Friday, January 23, 2026
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राजनीतिक लालच का अंधकार और प्रेम का सियासी मार्ग

वर्तमान में देश ही नहीं बल्कि विश्व भी असंतोष, अशांति, शोषण, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, युद्ध और पर्यावरण असंतुलन के गहन अंधकार से घिरा हुआ है। यह अंधेरा बाहरी परिस्थितियों का नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व की निष्कृष्टतम सोच, नैतिक मूल्यों एवं लोकतांत्रिक आदर्शों के प्रति उदासीनता का परिणाम है। राजनीतिक दलों के विचारों में स्वार्थ का प्रदूषण व्याप्त है, वोट बैंक और सत्ता के लोभ में वे मानवीय मूल्यों को ताक पर रख देते हैं, यहां तक कि मानव हत्या को भी जायज ठहरा देते हैं।

केपी मलिक

निर्विवाद सत्य है कि राजनीतिक घृणा से घृणा समाप्त नहीं होती, ध्रुवीकरण का हल ध्रुवीकरण से नहीं, और हिंसक राजनीति प्रतिहिंसा को जन्म देती ही है। हिंसा को जीतने के लिए प्रेम, करुणा और सौहार्दपूर्ण राजनीति की भाषा आवश्यक है।

संकटों की जड़: राजनीतिक आंतरिक प्रदूषण

आज का देश का संकट केवल भौतिक या आर्थिक नहीं, अपितु राजनीतिक-आध्यात्मिक पतन का प्रतिबिंब है। भारत में भ्रष्टाचार की जड़ें सरकारी दफ्तरों से निकलकर संसद तक फैल चुकी हैं, तमाम घोटाले राजनेताओं के वोट लोभ को उजागर करते हैं, जहाँ जनकल्याण चुनावी स्टंट बन जाता है। यह बीमारी देश ही नहीं विदेशों में भी विकराल रूप ले चुकी है। बताते हैं कि अमेरिका में वॉल स्ट्रीट का लोभ 2008 के वित्तीय संकट का कारण बना, जबकि व्यापारी-राजनीतिक गठजोड़ पर्यावरण का शोषण करते हैं। आतंकवाद और युद्ध इनकी चरम अभिव्यक्ति हैं उत्तर कोरिया की तानाशाही से लेकर इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष तक, जहां राजनीतिक अहंकार लाखों जिंदगियां निगल गया। भारत के किसान आंदोलन में तीन कृषि कानूनों का विवाद राजनीतिक स्वार्थ का प्रतीक है। सरकार ने किसानों की समस्याओं और लाचारी को नजरअंदाज किया तो विपक्ष ने उसे वोट बैंक बनाया। आज दिल्ली का भयंकर प्रदूषण, असंतुलित पर्यावरण का नतीजा है जो राजनीतिक लापरवाही का फल है, छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड के जंगलों की कटाई भारत की विकास नीतियों से प्रभावित बताई जाती है, जबकि मां गंगा की सफाई और दिल्ली का
प्रदूषण चुनावी वादों में दब गया।

यह सब आंतरिक राजनीतिक प्रदूषण है। दलों ने लोकतंत्र को स्वार्थ, अहंकार और सत्ता-लोभ से भर लिया है। धर्म, जो कभी राजनीतिक एकता का आधार था, अब हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण का हथियार बन गया है। परिणाम गरीबों का शोषण, किसानों की लाचारी, महिलाओं पर अत्याचार। क्या सख्त कानून या सैन्य बल से चक्र टूटेगा? नहीं, क्योंकि राजनीतिक हिंसा नई हिंसा को जन्म देती है। इतिहास गवाह कि नेल्सन मंडेला की प्रेम-आधारित सुलह ने दक्षिण अफ्रीका को अपार्टहाइड से मुक्त किया, जबकि हिंसक क्रांतियाँ जैसे रूसी बोल्शेविक विद्रोह नई तानाशाही लाए। भारत में गांधी की अहिंसा ने साम्राज्यवाद को हराया।

