
विश्व स्वास्थ्य संगठन और दि लैंसेट की हालिया रिपोर्ट में बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि वर्ष 2050 तक दुनियाभर में 3.05 करोड़ नए कैंसर के मामले सामने आ सकते हैं और 1.86 करोड़ लोग इस बीमारी से मृत्यु को प्राप्त हो सकते हैं। यह आंकड़े केवल भयावह नहीं बल्कि चेतावनी हैं कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो कैंसर वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था और समाज दोनों के लिए विकराल संकट साबित होगा। कैंसर के बढ़ते मामलों के लिहाज से भारत की स्थिति बेहद चिंताजनक है। पिछले 33 वर्षों में यहां कैंसर के मामलों में 26.4 फीसदी और मौतों में 21.2 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। जानकारी के लिए बता दें कि कैंसर रोग के बड़ी तेजी के साथ पांव-पसारने की मुख्य वजहों में अस्वस्थ जीवनशैली, तंबाकू सेवन की व्यापकता, शराब का बढ़ता सेवन, प्रदूषण का बढ़ता ग्राफ, मोटापे के साथ-साथ असंतुलित भोजन भी शामिल हैं।
मालूम हो कि कैंसर ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर की कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं। सामान्य कोशिकाएं एक निश्चित क्रम में जन्म लेती हैं और समय आने पर मर जाती हैं, लेकिन कैंसरग्रस्त कोशिकाएं लगातार विभाजित होती रहती हैं। इससे ट्यूमर बनता है जो आसपास के अंगों को प्रभावित करता है और कभी-कभी रक्त या लसीका प्रणाली से पूरे शरीर में फैल जाता है। दरअसल, कैंसर के सौ से भी अधिक प्रकार ज्ञात हैं, जिनमें स्तन कैंसर, फेफड़े का कैंसर, पेट का कैंसर, आंत का कैंसर, मुख का कैंसर और लीवर का कैंसर प्रमुख हैं। यदि हम कैंसर के सबसे घातक रूप की बात करें तो वैश्विक स्तर पर सबसे घातक कैंसरों में फेफड़े और श्वसन तंत्र का कैंसर पहले स्थान पर है। यह 109 देशों में मृत्यु का प्रमुख कारण है। स्तन कैंसर 101 देशों में मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। पेट का कैंसर 19 देशों में, आंत का कैंसर 19 देशों में और लीवर का कैंसर 15 देशों में मृत्यु का प्रमुख कारण है।
यदि हम कैंसर के मामलों में वैश्विक परिदृश्य पर दृष्टि डालें तो पाएंगे कि 1990 में दुनियाभर में कैंसर के 90.4 लाख नए मामले सामने आए थे। 2023 में यह संख्या बढ़कर 1.85 करोड़ हो गई। मृत्यु दर भी उतनी ही भयावह रही। 1990 में कैंसर से 50 लाख लोगों की मृत्यु हुई थी, जबकि 2023 में यह संख्या बढ़कर 1.04 करोड़ तक पहुंच गई। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2050 तक नए मामलों की संख्या 3.05 करोड़ और मौतों की संख्या 1.86 करोड़ तक पहुंच सकती है। यदि हम भारत के संदर्भ में बात करें तो भारत में कैंसर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। 1990 में यहां प्रति एक लाख जनसंख्या पर 84.8 मामले दर्ज किए गए थे।
2023 में यह संख्या बढ़कर 107.2 हो गई। इस दौरान कैंसर के मामलों में 26.4 फीसदी की वृद्धि हुई। 1990 में कैंसर से मृत्यु दर 71.7 प्रति एक लाख थी, जबकि 2023 में यह बढ़कर 86.9 हो गई। यानी मृत्यु दर में 21.2 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। उल्लेखनीय है कि भारत मे कैंसर से मृत्यु के पीछे कैंसर के अलग-अलग रूप जिम्मेवार रहे हैं। 2023 में भारत में कैंसर से हुई मौतों में स्तन कैंसर का योगदान 8.5 फीसदी था। फेफड़े का कैंसर 8.4 फीसदी, भोजन नली का कैंसर 8.2 फीसदी, पेट का कैंसर 6.9 फीसदी और मुख का कैंसर 6.5 फीसदी मौतों का कारण बना। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत में कैंसर केवल किसी एक लिंग या क्षेत्र तक सीमित नहीं है बल्कि यह पुरुष और महिला दोनों को प्रभावित कर रहा है।
