जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: आस्था, श्रद्धा और पवित्रता का प्रतीक छठ पूजा हिंदू धर्म के सबसे प्राचीन और पवित्र पर्वों में से एक है। यह पर्व सूर्य देव और छठी मैया की उपासना के लिए समर्पित है और इसे प्रकृति के प्रति आभार और सामंजस्य के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। बिहार से आरंभ हुआ यह पर्व आज उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, नेपाल सहित देश-विदेश के कई हिस्सों में पूरे उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है।
छठ पूजा का प्राचीन इतिहास
छठ पूजा की परंपरा वैदिक काल से चली आ रही है। ऋषि-मुनि सूर्य उपासना को शारीरिक और आत्मिक शुद्धि का माध्यम मानते थे।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्यपुत्र कर्ण ने सबसे पहले छठ पूजा का आरंभ किया था। वे प्रतिदिन नदी में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते थे।
महाभारत काल में भी द्रौपदी और पांडवों द्वारा कठिन समय में सूर्य की उपासना करने का उल्लेख मिलता है। इन कथाओं से स्पष्ट है कि यह पर्व केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि ऊर्जा, आत्मबल और शुद्धता का प्रतीक है।
बिहार से कैसे शुरू हुई परंपरा
छठ पूजा की जड़ें गहराई से बिहार की संस्कृति और जीवनशैली में रची-बसी हैं।
यहां की गंगा, कोसी और सोन नदियां सूर्य और जल की उपासना के लिए सर्वोत्तम मानी जाती हैं।
‘छठ’ शब्द का अर्थ होता है ‘छठा दिन’, क्योंकि यह पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। समय के साथ यह परंपरा बिहार से निकलकर पूरे देश और दुनिया में फैल गई, और आज यह लोक आस्था का महापर्व बन चुकी है।
छठ पूजा के चार प्रमुख अनुष्ठान
छठ पर्व चार दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें हर दिन का अपना विशेष धार्मिक महत्व होता है —
पहला दिन – नहाय-खाय: भक्त नदी या तालाब में स्नान कर पवित्र भोजन ग्रहण करते हैं।
दूसरा दिन – लोहंडा और खरना: इस दिन भक्त निर्जला उपवास की शुरुआत करते हैं और शाम को गुड़-चावल की खीर और रोटी का प्रसाद बनाते हैं।
तीसरा दिन – संध्या अर्घ्य: व्रती डूबते सूर्य को जल में खड़े होकर अर्घ्य अर्पित करते हैं।
चौथा दिन – उषा अर्घ्य: अंतिम दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
इस दौरान व्रती 36 घंटे का निर्जला उपवास रखती हैं। पूजा सामग्री में गन्ना, ठेकुआ, नारियल, केला, दीपक और फल का विशेष महत्व होता है।

