Saturday, March 21, 2026
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बेमानी नहीं है संविधान पर छिड़ी बहस

SAMVAD

 


Tanveer Jafree18वीं लोकसभा में अधिकांश विपक्षी सांसदों द्वारा शपथ ग्रहण के बाद ‘जय संविधान’ के स्वर बुलंद करना और अपने हाथों में संविधान की प्रतियां लेकर शपथ ग्रहण करना अनायास ही नहीं था। वास्तव में नई लोकसभा में इस मुद्दे पर विमर्श की शुरुआत तो तभी हो चुकी थी, जब तीसरी बार सरकार बनाने जा रहे नरेद्र मोदी नई लोकसभा निर्वाचित होने के बाद जब पहली बार संसद भवन के सेंट्रल हॉल में एनडीए संसदीय दल की बैठक में पहुंचे, उस समय उन्होंने सबसे पहले भारतीय संविधान को अपने हाथों में ससम्मान उठाकर अपने मस्तक से लगाया और संविधान को नमन करने के बाद एनडीए की बैठक में शामिल हुए। अपनी एक्स पोस्ट में उन्होंने यह तस्वीर भी सांझा की। संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद मोदी ने कहा कि ‘हम नेशन फर्स्ट के सिद्धांत पर काम करेंगे और सबको साथ लेकर चलेंगे।’ उन्होंने यह भी कहा कि हम मध्यम वर्ग को मजबूत करेंगे और सर्वधर्म सद्भाव के सिद्धांत पर काम करेंगे। प्रधानमंत्री द्वारा संविधान को मस्तक से लगाने के बाद ही विपक्ष ने भी यह जरूरी समझा कि चूंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में ‘संविधान बचाओ’ विपक्ष द्वारा उठाया गया एक मजबूत मुद्दा था लिहाजा क्यों न उसके निर्वाचित सांसद में अपने पहले प्रवेश में हाथों में संविधान की प्रति रखें और जय संविधान का स्वर संसद में बुलंद कर देश व दुनिया को यह संदेश दें कि संविधान बचाने की असली लड़ाई दरअसल विपक्षी दलों यानी इंडिया गठबंधन द्वारा लड़ी गई है। सवाल यह है कि ‘संविधान खतरे में है’ या संविधान बदला जा सकता है, इस विमर्श की शुरुआत हुई कहां से? विपक्षी दलों के किसी नेता ने तो संविधान बदलने की बात नहीं की? जिस अयोध्या विवाद को राजनैतिक मुद्दा बनाकर भाजपा ने स्वयं को स्थापित किया उसी (फैजाबाद) लोकसभा क्षेत्र के भाजपा प्रत्याशी लल्लू सिंह ने लोकसभा चुनाव के दौरान ही यह विवादित बयान किसके इशारे पर दिया कि सरकार बनाने के लिए 272 सांसद चाहिए लेकिन संविधान संशोधन या संविधान बदलने के लिए दो तिहाई बहुमत चाहिए, नियम बदलना होगा और संविधान भी बदलना होगा?
ठीक उसी दौरान राजस्थान के नागौर लोकसभा से भारतीय जनता पार्टी उम्मीदवार ज्योति मिर्धा ने भी सार्वजनिक तौर पर कहा, संवैधानिक बदलाव के लिए लोकसभा और राज्यसभा में प्रचंड बहुमत होना चाहिए । जब मेरठ से भाजपा प्रत्याशी अरुण गोविल से पूछा गया कि क्या 400 पार का नारा इसलिए दिया गया है, क्योंकि सरकार की ऐसा कुछ बड़ा करने की इच्छा है? इस सवाल पर गोविल का जवाब था, मुझे ये महसूस होता है, क्योंकि मोदी जी ऐसे ही कोई बात नहीं कहते हैं, उसके पीछे कोई ना कोई अर्थ जरूर होता है। इसी तरह कर्नाटक से छह बार बीजेपी के सांसद रहे अनंत कुमार हेगड़े ने भी संविधान बदलने को लेकर गंभीर बयान दिया था। उन्होंने यह दावा किया था कि भाजपा का 400 लोकसभा सीटें जीतने का लक्ष्य संविधान को बदलना है। हेगड़े ने एक सभा में कहा था कि संविधान को फिर से लिखने की जरूरत है। कांग्रेस ने इसमें अनावश्यक चीजों को जबरदस्ती भरकर संविधान को मूल रूप से विकृत कर दिया है, खासकर ऐसे कानून लाकर जिनका उद्देश्य हिंदू समाज को दबाना था, अगर ये सब बदलना है, तो ये मौजूदा बहुमत के साथ संभव नहीं है। इसी तरह देश में और भी अनेक भाजपाई नेता व मंत्री आदि 400 पार के नारे से उत्साहित होकर इसी आशय के बयान देते रहे।

जब भाजपा के प्रमुख नेताओं द्वारा इस तरह के संविधान विरोधी बयान दिए जा रहे थे, तत्काल रूप से विपक्ष उन बयानों को मुद्दा बनाकर भाजपा को संविधान विरोधी ठहरा देता था। नतीजतन ‘डैमेज कंट्रोल’ के लिए उसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस मुद्दे पर स्वयं मोर्चा संभालना पड़ा था। विपक्ष के बार-बार ये कहने पर कि भाजपा संविधान को बदलना चाहती है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पलटवार करते हुए एक चुनावी रैली में यह जवाब देना पड़ा था कि उनकी सरकार संविधान का सम्मान करती है और यहां तक कि बाबा साहेब खुद भी आ जाएं तो भी संविधान खत्म नहीं कर पाएंगे। परंतु सवाल यह है कि भाजपा ने संविधान बदलने की बात करने वाले किसी भी नेता के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की? इसके अलावा इस समय हिंदू राष्ट्र निर्माण की बातें करना भी गोया फैशन बन गया है। भाजपा व संघ के तमाम लोग, साधू, प्रवचन कर्ता, सरेआम हिंदू राष्ट्र निर्माण की पुरजोर वकालत करते दिखाई दे रहे हैं। यह मांग ही अपने आप में संविधान विरोधी है। इस मांग का मतलब यही है कि हिंदू राष्ट्र की मनोकामना रखने वालों को संविधान में दर्ज ‘हम भारत के लोग’ और धर्मनिरपेक्ष जैसे शब्द पसंद नहीं?

इसी तरह सत्ता समर्थक नेताओं की तरफ से ही कभी आरक्षण समाप्त करने तो कभी इस पर पुनर्विचार करने की बातें की जाती हैं। जाहिर है, आरक्षण का लाभ उठाने वाला वर्ग इसे अपने लिए खतरा समझता है। परंतु भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की ओर से इन विषयों को लेकर अपनी स्थिति संभवत: इसलिए स्पष्ट नहीं की गई, क्योंकि उसे विश्वास था कि भाजपा पूर्ण बहुमत में आकर संविधान संबन्धी अपने उन मंसूबों को पूरा करेगी जो उनके नेताओं द्वारा सांकेतिक तौर पर उठाये जा रहे थे। परंतु जनता ने ऐसे कई प्रत्याशियों को भी हरा दिया और प्रधानमंत्री मोदी को भी संविधान को माथे से लगाकर स्वयं को संविधान समर्थक होने का प्रमाण देने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसलिये 18वीं लोकसभा की शुरुआत में ही संविधान पर छिड़ी बहस बेमानी नहीं है।


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