Wednesday, March 4, 2026
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भविष्य हरित ऊर्जा का है

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हाल ही में दिल्ली, मुंबई और लखनऊ जैसे शहरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक गंभीर श्रेणी में पहुंच गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 14 लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों के कारण होती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या विकास की कीमत प्रदूषण होनी चाहिए? क्या आधुनिक भारत प्रदूषण की छाया में ही आगे बढ़ेगा? इन्हीं सवालों का उत्तर खोजते हुए भारत ने एक नई दिशा अपनाई हरित ऊर्जा की ओर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 नवम्बर 2021 को ग्लासगो (स्कॉटलैंड) में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन झ्र सीओपी26 के दौरान जब पंचामृत संकल्प की घोषणा के तहत वर्ष 2070 तक ‘नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन’ लक्ष्य रखा , तो उन्होंने यह स्पष्ट कहा था कि भारत विकास करेगा पर प्रकृति के साथ। इस दृष्टिकोण ने भारत को जीवाश्म ईंधन (फॉसिल फ्यूल) पर निर्भरता से मुक्त कर हरित ऊर्जा की राह पर आगे बढ़ाया।

सौर घर मुफ्त बिजली योजना ने आम जनता को इस परिवर्तन का सहभागी बनाया। इस योजना के तहत लाखों परिवारों ने अपने घरों की छतों पर सौर पैनल लगवाए हैं। नतीजा यह है कि अब वे हर महीने 200-300 यूनिट मुफ्त बिजली पा रहे हैं और अतिरिक्त बिजली बेचकर आय भी अर्जित कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के झांसी जिले की गृहिणी बताती हैं कि पहले हर महीने बिजली का बिल देना पड़ता था। अब सौर पैनल से घर चल रहा है और 1500 रुपए की बचत भी हो रही है। यह उदाहरण बताता है कि हरित ऊर्जा केवल पर्यावरण के लिए नहीं, बल्कि आम नागरिक के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए भी वरदान साबित हो रही है।

हरित ऊर्जा का दूसरा मजबूत स्तंभ है पवन ऊर्जा। तमिलनाडु और गुजरात जैसे राज्य अब देश की बिजली जरूरतों का बड़ा हिस्सा हवा से पैदा कर रहे हैं। 2025 में शुरू हुई आॅफशोर विंड एनर्जी योजना के तहत समुद्र तटों पर विशाल टरबाइन लगाए गए हैं, जिनसे 15 गीगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। यह न केवल स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन का उदाहरण है, बल्कि इससे तटीय इलाकों में रोजगार और पर्यटन के अवसर भी बढ़े हैं। वहीं भारत ने हरित हाइड्रोजन मिशन के जरिए विश्व को चौंका दिया है। 2030 तक भारत पांच मिलियन टन हरित हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य लेकर चल रहा है। गुजरात, ओडिशा और तमिलनाडु में बड़े संयंत्रों की स्थापना हो चुकी है। इसका उपयोग भविष्य में रेलवे, उद्योग और जहाजरानी में किया जाएगा। यह पहल न केवल जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाएगी, बल्कि भारत को स्वच्छ ऊर्जा निर्यातक राष्ट्र बनाएगी।

अगर किसानों की बात करें तो कुसुम योजना ने ग्रामीण जीवन को नई दिशा दी है। अब तक देशभर में 35 लाख से अधिक सौर पंप लगाए जा चुके हैं। पहले जो किसान बिजली कटौती और डीजल खर्च से परेशान थे, अब वे सौर ऊर्जा से दिन-रात खेती कर पा रहे हैं। राजस्थान के टोंक जिले में किसान बताते हैं कि पहले महीने में 2000 रुपए का डीजल खर्च होता था, अब वही पैसा बच रहा है और सौर पंप से बिना रुकावट सिंचाई हो रही है। यह योजना सीधे किसानों को आत्मनिर्भर बना रही है। मोदी सरकार ने सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और इथेनॉल जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को अपनाकर यह सिद्ध किया है कि विकास और पर्यावरण साथ-साथ चल सकते हैं। भारत की यह पहल इस दृष्टि से भी प्रासंगिक है कि यह देश को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में अग्रसर कर रही है।

