउंड’? गौरव की देह अब सिर्फ एक निष्क्रिय बर्तन थी, जिसमें 95 प्रतिशत भरने से पहले ही दरार आ गई।

रिश्तेदारों की प्रतिक्रियाएं समाज की प्राथमिकताओं का आईना थीं। एक बुआ, जिन्होंने कभी गौरव को दस मिनट का ब्रेक लेने पर डांटा था, बोलीं, ‘बस एक घंटा और पढ़ लेता तो बच जाता।’ सबने सहमति में सिर हिलाया। एक पड़ोसी, जिन्होंने गौरव को कभी क्रिकेट खेलते या साइकिल चलाते नहीं देखा, बोले, ‘बहुत आदर्श छात्र था।’ उनके लिए बचपन का अभाव ही गुण था। गौरव की स्मृति में कोई पसंदीदा कार्टून या आइसक्रीम नहीं थी, बस एक लड़का था जो हमेशा ‘अपने कमरे में, किताबों के साथ’ रहता था। उसका जीवन एक लंबा बैठना था, और मृत्यु अंतिम बैठना। यह अंतिम संस्कार नहीं, एक अनुशासन की पूजा थी—उस बच्चे की, जिसने अंतिम समीकरण गलत हल कर लिया।

शोकसभा में गौरव के तथाकथित दोस्त एक कोने में खड़े थे, आंसू नहीं बहा रहे थे, बल्कि अपने-अपने प्रतिशत की तुलना कर रहे थे। उनके चेहरे थकान और भय से भरे थे। राहुल नामक एक लड़का दूसरे से फुसफुसाया, ‘उसकी मौत से कटआॅफ कम हो जाएगा क्या?’ उनके लिए गौरव की मृत्यु एक सांख्यिकीय विचलन थी, जिससे उनकी रैंकिंग सुधर सकती थी। उनके बीच की दोस्ती प्रतियोगिता की भट्टी में बनी थी। उन्होंने गौरव को एक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा, जिसकी अनुपस्थिति उन्हें ऊपर चढ़ने का मौका दे सकती थी। यह अंतिम संस्कार एक मौन लाभ था, एक अवसर था, एक सीट खाली हुई थी।

मीडिया ने मौके को भुनाया। लाइव प्रसारण शुरू हुआ, स्क्रीन पर लिखा था: ‘ब्रेकिंग न्यूज: अकादमिक आत्महत्या—शिक्षा प्रणाली की विफलता?’ रिपोर्टर ने कैमरे में कहा, ‘आज हम एक छात्र की कहानी देख रहे हैं, जिसने जीवन की अंतिम परीक्षा में असफलता पाई। उसका अंतिम प्रतिशत था 94.5 प्रतिशत। यह एक ‘परसेंटेज गैप’ का मामला है।’ सवाल था—क्या यह प्रणाली की गलती थी या भावनात्मक आउटपुट का गलत प्रबंधन? गौरव का जीवन एक फुटनोट बन गया, और उसकी मृत्यु एक हेडलाइन। अंतत: गौरव मरा नहीं, वो एक आंकड़ा बन गया—शैक्षणिक उत्कृष्टता की दौड़ में एक अंतिम, अधूरा अध्याय।

spot_imgspot_img

Subscribe

Related articles

छोटे बच्चों की करें उचित परवरिश

नीतू गुप्ता साफ-सुथरा, हंसता मुस्कुराता बच्चा सभी को अच्छा लगता...

पर उपदेश कुशल बहुतेरे

सही कहा है, दूसरों को उपदेश देने वाले एक...
spot_imgspot_img