चिंताजनक तथ्य यह है कि भारत में कैंसर के बड़े तेजी के साथ पांव-पसारने की मुख्य वजहों में अशिक्षा, जागरूकता का अभाव और जीवन शैली के प्रति बरती जाने वाली लापरवाही मुख्य वजह बनी। भारत में कैंसर के बढ़ने का सबसे बड़ा कारण तंबाकू है। देश में कुल कैंसर मौतों में से लगभग 21 फीसदी मौतें तंबाकू सेवन के कारण होती हैं। इसमें बीड़ी, सिगरेट, गुटखा, पान मसाला और खैनी का प्रमुख योगदान है। अस्वस्थ जीवनशैली भी कैंसर को बढ़ावा देती है। मोटापा, जंक फूड, असंतुलित आहार और शारीरिक श्रम की कमी इसके मुख्य कारक हैं। असुरक्षित यौन संबंध भी कैंसर के कुछ प्रकारों का कारण हैं। आंकड़ों के मुताबिक, कैंसर से होने वाली मौतों में 12.5 फीसदी मौतें असुरक्षित यौन संबंधों के कारण होती हैं। प्रदूषण भी फेफड़ों और गले के कैंसर में तेजी का कारण है। शराब का अत्यधिक सेवन भी कैंसर के प्रमुख कारणों में गिना जाता है। इसका प्रभाव पुरुषों में अधिक है।
इस बीच बड़ा सवाल कि आखिर कैंसर पर शिकंजा किस तरह से कसा जा सकता है? दरअसल, कैंसर की रोकथाम के लिए जीवनशैली में सुधार सबसे आवश्यक कदम है। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, योग और ध्यान कैंसर के जोखिम को कम करते हैं। जंक फूड, प्रसंस्कृत भोजन और अत्यधिक चीनी का सेवन रोकना चाहिए। तंबाकू और शराब से पूरी तरह दूरी रखना अनिवार्य है। आंकड़े बताते हैं कि यदि लोग तंबाकू का सेवन बंद कर दें तो कैंसर के मामलों में 20 फीसदी तक की कमी संभव है। प्रारंभिक जांच यानी स्क्रीनिंग भी महत्त्वपूर्ण है। स्तन कैंसर और गर्भाशय ग्रीवा कैंसर की नियमित स्क्रीनिंग से रोग का पता शुरूआती चरण में लगाया जा सकता है और उपचार की सफलता दर 70 फीसदी तक बढ़ जाती है। टीकाकरण भी कारगर उपाय है। एचपीवी और हेपेटाइटिस-बी का टीका कई प्रकार के कैंसर से बचाता है।
उल्लेखनीय है कि कैंसर से निपटने के लिहाज से भारत के सामने अलग प्रकार की चुनौतियां विद्यमान हैं। जैसा कि ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता का स्तर बेहद कम है। लोग प्रारंभिक लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं और जब रोग का पता चलता है तब तक वह अंतिम अवस्था में पहुंच चुका होता है। स्वास्थ्य ढांचा भी अपर्याप्त है। भारत की जनसंख्या 142 करोड़ से अधिक है लेकिन कैंसर अस्पतालों और विशेषज्ञ चिकित्सकों की संख्या इस अनुपात में बहुत कम है। आर्थिक स्थिति भी बड़ी बाधा है। देश की लगभग 25 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहती है और महंगे इलाज का खर्च वहन करने में असमर्थ होती है। ऐसे में, समाधान की राह अलग ढंग से तलाशने की आवश्यकता है। भारत को कैंसर की चुनौती से निपटने के लिए एक दीर्घकालिक राष्ट्रीय कैंसर नीति अपनानी होगी। कैंसर अस्पतालों और उपचार केंद्रों की संख्या बढ़ाना आवश्यक है। गरीब परिवारों के लिए विशेष कैंसर बीमा योजनाएं लागू की जानी चाहिए। समाज और सरकार दोनों को मिलकर जागरूकता अभियान चलाने होंगे।
यदि तंबाकू और शराब के सेवन पर कठोर नियंत्रण लगाया जाए, प्रदूषण कम किया जाए और नियमित स्क्रीनिंग की सुविधा हर गांव और शहर में उपलब्ध कराई जाए तो कैंसर के बोझ को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यह रोग घातक है परंतु अजेय नहीं। आवश्यकता महज राजनीतिक इच्छाशक्ति, सामाजिक सहयोग और व्यक्तिगत जागरूकता की है। यदि दुनिया और भारत अभी से ठोस कदम उठाएं तो आने वाली पीढ़ियों को इस भयावह संकट से बचाया जा सकता है।