पहले भारत तेल और गैस के लिए आयात पर निर्भर था, लेकिन अब सौर घर योजना, कुसुम योजना और हरित हाइड्रोजन मिशन के माध्यम से देश खुद अपनी ऊर्जा पैदा कर रहा है। इससे न केवल विदेशी मुद्रा की बचत हो रही है, बल्कि लाखों नए रोजगार भी सृजित हो रहे हैं।
ग्रामीण भारत में किसान अब सौर पंपों से फसलें सींच रहे हैं और अतिरिक्त बिजली बेचकर आमदनी बढ़ा रहे हैं। हरित ऊर्जा केवल पर्यावरण की रक्षा का माध्यम नहीं, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता, सामाजिक सशक्तिकरण और ग्रामीण विकास का आधार बन चुकी है। 2025 की अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी रिपोर्ट के अनुसार, भारत हर वर्ष 20 लाख नए रोजगार हरित ऊर्जा क्षेत्र में उत्पन्न कर रहा है। यह संख्या अगले पांच वर्षों में दोगुनी होने की संभावना है। हरित ऊर्जा ने महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ाई है। सौर पैनल और जैव गैस संयंत्रों की स्थापना में ग्रामीण महिलाओं की अहम भूमिका रही है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की उज्ज्वला महिला समूह ने अपने गांव में सौर ऊर्जा से चलने वाले स्ट्रीट लाइट लगाई हैं। अब पूरा गांव जगमगाता है।
जब पूरी दुनिया एक गंभीर ऊर्जा संकट और जलवायु परिवर्तन की चुनौती से जूझ रही है।

कोयला, पेट्रोल और डीजल जैसे पारंपरिक ऊर्जा स्रोत तेजी से खत्म हो रहे हैं और उनका अत्यधिक उपयोग पृथ्वी को प्रदूषण, तापमान वृद्धि और जल संकट जैसी समस्याओं की ओर धकेल रहा है, तब भारत जैसे विकासशील देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह रही कि कैसे वह अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करे, वह भी बिना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए। विश्व के 190 से अधिक देश जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण और ऊर्जा संकट जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे समय में भारत का हरित ऊर्जा की ओर बढ़ना न केवल एक नीतिगत निर्णय है, बल्कि मानवता के अस्तित्व से भी जुड़ा कदम है। आज का युग ऊर्जा और पर्यावरण दोनों के संतुलन की मांग करता है। दुनिया के कई हिस्सों में आज भी लोग अंधेरे में जीवन बिता रहे हैं। तेल और कोयले की कीमतें बढ़ती जा रही हैं, प्रदूषण नई ऊंचाइयां छू रहा है। जलवायु परिवर्तन ने धरती को संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया है। कभी यूरोप में भीषण गर्मी से सैकड़ों लोगों की मौत होती है, तो कभी एशिया में बाढ़ और सूखे का कहर साथ दिखता है। ऐसे में भारत की हरित यात्रा बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है।

हालांकि इस हरित यात्रा में कई चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी समस्या है ऊर्जा भंडारण। सौर और पवन ऊर्जा उत्पादन मौसम पर निर्भर है, इसलिए जब सूरज नहीं निकलता या हवा नहीं चलती, तो बिजली की कमी हो जाती है। दूसरी चुनौती है तकनीकी लागत। सौर पैनल और हाइड्रोजन संयंत्र अभी भी महंगे हैं, जिससे गरीब तबकों तक इनका लाभ सीमित रह जाता है। तीसरी बड़ी समस्या है ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी ज्ञान की कमी। ज्ञान की कमी की वजह से रखरखाव सही नहीं हो पाता, जिस से उत्पादन प्रभावित होता है।

देश में हरित ऊर्जा की दिशा में तेजी लाने के ठोस उपाय आवश्यक हैं। ऊर्जा भंडारण तकनीकों पर ध्यान देना होगा, ताकि सौर और पवन ऊर्जा को मौसम पर निर्भर न रहना पड़े। इसके लिए उन्नत बैटरी तकनीक और माइक्रो ग्रिड सिस्टम विकसित किए जा सकते हैं। स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देकर सौर पैनल, हाइड्रोजन संयंत्र और टर्बाइन देश में ही तैयार किए जाने चाहिए, जिससे लागत घटे और रोजगार बढ़े।

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