चमचों के लिए यह मौसम परम सुहावना है। हर ओर चुनाव के ढ़ोल बाजे बज रहे हैं। चमचों को चाहिए कि वे इस ओर ध्यान दें। जिस तादाद में चुनावी प्रत्याशियों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है, उसी अनुपात में चमचों की आवश्यकता भी महसूस की जा रही है और उनकी संख्या में भी सतत् रूप से इजाफा हो रहा है। यह तो तय है कि चमचों के बिना सब सूना है। आमतौर पर चुनाव किसी भी कीमत पर इनके बिना हो नहीं सकते। किसी भी चुनाव का भविष्य इन पर निर्भर करता है। चुनाव प्रत्याशी की हार-जीत का दारोमदार चमचों पर निर्भर करता है। चमचे चाहें तो नैया पार लगा दें अथवा डुबा दें। इस पावन बेला में इनका स्मरण न करना इनके साथ ज्यादती होगी। वैसे इनकी प्रशंसा में विपुल साहित्य रचा गया है। जिसका लब्बोलुआव यही है कि चमचा पालन आज का फैशन भी बन गया है। कुत्ते पालन की तर्ज पर ही इनकी देखभाल होती है।
चमचागिरी का प्रशिक्षण दिया जाता है तो कुछ लोग जन्मजात ही चमचे रूप में पैदा होते हैं। जन्मजात चमचों की नस्ल ज्यादा उम्दा मानी गयी है, लेकिन इनका पाया जाना दुर्लभ है तथा ये महँगे भी होते हैं। डाबर मेन कुत्तों की तरह। मिली जुली नस्ल के चमचों की तो कोई कमी नहीं है, लेकिन उनके अनुकूल सुविधायें जुटाने की आवश्यकता होती है।
चुनाव के दिनों में चमचे प्रत्याशी के लिए महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं, इसीलिए प्रत्याशी उन्हें कभी नाराज नहीं करते तथा वे भी चमचों की तरह चमचों की हां में हां मिलाते पाए जाते हैं। चमचा एक पुल है, जिस पर से प्रत्याशी गुजरता है व चुनाव भवसागर को पार कर जाता है। समय की बलिहारी है कि चमचों का उत्पादन भारतवर्ष में बहुतायत से हो रहा है। मुझे लगता है वह दिन दूर नहीं है, जब हम चमचों का निर्यात करके विदेशी पूंजी कमाएंगे। हमारे चमचों की मांग विदेशों में भी बढ़े, यह अत्यंत लाभकारी बात है। भारत में जो भ्रष्टाचार का व्यापार फला-फूला है, उसके पीछे चमचों का बड़ा हाथ है। राजनेता सीधा कभी कुछ नहीं करता। वह मध्यम के माध्यम से भ्रष्टाचार करता है और यह माध्यम चाहे हवाला का हो या यूरिया, चीनी, प्रतिभूति, सांसद रिश्वत अथवा खरीद सौदों की दलाली हो, सभी में इनकी भूमिका स्वीकार की जाती रही है। चमचों की महिमा अपरम्पार है। वे क्या नहीं कर सकते चमचे वह कर सकते हैं, जो और कोई नहीं कर सकता। वे सरकार गिरा दें या सरकार बना दें, चुनाव जिता दें या चुनाव हरा दें। जय जयकार और गुणगान के लिए चमचों की भारी आवश्यकता होती है।
जो लोग चमचे नहीं पालते वे जीवन में दुख पाते हैं और निस्सारता का अहसास करते हैं। जिन्होंने भी चमचों की अनदेखी की है, वे परेशान हुये हैं। भारतीय परिवेश चमचों के सर्वथा अनुकूल है और वह पीढ़ी दर पीढ़ी इसी कार्य को अपनाकर अपना घर अपना पारिवारिक जीवन खुशहाल बनाये रखता है। चमचों को धन की कभी कमी नहीं रहती। वे अनाप-शनाप व्यय करते हैं, फिर भी पैसा खत्म नहीं होता है।