शांति का स्रोत: राजनीतिक प्रेम और आंतरिक सुधार

राजनीतिक शांति कोई चुनावी वादा नहीं, बल्कि आंतरिक यात्रा है जो नेताओं के अंत:करण से शुरू होकर नीतियों में फैलती है। जब राजनीतिक नेता सद्भाव, करुणा, संयम और सत्यनिष्ठा जागृत करेंगे, तब भ्रष्टाचार, युद्ध और असमानता हल हो जाएँगी। प्रेम ही हिंसा का राजनीतिक उपचार है। उदाहरणस्वरूप, न्यूजीलैंड की जेसिंडा आर्डर्न ने क्राइस्टचर्च हमले के बाद घृणा के बजाय करुणा की राजनीति अपनाई, जिससे मुस्लिम समुदाय एकजुट हुआ। भारत में अटल बिहारी वाजपेयी की ‘इंसानियत’ अपील ने पाकिस्तान से संवाद का रास्ता खोला। कल्पना करें, यदि हर नेता प्रतिदिन प्रेम का कदम उठाए और एक गरीब परिवार को सशक्त करे, किसान और मजदूर संगठनों से संवाद करे, ध्रुवीकरण के बजाय एकता चुनें तो फिर देखें कि समाज कैसे बदलेगा!

व्यावहारिक मार्ग: व्यक्तिगत से वैश्विक स्तर तक

इस परिवर्तन के लिए ठोस राजनीतिक कदम जरूरी हैं। व्यक्तिगत स्तर पर राजनेता दैनिक चिंतन से स्वार्थ को त्यागें। अपने क्षेत्र के लोगों से सत्य बोलें, अहिंसा अपनाऐ और धन के उपवास से लोभ पर विजय प्राप्त करें। स्कूलों और कॉलेजों में करुणा, पर्यावरण और लोकतांत्रिक मूल्य जोड़ें। राष्ट्रीय स्तर पर परिवर्तन लाने के लिए देश में भ्रष्टाचार-निरोधक कानून को सख्त और प्रभावी बनाने के लिए सरकार को प्रस्ताव भेजें और इस पर खुद भी विचार करें, लेकिन साथ ही प्रेम-आधारित नीतियां लाएं। देश के अन्नदाता किसानों के लिए एमएसपी गारंटी और सौहार्दपूर्ण वार्ता को बढ़ावा दे, विपक्ष-सत्ता संवाद से होने वाली चुनावी हिंसा रोकने में अहम भूमिका निभाने की कोशिश करें।

वैश्विक स्तर पर परिवर्तन लाने के लिए संयुक्त राष्ट्र में प्रेम-नीतियाँ बढ़ावा देंने जैसे मुद्दों पर चर्चा करें जैसे यूक्रेन-रूस जैसे युद्धों में करुणा मध्यस्थता के लिए देश की तरफ से दुनिया को एक मैसेज जाए, जलवायु सम्मेलनों में अपने निजी स्वार्थ को त्यागकर नवीकरणीय ऊर्जा पर सहमति बनाने की कोशिश करें। इस तरह के प्रयास न केवल संकट हल करेंगे, बल्कि प्रेमपूर्ण राजनीति का नया युग ला पाएंगे। जिससे देश में राजनीतिक दिव्य चेतना का उदय होगा। बहरहाल आज राजनीतिक सम्यक चिंतन की जरूरत है। यदि नेता अपने अंदर दिव्यता जगा लें, तो देश ही नहीं अपितु विश्व का अंधकार मिटेगा। सत्य-अहिंसा का राजनीतिक मार्ग कठिन लेकिन विजयी है। आइए, प्रेम की भाषा से भ्रष्टाचार हराएं, करुणा से किसानों को सशक्त करें, और विश्व बंधुत्व से युद्ध समाप्त करें। यही सच्ची राजनीति है।

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